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ब्राह्मणों का ‘सौ प्रतिशत आरक्षण’ और भारतीय शिक्षा का सच: नैरेटिव बनाम ऐतिहासिक दस्तावेज़

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ब्राह्मणों का ‘सौ प्रतिशत आरक्षण’ और भारतीय शिक्षा का सच: नैरेटिव बनाम ऐतिहासिक दस्तावेज़ पिछले कुछ समय से सोशल मीडिया, अकादमिक विमर्शों और सार्वजनिक मंचों से एक नैरेटिव बहुत आक्रामक ढंग से दोहराया जाता रहा है कि प्राचीन और मध्यकालीन भारत में पढ़ाई-लिखाई पर केवल ब्राह्मणों का हक था और उनके लिए ‘सौ प्रतिशत आरक्षण’ था। इस दावे के पीछे तर्क दिया जाता है कि चूँकि ब्राह्मण आबादी में मात्र दस प्रतिशत (या उससे कम) थे, इसलिए उन्होंने ज्ञान, भाषा और सत्ता के केंद्रों से बाकी नब्बे प्रतिशत समाज को पूरी तरह बेदखल कर रखा था। यह सुनने में एक प्रभावी सामाजिक-राजनीतिक वक्तव्य लग सकता है, और आधुनिक राजनीति के समीकरणों में पूरी तरह फिट भी बैठता है। लेकिन जब हम इस दावे की गहराई में जाकर भारत के साहित्यिक इतिहास, समाजशास्त्र और स्वयं अंग्रेजों के तैयार किए हुए आधिकारिक दस्तावेज़ों को खंगालते हैं, तो यह नैरेटिव पूरी तरह भरभरा कर ढह जाता है। तथ्य यह बताते हैं कि अंग्रेजों के आने से पहले भारत की ज्ञान-परंपरा न केवल विकेंद्रीकृत थी, बल्कि सामाजिक रूप से बेहद समावेशी भी थी।  आरोप: "तीन हज़ार...

किस्मत: कैसे एक संघर्षरत कंपनी को मोदी ने बना दिया दुनिया की चर्चित ब्रांड

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12 सेकेंड में बदली किस्मत: कैसे एक संघर्षरत कंपनी को मोदी ने बना दिया दुनिया की चर्चित ब्रांड भारत में कुछ ब्रांड केवल उत्पाद नहीं होते, वे स्मृतियाँ होते हैं। कुछ नाम ऐसे होते हैं जिन्हें सुनते ही बचपन की आवाज़ें कानों में गूंजने लगती हैं — स्कूल की घंटी, टिफिन की खुशबू, दादी की चाय, ट्रेन का सफर और पाँच रुपए में मिलने वाली छोटी-सी खुशी। ऐसा ही एक नाम है — Parle Products। मैंगो बाइट, किस्मी, पॉपिन्स, मेलोडी, मोनाको, क्रैकजैक, हाइड एंड सीक, मैरी और सबसे बढ़कर पार्ले-जी… यह केवल बिस्किट या टॉफियाँ नहीं हैं, यह भारत की सामूहिक स्मृति का हिस्सा हैं। बहुत कम लोग जानते हैं कि “पार्ले” नाम मुंबई के उपनगर विले पार्ले से आया। वहीं से 1928 में एक छोटे से सपने ने जन्म लिया था। उस दौर में भारतीय बाजार पर विदेशी कंपनियों का दबदबा था। अंग्रेज़ी ब्रांड्स को ही गुणवत्ता का प्रतीक माना जाता था। ऐसे समय में मोहनलाल दयाल चौहान ने स्वदेशी सोच के साथ एक छोटी फैक्ट्री शुरू की। 1929 में करीब 75 हजार रुपए में मशीनें खरीदी गईं। अगले ही वर्ष ऑरेंज कैंडी बाजार में आई। धीरे-धीरे लोगों ने इस भारतीय ब्...

झालमुड़ी से मेलोडी का सफर: जब कूटनीति के 'पास्ता' में गिरा घरेलू राजनीति का 'राशन'!

