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Celebration of Oneness 2: हिंदू कौन है? पूजा-पद्धति से परे एक व्यापक जीवन-दृष्टि |

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   हिंदू कौन है? पूजा-पद्धति से परे एक व्यापक जीवन-दृष्टि हिंदू कौन है? ‘हिंदू’ शब्द सुनते ही हमारे मन में क्या आता है? कोई पूजा-पद्धति? कोई धार्मिक पहचान? कोई विशेष जीवन-शैली? या फिर भारतीय सभ्यता से जुड़ी कोई ऐसी व्यापक दृष्टि, जिसके भीतर अनेक विचार, अनेक पंथ, अनेक परंपराएँ और अनेक जीवन-पद्धतियाँ साथ-साथ चलती रही हैं? यह प्रश्न जितना सरल दिखाई देता है, उतना ही गहरा है। लंदन में 6 सितंबर 2026 को आयोजित ‘Celebration of Oneness’ संवाद में हिंदू की प्रकृति और हिंदुत्व को लेकर इसी प्रश्न पर महत्वपूर्ण विचार सामने आए। वहाँ हिंदू को केवल किसी धार्मिक अभ्यास या जीवन-शैली के आधार पर समझने के बजाय ऐसी व्यापक प्रकृति के रूप में देखने की बात कही गई, जो विविधताओं को स्वीकार करती है, उनका सम्मान करती है और उनमें निहित एकता को पहचानती है। यहीं से इस प्रश्न की वास्तविक यात्रा शुरू होती है— क्या हिंदू होना किसी एक पूजा-पद्धति को मानना है, या विविधता में एकता को जीने की एक प्रकृति? हिंदू को केवल पूजा से समझना पर्याप्त क्यों नहीं? किसी व्यक्ति की धार्मिक पहचान को समझने के लिए सामान्यतः उसकी प...

Celebration of Oneness: अपनापन ही हिंदू का मूल स्वभाव

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  ब्लॉग 1 : अपनापन ही हिंदू का मूल स्वभाव URL Slug Focus Keywords अपनापन ही हिंदू का मूल स्वभाव, हिंदू जीवन दृष्टि, Celebration of Oneness, मोहन भागवत, हिंदू संस्कृति, एकात्मता, विविधता में एकता, शुद्ध सात्त्विक प्रेम अपनापन ही हिंदू का मूल स्वभाव दुनिया आज अनेक प्रकार के विभाजनों से गुजर रही है। कहीं विचारों का संघर्ष है, कहीं पहचान का संकट, कहीं धार्मिक और सांस्कृतिक असहिष्णुता तो कहीं मनुष्य और प्रकृति के बीच बढ़ती दूरी। ऐसे समय में यदि किसी सभ्यता से यह पूछा जाए कि मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने वाला सबसे सरल और सबसे गहरा सूत्र क्या हो सकता है , तो भारत की ओर से आने वाला उत्तर शायद एक शब्द में दिया जा सकता है— अपनापन। 6 सितंबर 2026 को लंदन में आयोजित ‘Celebration of Oneness’ संवाद में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने हिंदू स्वभाव के मूल तत्व के रूप में इसी ‘अपनापन’ को रेखांकित किया। उन्होंने इसे शुद्ध सात्त्विक प्रेम अर्थात सबके प्रति निर्मल और निःस्वार्थ प्रेम के रूप में प्रस्तुत किया। यह बात केवल किसी संगठन या विचारधारा की व्याख्या भर नहीं है। इसके भीतर भ...

जौहर को कायरता कहना कितना उचित?

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जौहर को कायरता कहना कितना उचित? इतिहास, स्त्री अस्मिता और उस दौर की कठोर सच्चाई किसी भी सभ्यता के इतिहास में कुछ ऐसे अध्याय होते हैं, जिन्हें पढ़ते समय केवल तथ्य नहीं, उस समय की मनःस्थिति को भी समझना पड़ता है। जौहर उन्हीं अध्यायों में से एक है। आज के समय में सामूहिक आत्मदाह की कल्पना ही मन को विचलित कर देती है। आधुनिक समाज में जीवन की रक्षा सर्वोच्च मूल्य है और आत्मदाह किसी भी परिस्थिति में स्वीकार्य समाधान नहीं माना जा सकता। लेकिन क्या इसी आधुनिक दृष्टि को लेकर हम मध्यकालीन युद्धों में हुए जौहर को सीधे “कायरता” कह सकते हैं? मेरा उत्तर है— नहीं। जौहर का समर्थन करना और जौहर को ऐतिहासिक संदर्भ में समझना, ये दोनों अलग बातें हैं। किसी त्रासद घटना को समझना उसका महिमामंडन करना नहीं होता। और इतिहास को समझने के लिए सबसे पहले हमें उस काल के युद्ध, पराजित समाज की स्थिति, महिलाओं की सुरक्षा, बंदी बनाए जाने की आशंका और उस समय के सम्मान-बोध को समझना होगा। जौहर आखिर था क्या? जौहर को सामान्यतः ऐसी युद्धकालीन परिस्थिति से जोड़ा जाता है, जब किसी किले की पराजय निश्चित हो जाती थी और महिलाओं को शत्रु द्...