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बौद्धिक वितंडावादियों से सावधान रहने की जरूरत है

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ट्रंप का बयान, भारत का सत्य और फैलाया जा रहा नकारात्मक नैरेटिव आज का समय केवल कूटनीति और अर्थव्यवस्था का नहीं, बल्कि नैरेटिव के युद्ध का भी समय है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कई बार वास्तविक घटनाओं से अधिक महत्व उस कहानी को मिल जाता है, जो उन घटनाओं के इर्द-गिर्द गढ़ी जाती है। हाल ही में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति Donald Trump द्वारा दिया गया एक बयान और उसके बाद भारत में फैलाया गया विमर्श इसी प्रकार की एक घटना है, जिसने यह दिखा दिया कि किस प्रकार एक आधा-सच पूरे देश में भ्रम का वातावरण बना सकता है। ट्रंप ने यह दावा किया कि अमेरिका ने भारत को रूस से तेल खरीदने के लिए 30 दिन की अनुमति (waiver) दी है। यह बयान सुनते ही भारत के कुछ तथाकथित विशेषज्ञों, विश्लेषकों और सोशल मीडिया के स्वयंभू ‘जियो-स्ट्रैटेजिक एक्सपर्ट्स’ ने इसे इस प्रकार प्रस्तुत करना शुरू कर दिया मानो भारत अपनी ऊर्जा नीति तय करने के लिए अमेरिका से अनुमति लेता हो। कुछ लोगों ने तो यह तक कहना शुरू कर दिया कि भारत वैश्विक दबाव में झुक गया है। लेकिन यदि तथ्यों की कसौटी पर इस पूरे प्रकरण को परखा जाए, तो यह कथन वास्तविकत...

स्त्री से सीखें नेतृत्व के दो अमूल्य सूत्र : एक प्रधानाचार्य की दृष्टि से

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स्त्री से सीखें नेतृत्व के दो अमूल्य सूत्र : एक प्रधानाचार्य की दृष्टि से विद्यालय केवल ज्ञान देने का स्थान नहीं होता; वह जीवन मूल्यों को समझने और आत्मविकास का केंद्र भी होता है। एक संस्था प्रधान के रूप में हमें केवल प्रशासन नहीं संभालना होता, बल्कि विद्यार्थियों, शिक्षकों और कर्मचारियों के लिए प्रेरणा का स्रोत भी बनना होता है। जीवन के अनेक सबक हमें पुस्तकों से मिलते हैं, लेकिन कई बार प्रकृति और समाज हमें उससे भी गहरे पाठ सिखा देते हैं। महिलाओं के जीवन को यदि ध्यान से देखा जाए तो उनमें दो ऐसे गुण दिखाई देते हैं, जो नेतृत्व, शिक्षा और जीवन प्रबंधन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं— अनुशासन और साहस । ये दोनों गुण किसी भी शिक्षक, विद्यार्थी और शैक्षिक नेता के लिए मार्गदर्शक सिद्ध हो सकते हैं। पहला सबक: अनुशासन और दिन पर नियंत्रण अक्सर यह देखा गया है कि अनेक सफल महिलाएँ अपने दिन की शुरुआत बहुत अनुशासित तरीके से करती हैं। सुबह जल्दी उठना, घर-परिवार की जिम्मेदारियों को संभालना, काम की तैयारी करना और पूरे दिन को व्यवस्थित रखना—यह सब केवल आदत नहीं बल्कि आत्मनियंत्रण का प्रतीक है। नेतृत्...