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झालमुड़ी से मेलोडी का सफर: जब कूटनीति के 'पास्ता' में गिरा घरेलू राजनीति का 'राशन'! - एक 'परम-पवित्र' और घोर-वैश्विक राजनीतिक विश्लेषण प्रस्तावना: कूटनीति का 'कैरम बोर्ड' और सोशल मीडिया की 'गोटी' कहते हैं कि पुराने ज़माने में कूटनीति (Diplomacy) का मतलब होता था—दो देशों के गंभीर, थके हुए, सफेद बाल वाले बुजुर्ग नेता, जो बंद कमरों में बैठकर, मोटे-मोटे चश्मों के पीछे से फाइलों को घूरते थे। उन फाइलों में 'द्विपक्षीय व्यापार', 'सामरिक संतुलन' और 'नेविगेशन की स्वतंत्रता' जैसे ऐसे भारी-भरकम शब्द होते थे जिन्हें सुनकर ही आम आदमी को गहरी और शांतिपूर्ण नींद आ जाए। उस दौर में कूटनीति का सबसे बड़ा रोमांच यह होता था कि संयुक्त बयान (Joint Statement) में पूर्णविराम कहां लगा और अल्पविराम कहां छूटा। लेकिन भाई साहब, युग बदल चुका है! यह २०२६ का भारत है। अब कूटनीति फाइलों की धूल से निकलकर इंस्टाग्राम की रील्स, एक्स (ट्विटर) के ट्रेंड्स और परफ़ेक्ट कैमरा एंगल के 'पोर्ट्रेट मोड' में शिफ्ट हो चुकी है। और इस नए युग के सबसे बड...

तारीखों के जाल में उलझता न्याय: क्या हम 73 साल इंतज़ार कर सकते हैं?

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तारीखों के जाल में उलझता न्याय: क्या हम 73 साल इंतज़ार कर सकते हैं? फिल्म 'दामिनी' का वह मशहूर संवाद  "तारीख पर तारीख" आज केवल एक फिल्मी डायलॉग नहीं, बल्कि भारत की न्याय प्रणाली का एक दर्दनाक सच बन चुका है। हालिया रिपोर्ट के अनुसार, देश की अदालतों में 1353 मुकदमे ऐसे हैं जो पिछले 50 सालों से अधिक समय से लंबित हैं। इनमें से एक सिविल केस तो पिछले 73 सालों से अपनी बारी का इंतज़ार कर रहा है। यह आंकड़े न केवल चौंकाने वाले हैं, बल्कि यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि जिस 'न्याय' के लिए कोई व्यक्ति अपनी पूरी उम्र, अपनी पूंजी और अपनी पीढ़ियां खपा देता है, क्या वह अंत में न्याय रह जाता है? पीढ़ियां बदल गई पर फाइलें नहीं खुली तस्वीर में दिए गए विवरण बताते हैं कि पश्चिम बंगाल का एक संपत्ति विवाद 1952 से चल रहा है। जरा सोचिए, जिस व्यक्ति ने वह केस दायर किया होगा, उसकी आज क्या स्थिति होगी? कई मामलों में तो मूल वादी (Petitioner) और प्रतिवादी (Respondent) दोनों की मृत्यु हो चुकी है और अब उनकी दूसरी या तीसरी पीढ़ी अदालतों के चक्कर काट रही है। जब न्याय मिलने में आधी सदी...

राजनीति का यह 'शॉर्टकट' कहीं देश के लिए 'डेड एंड' न बन जाए!

