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वंदेमातरम् के राष्ट्रभाव से विमुख कांग्रेस

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वंदेमातरम् के राष्ट्रभाव से विमुख कांग्रेस? 1937 के निर्णय से 2026 के संकल्प तक—क्या कांग्रेस इतिहास को दोहरा रही है या बदलते भारत के मन को पढ़ने में चूक रही है? वंदेमातरम् फिर राजनीति के केंद्र में क्यों? भारत के सार्वजनिक जीवन में कुछ शब्द केवल शब्द नहीं होते। वे इतिहास, स्मृति, त्याग और सामूहिक चेतना के प्रतीक बन जाते हैं। ‘वंदे मातरम्’ ऐसा ही एक भाव-मंत्र है। जिस गीत ने स्वतंत्रता आंदोलन के दिनों में भारतीयों को अपनी मातृभूमि के प्रति समर्पण का भाव दिया, वही गीत आज 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर फिर राजनीतिक विमर्श के केंद्र में है। 19 अगस्त 2026 को नई दिल्ली के इंदिरा भवन में हुई कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक ने निर्णय लिया कि पार्टी के कार्यक्रमों में वंदे मातरम् के पहले दो अंतरे ही गाए जाएंगे। कांग्रेस ने इसे 28 अक्टूबर 1937 के अपने पुराने निर्णय से जोड़ा है। बैठक में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, सोनिया गांधी, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी सहित 88 नेता शामिल हुए थे। ( @theweek ) यहीं से प्रश्न उठता है— क्या 2026 की कांग्रेस केवल 1937 के निर्णय को दोहरा रही है, या वह आज के भा...

कांवड़ यात्रा से रामदेवरा पदयात्रा तक: परंपरा, विज्ञान और अनुभवात्मक शिक्षा का नया मॉडल

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कांवड़ यात्रा से रामदेवरा पदयात्रा तक: परंपरा, विज्ञान और अनुभवात्मक शिक्षा का नया मॉडल कांवड़ यात्रा और शिक्षा: रामदेवरा पदयात्रा से सीखें अनुभवात्मक शिक्षा का मॉडल  क्या कांवड़ यात्रा, रामदेवरा पदयात्रा और राजस्थान के लोक उत्सव बच्चों के लिए जीवंत पाठशाला बन सकते हैं? जानिए परंपरा, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, पर्यावरण, इतिहास और अनुभवात्मक शिक्षा का संतुलित मॉडल। कांवड़ से सवाल और रामदेवरा से समाधान हाल के दिनों में राजस्थान के एक विद्यालय में बच्चों को किताबों के स्थान पर कांवड़ दिए जाने की घटना ने शिक्षा जगत में एक महत्वपूर्ण बहस को जन्म दिया है। सवाल सीधा है— क्या विद्यालयों में धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए स्थान होना चाहिए? इस प्रश्न का उत्तर न तो केवल ‘हाँ’ में है और न केवल ‘नहीं’ में। विद्यालय की प्राथमिक जिम्मेदारी निश्चित रूप से ज्ञान, तर्क, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, संवैधानिक मूल्यों और स्वतंत्र चिंतन का विकास करना है। किसी धार्मिक आस्था को विद्यार्थी पर थोपना शिक्षा का उद्देश्य नहीं हो सकता। लेकिन भारतीय समाज की परंपराओं, मेलों, यात्राओं, लोकदेवताओं और सांस्कृतिक आयोजनो...

नागार्जुन सागर बांध: आधुनिक भारत का जल मंदिर या विकास की वह गाथा जिसने भारत के दक्षिण राज्यों की तस्वीर बदल दी? (भाग–4 : समापन)

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नागार्जुन सागर बांध: आधुनिक भारत का जल मंदिर या विकास की वह गाथा जिसने दक्षिण भारत की तस्वीर बदल दी? (भाग–4 : समापन) केवल एक बांध नहीं, राष्ट्र निर्माण का जीवंत दस्तावेज किसी भी राष्ट्र का इतिहास केवल युद्धों और राजाओं से नहीं बनता। उसका निर्माण उन परियोजनाओं से भी होता है जो आने वाली पीढ़ियों के जीवन की दिशा बदल देती हैं। स्रोत सामग्री के अनुसार नागार्जुन सागर बांध ऐसी ही एक बहुउद्देश्यीय परियोजना है, जिसने सिंचाई, ऊर्जा, पेयजल और क्षेत्रीय विकास को एक सूत्र में पिरोने का प्रयास किया। यही कारण है कि इसे आधुनिक भारत की महत्वपूर्ण आधारभूत संरचना परियोजनाओं में स्थान दिया जाता है। भारत ने क्या सीखा? स्रोत सामग्री के अनुसार इस परियोजना ने यह सिद्ध किया कि यदि जल संसाधनों का वैज्ञानिक नियोजन किया जाए, तो एक ही परियोजना से अनेक राष्ट्रीय उद्देश्यों की पूर्ति की जा सकती है। इससे प्राप्त प्रमुख सीखें— बहुउद्देश्यीय नदी घाटी परियोजनाओं का महत्व दीर्घकालिक जल प्रबंधन की आवश्यकता सिंचाई, ऊर्जा और पेयजल का समन्वित विकास विशाल नहर नेटवर्क का प्रभावी उपयोग राष्ट्रीय स्तर पर तकनीकी क्षमता का विकास इ...