बैठक नहीं, संयुक्त अभ्यास: विद्यालयों में प्रभावी मीटिंग संस्कृति की आवश्यकता

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बैठक नहीं, संयुक्त अभ्यास:  विद्यालयों में प्रभावी मीटिंग संस्कृति की आवश्यकता शिक्षा प्रशासन में बैठकों का महत्व अत्यंत गहरा है। किसी भी सीनियर सेकेंडरी विद्यालय का संचालन केवल आदेशों, परिपत्रों और नियमों के आधार पर नहीं होता, बल्कि निरंतर संवाद, विचार-विमर्श और सामूहिक निर्णय प्रक्रिया से होता है। विद्यालय एक जीवंत संस्था है, जहाँ शिक्षक, विद्यार्थी, अभिभावक, कर्मचारी और समाज—सभी एक दूसरे से जुड़े होते हैं। ऐसे में संस्था प्रधान के लिए बैठकें केवल औपचारिक गतिविधि नहीं, बल्कि विद्यालय की दिशा और गति तय करने का महत्वपूर्ण माध्यम होती हैं। फिर भी एक वास्तविकता यह भी है कि बहुत-सी बैठकों को लोग औपचारिकता समझने लगते हैं। एक ही विषय पर बार-बार चर्चा, स्पष्ट निष्कर्ष का अभाव और निर्णयों के क्रियान्वयन में ढिलाई—ये सब कारण बैठकों को नीरस बना देते हैं। इससे प्रतिभागियों में ऊब पैदा होती है और वे बैठक को समय की बर्बादी समझने लगते हैं। इसलिए आज आवश्यकता इस बात की है कि बैठकों को केवल चर्चा का मंच न मानकर संयुक्त अभ्यास (Joint Practice) का माध्यम बनाया जाए—ऐसा अभ्यास जिसमें सहभा...

भारत की कूटनीति अब भावनाओं से नहीं, बल्कि ठोस रणनीति से चलती है?

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 भारत की कूटनीति अब भावनाओं से नहीं, बल्कि ठोस रणनीति से चलती है?  शोक या सरोकार? चयन अपना-अपना अक्सर सवाल उठता है कि किसी खास राष्ट्रप्रमुख की मृत्यु या संकट पर भारत की प्रतिक्रिया वैसी क्यों नहीं होती जैसी दूसरों पर होती है? इसका सीधा सा उत्तर है—व्यापारिक और रणनीतिक हित। ईरान के संदर्भ में भारत का लक्ष्य स्पष्ट है:   चीनी कंपनियों के वर्चस्व को चुनौती देना।   चाबहार बंदरगाह के जरिए अपना नेटवर्क मजबूत करना।   बलूचिस्तान और मध्य एशिया तक अपनी पहुंच बनाना।   सस्ते तेल का प्रसंस्करण कर वैश्विक बाजार में अपनी धाक जमाना।    यहाँ 'दुःख' से ज्यादा 'अवसर' और 'रणनीति' का महत्व है।  जहाँ 'अपने' हैं, वहाँ 'अपनापन' है वहीं दूसरी ओर, जब यूएई (UAE) के किंग से बात होती है या वहां की जनहानि पर ट्वीट आता है, तो उसके पीछे एक गहरा कारण है। वहां लाखों भारतीय और हिंदू रहते हैं। जब एक भी भारतीय या हिंदू (चाहे वह नेपाली ही क्यों न हो) को आंच आती है, तो भारत का विलाप और प्रतिक्रिया दोनों मुखर होते हैं। यह संदेश साफ है—भारत अपने लोगों के साथ खड़ा है। ...

होलिका दहन 2026: क्या हम केवल लकड़ियाँ जला रहे हैं या अपनी बुराइयाँ भी?

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होलिका दहन 2026: क्या हम केवल लकड़ियाँ जला रहे हैं या अपनी बुराइयाँ भी? आज जब हम होलिका की पवित्र अग्नि के सम्मुख खड़े हैं, तो इसकी लपटें हमें केवल गरमाहट नहीं दे रहीं, बल्कि एक गहरा संदेश दे रही हैं। 'होलिका दहन' प्रतीक है उस अडिग विश्वास का कि जब सत्ता का अहंकार (हिरण्यकश्यप) और छल (होलिका) अपनी पराकाष्ठा पर होते हैं, तब एक सरल और निश्छल भक्ति (प्रह्लाद) ही विजय पाती है। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य और 'सद्भाव' की आवश्यकता आज जब हम दुनिया की ओर देखते हैं, तो पाते हैं कि मानवता कहीं न कहीं 'अहंकार और घृणा' के उसी चक्र में फंसी है जिसे होलिका दहन में जल जाना चाहिए था।   वैश्विक संघर्ष: दुनिया के विभिन्न कोनों में जारी युद्ध और तनाव इस बात का प्रमाण हैं कि जब संवाद पर अहंकार हावी होता है, तो शांति की बलि चढ़ जाती है।   ध्रुवीकरण: सोशल मीडिया और तकनीक के युग में समाज वैचारिक रूप से बंट रहा है। आज हमें 'सामाजिक सद्भाव' की अग्नि की आवश्यकता है जो वैमनस्य की दीवारों को भस्म कर सके। भारत: बढ़ता आत्मविश्वास और सकारात्मकता का संचार भारत आज विश्व ...