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राजनीति का यह 'शॉर्टकट' कहीं देश के लिए 'डेड एंड' न बन जाए! आज हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ राजनीति में तात्कालिक लाभ, वोट बैंक और क्षेत्रीय अस्मिता के नाम पर देश की संप्रभुता को दांव पर लगाने से भी गुरेज़ नहीं किया जा रहा है। हाल ही में देश के एक ज़िम्मेदार राज्य के संवैधानिक शीर्ष पद (मुख्यमंत्री) पर बैठे व्यक्ति द्वारा एक प्रतिबंधित संगठन के मुखिया को सार्वजनिक रूप से श्रद्धांजलि दिया जाना बेहद चौंकाने वाला और चिंताजनक है। यह केवल एक राजनीतिक घटना नहीं है, बल्कि एक बेहद खतरनाक और गलत परंपरा की शुरुआत है, जिसे यदि आज नहीं टोका गया, तो इसके परिणाम पूरे देश को भुगतने होंगे। क्षेत्रीय अस्मिता या राष्ट्रीय सुरक्षा से खिलवाड़? हमारा देश विविधताओं से भरा है। हर राज्य की अपनी भाषा, संस्कृति और भावनाएँ हैं, जिनका सम्मान होना ही चाहिए। लेकिन क्या क्षेत्रीय अस्मिता का दायरा देश की संप्रभुता और कानून से भी बड़ा हो सकता है? जिस संगठन (LTTE) को भारत सरकार ने पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की जघन्य हत्या और देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए ख़तरा मानते हुए कानूनन प्रतिब...

अपील बनाम राजनीतिक पलटवार: विफलता का प्रमाण या भविष्य की तैयारी?

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 अपील बनाम राजनीतिक पलटवार: विफलता का प्रमाण या भविष्य की तैयारी? हाल के दिनों में भारतीय राजनीति के केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा जनता से की गई  ‘सात अपीलें’ और उन पर राहुल गांधी का तीखा हमला रहा है। जहाँ प्रधानमंत्री इन अपीलों को देश की मजबूती और आत्मनिर्भरता के लिए अनिवार्य बता रहे हैं, वहीं विपक्ष के नेता राहुल गांधी इसे सरकार की प्रशासनिक और आर्थिक विफलता का सबसे बड़ा स्वीकारोक्ति मान रहे हैं। यह बहस केवल दो नेताओं के बीच की नहीं, बल्कि इस बात की है कि एक आधुनिक राष्ट्र संकटों और संसाधनों का प्रबंधन कैसे करता है। 1. प्रधानमंत्री की सात अपीलें: नीतिगत नजरिया सरकार के दृष्टिकोण से देखें तो इन अपीलों—जैसे सोना कम खरीदना, ईंधन की बचत, मेट्रो का उपयोग और 'वर्क फ्रॉम होम'—के पीछे एक ठोस आर्थिक तर्क है।  आर्थिक स्थिरता: भारत की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा कच्चे तेल और सोने के आयात पर खर्च होता है। इन पर निर्भरता कम करने का सीधा अर्थ है विदेशी मुद्रा भंडार को सुरक्षित करना और रुपये की कीमत को गिरने से बचाना।  सतत जीवनशैली (Sustainable Living...

तमिलनाडु की लड़ाई : राजनीति नहीं, सभ्यता के अस्तित्व का प्रश्न

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तमिलनाडु की लड़ाई : राजनीति नहीं, सभ्यता के अस्तित्व का प्रश्न भारत के दक्षिण में एक ऐसा संघर्ष चल रहा है, जिसे केवल चुनावी राजनीति या दलों की प्रतिस्पर्धा मानना घातक भूल होगी। यह संघर्ष सत्ता का नहीं, बल्कि संस्कृति, पहचान और सभ्यता के अस्तित्व का है। तमिलनाडु आज केवल एक राज्य नहीं, बल्कि उस वैचारिक प्रयोगशाला में बदल चुका है जहाँ सनातन परंपरा, मंदिर व्यवस्था, सामाजिक संरचना और हिंदू चेतना को व्यवस्थित ढंग से चुनौती दी जा रही है। कुछ वर्ष पहले तक जो बातें फुसफुसाहट में कही जाती थीं, वे अब खुले मंचों से बोली जा रही हैं। सनातन धर्म को “डेंगू”, “मलेरिया” और “कोरोना” कहने वाले बयान केवल राजनीतिक उत्तेजना नहीं हैं; वे उस मानसिकता की अभिव्यक्ति हैं जो भारत की प्राचीन सांस्कृतिक आत्मा को रोग मानती है। प्रश्न यह है कि आखिर तमिलनाडु की राजनीति इस मोड़ तक पहुँची कैसे? द्रविड़ राजनीति की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि 1916 में अंग्रेजों के शासनकाल में “जस्टिस पार्टी” का गठन हुआ। इतिहासकार मानते हैं कि यह केवल एक राजनीतिक दल नहीं था, बल्कि ब्रिटिश औपनिवेशिक नीति का उपकरण था, जिसका उद्देश्य हिंदू ...

1857 की क्रांति: प्रथम स्वतंत्रता संग्राम और इसकी सुनियोजित संरचना

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1857 की क्रांति: प्रथम स्वतंत्रता संग्राम और इसकी सुनियोजित संरचना 1857 का विद्रोह भारतीय इतिहास की कोई आकस्मिक घटना या केवल सैनिकों का 'ग़दर' नहीं था, बल्कि यह औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध भारतीय समाज के विभिन्न वर्गों का एक सुनियोजित और संगठित शंखनाद था। वी.डी. सावरकर ने इसे 'भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम' कहकर इसके वास्तविक स्वरूप को परिभाषित किया। यद्यपि ब्रिटिश इतिहासकारों ने इसे 'सैनिक विद्रोह' तक सीमित करने की कोशिश की, किंतु सूक्ष्म विश्लेषण यह सिद्ध करता है कि इसके पीछे गहरी योजना, कुशल कूटनीति और एक व्यापक लक्ष्य था। 1. क्रांति की पृष्ठभूमि और वैचारिक आधार 1857 की क्रांति रातों-रात पैदा नहीं हुई थी। इसके पीछे 100 वर्षों का ब्रिटिश शोषण, डलहौजी की 'व्यपगत का सिद्धांत' (Doctrine of Lapse), और भारतीयों की धार्मिक भावनाओं से खिलवाड़ जिम्मेदार था।   राजनीतिक चेतना: नाना साहेब, लक्ष्मीबाई, और कुंवर सिंह जैसे नेताओं के बीच गुप्त पत्राचार इस बात का प्रमाण है कि वे एक साझा शत्रु के विरुद्ध एकजुट हो रहे थे।   प्रतीकों का उपयोग: ...

क्या भारत को 'सॉफ्ट' इस्लामिक राष्ट्र बनाने का प्रयास किया गया?

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 क्या भारत को 'सॉफ्ट' इस्लामिक राष्ट्र बनाने का प्रयास किया गया?  हाल ही में सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में एक बहस छिड़ी है कि क्या पिछले दशकों में भारत की संवैधानिक और कानूनी व्यवस्था को एक खास दिशा में मोड़ने की कोशिश की गई। इस विश्लेषण में हम वीडियो में उठाए गए उन बिंदुओं पर गौर करेंगे जो कांग्रेस की नीतियों और उनके दूरगामी प्रभावों पर सवाल उठाते हैं।  1. संवैधानिक संशोधन और मजहबी शिक्षा वीडियो के अनुसार, भारत को इस्लामिक राष्ट्र बनाने की नींव पाकिस्तान बनने के साथ ही रख दी गई थी:  *अनुच्छेद 25: आरोप है कि 1950 में इसके माध्यम से धर्मांतरण को कानूनी ढाल दी गई, जबकि भारतीय मूल के धर्म (हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन) धर्मांतरण में विश्वास नहीं रखते।  अनुच्छेद 28 बनाम 30: जहाँ अनुच्छेद 28 हिंदुओं को धार्मिक शिक्षा देने से रोकता है, वहीं अनुच्छेद 30 अल्पसंख्यकों (मुस्लिम व ईसाई) को मजहबी शिक्षा देने की छूट देता है। इसे आलोचक "धार्मिक अत्याचार" की श्रेणी में रखते हैं।  2. मंदिरों पर नियंत्रण और पर्सनल लॉ हिंदू समाज और उनकी संस्थाओं पर राज्य के नियं...