मध्य पूर्व संकट 2026: ईरान पर अमेरिका-इजराइल हमला, मोदी की इजराइल यात्रा और भारत की विदेश नीति

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मध्य पूर्व संकट 2026: ईरान पर अमेरिका-इजराइल हमला, मोदी की इजराइल यात्रा और भारत की विदेश नीति मध्य पूर्व एक बार फिर युद्ध की दहलीज पर खड़ा है। ओमान और अमेरिका की मध्यस्थता से जिनेवा में अमेरिका-ईरान वार्ता के बाद “सकारात्मक प्रगति” के दावे हुए, लेकिन कुछ ही समय बाद इजराइल और अमेरिका ने “प्रिवेंटिव स्ट्राइक” का हवाला देते हुए ईरान पर हमला कर दिया। जवाब में ईरान ने सऊदी अरब, बहरीन और यूएई सहित क्षेत्र के अमेरिकी सैन्य अड्डों को निशाना बनाया। इस पूरे घटनाक्रम ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं—खासकर तब, जब यह हमला भारत के प्रधानमंत्री की इजराइल यात्रा के 48 घंटे बाद हुआ। मोदी की इजराइल यात्रा और राजनीतिक बहस Narendra Modi की हालिया इजराइल यात्रा को ऐतिहासिक बताया गया। उन्हें इजराइल का सर्वोच्च सम्मान दिया गया—ऐसा सम्मान पाने वाले वे पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने। इजराइल के प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu ने 15 फरवरी को इस यात्रा की घोषणा की थी। दौरे के दौरान मोदी ने इजराइली संसद में कहा कि भारत “पूरे विश्वास और दृढ़ता के साथ इजराइल के साथ खड़ा है और भविष्य में भी खड़ा रहेगा।” हमले के...

​"वंदे मातरम्: 150 वर्षों के 'खंडित' वनवास से 'पूर्ण' गौरव की वापसी"

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वंदे मातरम्: खंडित पहचान से पूर्ण गौरव तक की सभ्यतागत यात्रा भूमिका भारतीय राष्ट्रवाद की आत्मा और स्वाधीनता संग्राम का महामंत्र 'वंदे मातरम्' एक बार फिर अपनी पूर्णता के साथ चर्चा के केंद्र में है। भारत सरकार द्वारा बंकिमचंद्र चटर्जी रचित इस कालजयी गीत को इसके मूल और संपूर्ण स्वरूप में गाने का निर्णय केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं है, बल्कि यह भारत की सभ्यतागत चेतना (Civilizational Consciousness) की पुनर्स्थापना की दिशा में एक निर्णायक कदम है। वर्षों तक जिस गीत को 'खंडित' करके गाया गया, उसे आज अपनी खोई हुई गरिमा वापस मिल रही है। 1. रचना की अमरता: 150 वर्षों का गौरवशाली इतिहास वंदे मातरम् महज़ एक कविता नहीं, बल्कि एक साक्षात् अनुभूति है। 1875 में अक्षय नवमी के दिन रचित यह गीत आज 150 वर्षों की यात्रा पूरी कर चुका है। बंगाल में अक्षय नवमी का अर्थ है—जिसका क्षय न हो। बंकिम बाबू ने जब मुर्शिदाबाद के लालगोला स्थित मंदिर में माँ काली के चित्र को बेड़ियों में जकड़ा देखा, तो उनके भीतर की पीड़ा ने एक 'रूपक' का आकार लिया। यह गीत पुस्तकों और पत्रिकाओं की सीमाओं को ला...

राजनीति विज्ञान या वैचारिक तानाशाही?