रामोन्मुख भारत: सभ्यता का पुनरुत्थान और वैचारिक विजय

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रामोन्मुख भारत: सभ्यता का पुनरुत्थान और वैचारिक विजय भारतीय इतिहास के पन्नों में कुछ क्षण ऐसे आते हैं, जो केवल सत्ता परिवर्तन के प्रतीक नहीं होते, बल्कि एक सभ्यता के पुनर्जागरण का शंखनाद होते हैं। आज भारत जिस मोड़ पर खड़ा है, वहाँ अतीत और वर्तमान एक-दूसरे से गुत्थमगुत्था हैं। जो लोग इतिहास को केवल बीता हुआ कल मानते हैं, वे शायद उस 'आलोड़न' को न समझ पाएँ, लेकिन जो आगत (भविष्य) के प्रति स्वप्नशील हैं, वे जानते हैं कि राम केवल एक पौराणिक पात्र नहीं, बल्कि हमारी आत्मा में बसने वाला वह शाश्वत स्वर हैं जो हर युग में अपनी भूमिका बदलकर अधर्म के विरुद्ध खड़े होते हैं।   बंगाल और राम : भ्रांतियों का अंत अक्सर कुछ विद्वानों द्वारा यह तर्क दिया जाता रहा कि बंगाल केवल 'शाक्त' परंपरा की धरती है और वहाँ भगवान राम की उपस्थिति नहीं है। यह दावा किया गया कि रामनवमी बंगाल की संस्कृति का हिस्सा नहीं है और इसे बाहर से थोपा जा रहा है। परंतु सत्य इसके विपरीत है। बंगाल के मध्यकालीन कवि कृत्तिवास ने जब 'रामायण' की रचना की, तब उन्होंने राम और शक्ति के उसी अटूट संबंध को दर्शाया...

बंगाल चुनाव 2026: एक ऐतिहासिक 'राजनीतिक भूकंप'

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  बंगाल चुनाव 2026: एक ऐतिहासिक 'राजनीतिक भूकंप'  पश्चिम बंगाल की राजनीति में 4 मई 2026 की तारीख एक नए युग के आरंभ के रूप में दर्ज हो गई है। यह केवल एक चुनावी जीत नहीं, बल्कि राज्य के सामाजिक और राजनीतिक ढांचे में आया वह बदलाव है, जिसकी कल्पना कुछ साल पहले तक कठिन लगती थी। इसे बंगाल की 'वैचारिक आजादी' के रूप में देखा जा रहा है। आइए समझते हैं उन प्रमुख कारणों को, जिन्होंने ममता बनर्जी के अजेय माने जाने वाले दुर्ग को ढहा दिया। 1. जन-आंदोलन और 'इनफ्लेक्शन पॉइंट' किसी भी बड़े राजनीतिक परिवर्तन की नींव असंतोष से रखी जाती है। बंगाल में इसकी शुरुआत आरजी कर अस्पताल की हृदयविदारक घटना से हुई, जिसने समाज की अंतरात्मा को झकझोर दिया। बदलाव का असली प्रस्थान बिंदु 14 अगस्त की रात को बना, जब 'रिक्लेम द नाइट' अभियान के तहत लाखों महिलाएं बिना किसी राजनीतिक झंडे के सड़कों पर उतरीं। यह वह क्षण था जब आंदोलन 'सियासी' न रहकर 'जन-आंदोलन' बन गया। 2. संदेशखाली और प्रशासन की विफलता संदेशखाली की घटनाओं ने राज्य सरकार की छवि को गहरा नुकसान पहुँचाया। विशेष ...

असम से बंगाल तक: पूर्वोत्तर में बदलता राजनीतिक भूगोल और नेतृत्व का प्रभाव

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असम से बंगाल तक: पूर्वोत्तर में बदलता राजनीतिक भूगोल और नेतृत्व का प्रभाव बंगाल की चर्चा करते समय यदि असम को भूल जाएँ, तो यह विश्लेषण अधूरा रह जाएगा। क्योंकि पूर्वोत्तर भारत में जो राजनीतिक परिवर्तन आज दिखाई दे रहा है, उसकी शुरुआत असम से ही हुई थी—और यह परिवर्तन किसी संयोग का परिणाम नहीं, बल्कि एक सुनियोजित रणनीति और मजबूत नेतृत्व का परिणाम है। जहाँ शून्य था, वहाँ शिखर कैसे बना? एक समय था जब असम और पूरा पूर्वोत्तर भारतीय जनता पार्टी के लिए लगभग “अछूता क्षेत्र” माना जाता था। राजनीतिक प्रभाव नगण्य था, संगठन सीमित था और स्थानीय समीकरण पूरी तरह अन्य दलों के पक्ष में थे। लेकिन 2016 में परिदृश्य बदला। सर्बानंद सोनोवाल के नेतृत्व में पहली बार भाजपा ने असम में सरकार बनाई। यह केवल सत्ता परिवर्तन नहीं था—यह उस सोच की शुरुआत थी, जिसमें पूर्वोत्तर को मुख्यधारा की राजनीति और विकास से जोड़ने का लक्ष्य स्पष्ट था। रणनीतिक दांव: हिमंत बिस्वा सरमा का आगमन राजनीति में कुछ फैसले तत्काल समझ नहीं आते, लेकिन समय उन्हें सही साबित करता है। हिमंत बिस्वा सरमा का भाजपा में आना ऐसा ही एक नि...

ममता का मिथक टूटा, मुखर्जी का मंत्र लौटा

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ममता का मिथक टूटा, मुखर्जी का मंत्र लौटा: अब केसरिया चेतना का बंगाल पश्चिम बंगाल ने अंततः वह कर दिखाया, जिसका इंतजार वर्षों से था। यह केवल एक चुनावी परिणाम नहीं, बल्कि इतिहास की पुनरावृत्ति है—एक ऐसा निर्णायक क्षण, जहाँ तुष्टिकरण, भय और राजनीतिक गुंडागर्दी की जकड़न को जनता ने अपने मत की चोट से तोड़ दिया। ममता बनर्जी का तथाकथित अभेद्य किला ध्वस्त हो चुका है। वह सत्ता, जो खुद को अजेय समझ बैठी थी, आज जनमत के प्रचंड वेग में बह गई। वर्षों तक “अल्पसंख्यक तुष्टिकरण” को शासन का आधार बनाने वाली राजनीति को जनता ने स्पष्ट संदेश दे दिया है—लोकतंत्र में तुष्टिकरण नहीं, संतुलन और न्याय चलता है। यह जनादेश: आक्रोश का विस्फोट है यह परिणाम अचानक नहीं आया। इसके पीछे वर्षों का संचित आक्रोश है— सैंड माफिया कोल माफिया लैंड माफिया घुसपैठ और कैटल माफिया इन सबके संरक्षण में पनपती व्यवस्था ने आम बंगाली के जीवन को जकड़ लिया था। प्रशासन पंगु था, कानून व्यवस्था पक्षपाती थी और आम नागरिक भय के साये में जीने को विवश था। लेकिन इस बार जनता ने डर को दरवाजे पर ही छोड़ दिया। केंद्रीय सुरक्षा बलों की मौजूदगी ने...

उद्यमशीलता का मूल्य: श्रम, पूंजी और वामपंथी भ्रम से परे मई दिवस पर विशेष

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 उद्यमशीलता का मूल्य: श्रम, पूंजी और वामपंथी भ्रम से परे प्रत्येक वर्ष एक मई को दुनिया भर में 'मजदूर दिवस' मनाया जाता है। यह दिन श्रमिकों के पसीने, उनके संघर्ष और अधिकारों को सम्मान देने का प्रतीक है। लेकिन हाल के दशकों में, इस दिन का उपयोग वास्तविक सम्मान से कहीं अधिक एक विशेष विचारधारा को थोपने के लिए किया जाने लगा है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम 'लाभ', 'हानि' और 'उद्यम' के वास्तविक अर्थ को समझें और उस वामपंथी नैरेटिव का विश्लेषण करें जो श्रम और पूंजी के बीच एक कृत्रिम दीवार खड़ी करता है। क्या केवल श्रम ही लाभ का स्रोत है? वामपंथी विचारधारा का एक बुनियादी तर्क यह है कि सारा लाभ केवल श्रमिक की मेहनत से पैदा होता है, और उद्यमी उस लाभ का शोषण करता है। सुनने में यह बात आकर्षक लग सकती है, लेकिन आर्थिक धरातल पर यह तर्क पूरी तरह खरा नहीं उतरता। यदि मशीनों और श्रमिकों की मौजूदगी ही लाभ की गारंटी होती, तो दुनिया का कोई भी कारखाना कभी बंद नहीं होता। हम आए दिन देखते हैं कि बेहतरीन मशीनरी और कुशल श्रमिकों के बावजूद कई कंपनियां घाटे में जाकर बंद हो जा...