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राजनीति विज्ञान या वैचारिक तानाशाही? RSS पर प्रश्नों से डरने का 'बौद्धिक ढोंग' शेखावाटी विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान के प्रश्नपत्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े प्रश्नों पर खड़ा किया गया बवंडर शिक्षा की रक्षा नहीं, बल्कि बौद्धिक गुंडागर्दी का प्रयास है। जब विश्वविद्यालयों में किसी संगठन की विचारधारा, इतिहास और कार्यप्रणाली पर प्रश्न पूछे जाते हैं, तो वह 'अकादमिक अन्वेषण' होता है, लेकिन जैसे ही विषय आरएसएस होता है, उसे 'निंदनीय' और 'एजेंडा' बता दिया जाता है। यह रवैया शिक्षा नहीं, बल्कि एक शुद्ध वैचारिक तानाशाही है। घटना का संदर्भ: क्या था विवाद? हाल ही में पंडित दीनदयाल उपाध्याय शेखावाटी विश्वविद्यालय की परीक्षाओं में राजनीति विज्ञान के पर्चे में आरएसएस से संबंधित लगभग 8-10 प्रश्न पूछे गए। इनमें संघ की स्थापना, विचारधारा और समाज सेवा से जुड़े तथ्यात्मक सवाल थे। लेकिन कुछ राजनीतिक समूहों और तथाकथित बुद्धिजीवियों ने इसे "भगवाकरण" का नाम देकर सड़क से सोशल मीडिया तक हंगामा खड़ा कर दिया। 1. राजनीति विज्ञान: विश्लेषण या सुवि...

संसदीय पतन की पराकाष्ठा: लोकतंत्र के मंदिर में 'अराजकता' का सुनियोजित तंत्र

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संसदीय पतन की पराकाष्ठा: लोकतंत्र के मंदिर में 'अराजकता' का सुनियोजित तंत्र भारतीय लोकतंत्र का हृदय, संसद, आज एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहाँ 'विरोध' और 'विद्रोह' के बीच की रेखा धुंधली होती जा रही है। विपक्ष द्वारा अपनाए गए नए तौर-तरीके—जैसे सदन में पोस्टरबाजी, खान-पान और शोर-शराबा—महज तात्कालिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि संसदीय गरिमा को योजनाबद्ध तरीके से धूलधूसरित करने का एक षड्यंत्र प्रतीत होते हैं। 1. नियमों की धज्जियां उड़ाता 'विजुअल प्रोटेस्ट' लोकसभा की नियमावली का नियम 349 (xiv) स्पष्ट रूप से कहता है कि कोई भी सदस्य सदन में 'प्रदर्शनी की वस्तुएं' (Exhibits) या प्लेकार्ड नहीं लाएगा। इसके बावजूद, राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं द्वारा सदन के भीतर बार-बार पोस्टर लहराना और संविधान की प्रति को एक राजनीतिक औजार की तरह इस्तेमाल करना सीधे तौर पर 'कंटेंप्ट ऑफ द हाउस' (सदन की अवमानना) है। यह आचरण सदन की उस शुचिता पर प्रहार है जहाँ केवल शब्दों की मर्यादा से युद्ध जीता जाना चाहिए। 2. 'पिकनिक कल्चर' बनाम विधायी उत्तर...

सोमनाथ का पुनरुद्धार: सरदार पटेल का 'सम्मान और अस्मिता' का संकल्प

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सोमनाथ का पुनरुद्धार: सरदार पटेल का 'सम्मान और अस्मिता' का संकल्प इतिहास गवाह है कि सोमनाथ मंदिर केवल पत्थरों का ढांचा नहीं, बल्कि भारतीय आत्मा का प्रतीक रहा है। महमूद गजनी से लेकर औरंगजेब तक, कई आक्रांताओं ने इसे मटियामेट करने की कोशिश की, लेकिन 1947 में भारत की स्वतंत्रता के साथ ही इस 'अमर तीर्थ' के पुनरुत्थान की पटकथा लिखी गई। इस पटकथा के महानायक थे—सरदार वल्लभभाई पटेल। 1. आँखों में आँसू और समुद्र के किनारे ली गई शपथ 1 नवंबर 1947 को जब जूनागढ़ रियासत भारत का हिस्सा बनी, तब सरदार पटेल एन.वी. गाडगिल के साथ सोमनाथ पहुँचे। मंदिर की जर्जर और अपमानजनक स्थिति को देखकर सरदार का हृदय द्रवित हो उठा। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, उनकी आँखों में आँसू थे। उसी क्षण वे समुद्र तट पर गए, अपने हाथ में सागर का जल लिया और संकल्प किया:  "यह मंदिर फिर से बनेगा और अपनी खोई हुई भव्यता को प्राप्त करेगा।"   2. "यह हिंदू जनता के सम्मान का प्रश्न है" सरदार पटेल का दृष्टिकोण स्पष्ट था। वे इसे केवल एक धार्मिक कार्य नहीं, बल्कि एक राष्ट्र के आत्म-सम्मान क...

सोमनाथ का रक्तचरित्र: जब गजनी के जिहाद ने भारतीय अस्मिता को छलनी किया

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सोमनाथ का रक्तचरित्र: जब गजनी के जिहाद ने भारतीय अस्मिता को छलनी किया इतिहास केवल तारीखों का पुलिंदा नहीं होता, वह हमारे पूर्वजों के बलिदान और आततायियों की क्रूरता का गवाह भी होता है। भारत के इतिहास में 'महमूद गजनी' एक ऐसा नाम है, जो वीरता का नहीं, बल्कि विश्वासघात, नरसंहार और मजहबी उन्माद का प्रतीक है। एक प्रतिज्ञा: भारत के 'काफिरों' का विनाश वर्ष 997 में गजनी की गद्दी पर बैठते ही 27 वर्षीय महमूद ने एक भयानक प्रतिज्ञा की—"मैं हर साल भारत के काफिरों पर आक्रमण करूँगा।" यह केवल सत्ता की भूख नहीं थी, यह एक 'जिहाद' था जिसका उद्देश्य भारत की मूर्तिभंजक संस्कृति को मिटाना और यहाँ के वैभव को लूटकर इस्लाम का परचम लहराना था। जयपाल का बलिदान और म्लेच्छ का स्पर्श महमूद के शुरुआती हमलों का सामना पंजाब के राजा जयपाल ने किया। इतिहासकार अल-उत्बी लिखता है कि युद्ध के बाद 15,000 हिंदुओं को गाजर-मूली की तरह काटकर जमीन पर कालीन की तरह बिछा दिया गया। बंदी बनाए गए राजा जयपाल इतने आत्मग्लानि में थे कि एक 'म्लेच्छ' (अपवित्र) के स्पर्श के बाद उन्होंने खुद ...

सोमनाथ: नेहरू के विरोध का काला अध्याय

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नेहरू के पत्राचार का गहरा विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट होता है कि उनका विरोध केवल व्यक्तिगत पसंद तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने सरकारी मशीनरी का उपयोग करके सोमनाथ मंदिर के पुनरुत्थान के प्रभाव को कम करने की पूरी कोशिश की थी। यहाँ उन बाधाओं और तर्कों का विस्तृत विवरण है जो इन ऐतिहासिक दस्तावेजों से उभर कर आते हैं: 1. वैचारिक बाधा: 'पुनरुत्थानवाद' (Revivalism) का डर नेहरू ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण को "हिंदू पुनरुत्थानवाद" के रूप में देखा, जिसे वे आधुनिक भारत के लिए खतरा मानते थे। उन्होंने के.एम. मुंशी और जाम साहेब को लिखे पत्रों में बार-बार 'Revivalism' शब्द का प्रयोग किया। उनका तर्क था कि स्वतंत्र भारत को अपनी प्राचीन पहचान की ओर नहीं लौटना चाहिए, बल्कि एक पश्चिमी धर्मनिरपेक्ष ढांचे को अपनाना चाहिए। 2. प्रशासनिक बाधा: दूतावासों को सख्त आदेश जब सोमनाथ मंदिर के ट्रस्टियों ने विदेशों से जल और मिट्टी लाने का आह्वान किया, तो नेहरू ने इसे एक 'अंतर्राष्ट्रीय संकट' की तरह लिया।  * दस्तावेजों के अनुसार: उन्होंने विदेश सचिव को नोट लि...

क्या स्त्री को 'देवी' मान लेना ही उसकी प्रगति में सबसे बड़ी बाधा है?