21वीं सदी में विश्व का वर्तमान और भविष्य : युद्ध नहीं, बुद्ध चाहिए

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21वीं सदी में विश्व का वर्तमान और भविष्य : युद्ध नहीं, बुद्ध चाहिए 21वीं सदी का विश्व विज्ञान, तकनीक, वैश्वीकरण और आर्थिक समृद्धि के नए शिखरों को छू रहा है, किन्तु इसी समय मानवता अनेक संकटों से भी जूझ रही है। युद्ध, आतंकवाद, धार्मिक उन्माद, नस्लीय संघर्ष, आर्थिक असमानता, पर्यावरण विनाश, मानसिक तनाव और सामाजिक विघटन जैसे प्रश्न आज सभ्यता के सामने खड़े हैं। भौतिक प्रगति के बावजूद मनुष्य का मन अशांत है। ऐसे समय में विश्व को केवल शक्ति, पूंजी और तकनीक नहीं, बल्कि दिशा देने वाले दर्शन की आवश्यकता है। यही कारण है कि आज दुनिया को “युद्ध” नहीं, “बुद्ध” चाहिए। भारत की प्राचीन सांस्कृतिक चेतना सदैव विश्वकल्याण की रही है। “वसुधैव कुटुम्बकम्” केवल एक श्लोक नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के लिए भारत का शाश्वत संदेश है। इसका अर्थ है—यह सम्पूर्ण पृथ्वी एक परिवार है। आधुनिक समय में यही भाव “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास” के रूप में अभिव्यक्त होता है। भारत विश्व को प्रतियोगिता का रणक्षेत्र नहीं, सहयोग का परिवार मानता है। इसी दृष्टि की जड़ें भगवान बुद्ध की शिक्षाओं में भी दिखाई देती हैं। बुद्ध...

विकास का 'ग्रीन' कवच या सामरिक घेराबंदी? ग्रेट निकोबार का सच

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  विकास का 'ग्रीन' कवच या सामरिक घेराबंदी? ग्रेट निकोबार का सच भूमिका अक्सर कहा जाता है कि राजनीति में जो दिखता है, वह होता नहीं और जो होता है, वह आसानी से दिखता नहीं। बंगाल के चुनावों की गहमागहमी के बीच राहुल गांधी का अचानक अंडमान की यात्रा पर निकलना और उससे पहले सोनिया गांधी का निकोबार के पर्यावरण पर भावुक लेख लिखना, केवल 'प्रकृति प्रेम' का मामला नहीं है। यह भारत की उभरती समुद्री शक्ति और वैश्विक भू-राजनीति (Geopolitics) के उस शतरंज का हिस्सा है, जिसकी बिसात हिंद महासागर में बिछी है। 1. ग्रेट निकोबार: सिर्फ एक द्वीप नहीं, भारत का 'अनसिंकेबल एयरक्राफ्ट कैरियर' भारत सरकार का ₹75,000 करोड़ का 'ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट' कोई साधारण कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट नहीं है। गालथेया बे में बनने वाला कंटेनर पोर्ट और INS Baaz जैसे एयरबेस का विस्तार भारत को मलक्का जलडमरूमध्य (Strait of Malacca) का द्वारपाल बना देगा। दुनिया का 25% व्यापार और चीन का 80% तेल आयात इसी संकरे रास्ते से गुजरता है। अगर भारत यहां अपनी सैन्य मौजूदगी मजबूत करता है, तो युद्ध या तनाव की स्थि...