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 क्या स्त्री को 'देवी' मान लेना ही उसकी प्रगति में सबसे बड़ी बाधा है? अक्सर हम भारतीय संस्कृति में नारी को 'पूजनीय' और 'देवी' कहकर ऊंचे आसन पर बैठा देते हैं, लेकिन क्या यही सम्मान धरातल पर उसकी बेड़ियों का कारण तो नहीं बन गया? हाल ही में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के दृष्टिकोण पर आधारित एक लेख ने इस विषय पर एक गंभीर विमर्श छेड़ा है— "विकसित भारत" का रास्ता महलों या सड़कों से नहीं, बल्कि घर के उस आँगन से होकर गुजरता है जहाँ स्त्री को बराबरी का हक मिलता है। पूजनीयता बनाम भागीदारी: एक कड़वा सच हम अक्सर कहते हैं कि जहाँ नारी की पूजा होती है, वहाँ देवता निवास करते हैं। लेकिन लेख एक कड़वी सच्चाई की ओर इशारा करता है: नारी को केवल मंदिर की मूर्ति बनाकर पूजना या उसे घर की दासी समझकर सीमित कर देना, दोनों ही उसके अस्तित्व के साथ अन्याय हैं। सच्चा सशक्तिकरण तब है जब उसे निर्णय लेने की स्वतंत्रता और अपनी प्रतिभा को बाहर लाने का समान अवसर मिले। यदि वह सुविज्ञ और सजग नहीं है, तो समाज की प्रगति की बातें केवल कागजी हैं। सिर्फ '...

सावित्रीबाई फुले : नारी शिक्षा की क्रांतिज्योति

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सावित्रीबाई फुले : नारी शिक्षा की क्रांतिज्योति जन्म : माघ कृष्ण पक्ष, पंचमी, विक्रम संवत 1887 (3 जनवरी 1831) भारतीय समाज में जब स्त्री शिक्षा की कल्पना भी पाप मानी जाती थी, तब सावित्रीबाई फुले ने ज्ञान का दीप जलाया। वे न केवल आधुनिक भारत में महिला शिक्षा की प्रथम अग्रदूत थीं, बल्कि सामाजिक अन्याय, जातिगत भेदभाव और रूढ़ियों के विरुद्ध संघर्ष की प्रतीक भी थीं। उनका संपूर्ण जीवन साहस, त्याग और समाज परिवर्तन की प्रेरक गाथा है। बाल्यकाल सावित्रीबाई का जन्म महाराष्ट्र के सतारा जिले के नायगांव ग्राम में हुआ। उनके पिता खंडोजी न्यूस-पाटील ग्राम के मुखिया थे और माता लक्ष्मीबाई एक सरल गृहिणी थीं। ग्रामीण परिवेश में पली-बढ़ी सावित्रीबाई के लिए शिक्षा का कोई अवसर नहीं था, क्योंकि उस समय स्त्रियों का पढ़ना समाज को स्वीकार्य नहीं था। विवाह और जीवन की दिशा 1840 में मात्र 9 वर्ष की आयु में उनका विवाह 13 वर्षीय ज्योतिराव फुले से हुआ। ज्योतिराव सामाजिक कुरीतियों, जातिगत भेदभाव और शोषण से बाल्यकाल से ही पीड़ित रहे थे। उन्होंने समाज सुधार का संकल्प लिया और सावित्रीबाई ने हर परिस्थिति में उनके...

संघ और शक्ति: महिला विमर्श की भारतीय दृष्टि और राष्ट्र निर्माण में भूमिका

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संघ और शक्ति: महिला विमर्श की भारतीय दृष्टि और राष्ट्र निर्माण में भूमिका अक्सर सार्वजनिक विमर्श में यह सवाल उछाला जाता है कि क्या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) में महिलाओं के लिए स्थान है? आलोचक अक्सर इसे 'विदेशी चश्मे' से देखते हैं और पश्चिमी नारीवाद के मापदंडों पर भारतीय संगठनों को तौलने की कोशिश करते हैं। लेकिन हाल ही में भोपाल में आयोजित 'शक्ति संवाद' और सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत के वक्तव्यों ने इस भ्रम के कुहासे को साफ कर दिया है। विदेशी दृष्टि बनाम भारतीय यथार्थ भारत में महिला सशक्तिकरण का अर्थ केवल 'पुरुषों जैसा बनना' नहीं, बल्कि 'मातृशक्ति' के रूप में समाज का नेतृत्व करना है। संघ का मानना है कि यदि समाज में व्यापक परिवर्तन लाना है, तो आधी आबादी को अलग रखकर यह संभव नहीं है। पश्चिमी विमर्श जहाँ अक्सर संघर्ष (Conflict) पर आधारित होता है, वहीं भारतीय दृष्टि पूरकता (Complementarity) पर टिकी है। राष्ट्र सेविका समिति: समानांतर और सशक्त ढांचा कई लोग यह नहीं जानते कि 1931 में ही संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार ने यह स्पष्ट कर दिया था ...

राजस्थान में भारतीय ज्ञान परंपरा: आत्मनिर्भर छात्र, विद्यालय और व्यवस्था का शंखनाद

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राजस्थान में भारतीय ज्ञान परंपरा: आत्मनिर्भर छात्र, विद्यालय और व्यवस्था का शंखनाद 1. प्रस्तावना: जड़ों की ओर वापसी, भविष्य की ओर दृष्टि राजस्थान की मरुधरा केवल अरावली की पर्वतमालाओं और रेतीले धोरों की भूमि नहीं है, बल्कि यह वह पुण्य धरा है जहाँ 'विद्या' को जीवन का आधार माना गया। प्राचीन काल में यहाँ के गुरुकुलों ने ऐसे व्यक्तित्व गढ़े जिन्होंने दुनिया को शून्य से लेकर खगोल विज्ञान तक का ज्ञान दिया। आज जब हम 'विकसित भारत @2047' की बात करते हैं, तो उसकी पहली सीढ़ी राजस्थान की स्कूली शिक्षा में भारतीय ज्ञान परंपरा (IKP) की पुनर्स्थापना है। भारतीय ज्ञान परंपरा कोई संकुचित विचारधारा नहीं, बल्कि सत्य, तर्क और अनुभव की वह संचित निधि है जो छात्र को 'आत्मनिर्भर' बनाती है। 2. भारतीय ज्ञान परंपरा (IKS) का मर्म और राजस्थान IKP का मूल सिद्धांत है—"समग्रता"। यहाँ ज्ञान खंडों में नहीं है। राजस्थान के संदर्भ में देखें तो यहाँ की स्थापत्य कला में गणित है, लोक गीतों में इतिहास है और सामाजिक रीति-रिवाजों में पर्यावरण विज्ञान है। जब एक छात्र अपनी संस्कृति को विज...

भारत का भविष्य: जनसांख्यिकीय असंतुलन, वैचारिक विध्वंस और राष्ट्रीय अखंडता की चुनौती

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भारत का भविष्य: जनसांख्यिकीय असंतुलन, वैचारिक विध्वंस और राष्ट्रीय अखंडता की चुनौती इतिहास स्वयं को तब तक दोहराता है जब तक उससे शिक्षा न ली जाए। 1947 का विभाजन केवल मानचित्र पर खींची गई रेखा नहीं थी, बल्कि वह दशकों तक चले वैचारिक विध्वंस (सबवर्शन), जनसांख्यिकीय परिवर्तन और राजनीतिक तुष्टीकरण का अंतिम परिणाम था। आज, 21वीं सदी के तीसरे दशक में, भारत एक बार फिर उन पदचापों को सुन रहा है जो अतीत में विभाजन की आधारशिला बनी थीं। क्या भारत में "एक और विभाजन" की पृष्ठभूमि तैयार हो रही है? यह प्रश्न आज केवल राजनीतिक गलियारों का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और अस्तित्व का मूल प्रश्न बन चुका है। 1. ऐतिहासिक दर्पण: 1947 और 1971 की सीख 1947 में पाकिस्तान का निर्माण और 1971 में बांग्लादेश का उदय—ये दोनों घटनाएँ सिद्ध करती हैं कि भूगोल कभी भी विभाजन का मुख्य कारण नहीं होता। कारण होता है 'विचार' और 'संख्यात्मक शक्ति'।  * पाकिस्तान: मुस्लिम लीग के 'द्वि-राष्ट्र सिद्धांत' ने यह स्थापित किया कि मत-पंथ के आधार पर राष्ट्र अलग हो सकते हैं।  * बांग्लादेश: यहाँ भा...