कार्य का स्वरूप बदल सकता है, लेकिन मूल तत्व नहीं: डॉ. मोहन भागवत
कार्य का स्वरूप बदल सकता है, लेकिन मूल तत्व नहीं: डॉ. मोहन भागवत जब कोई संगठन सफलता के शिखर पर पहुँचता है, तो समाज में उसकी प्रतिष्ठा, संसाधन और उसके प्रति विश्वास का बढ़ना स्वाभाविक है। लेकिन क्या सफलता के इस दौर में संगठन अपने उन मूल सिद्धांतों पर टिका रह पाता है, जिनके दम पर उसकी नींव रखी गई थी? नागपुर में आयोजित एक हालिया कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने इसी गंभीर विषय पर मार्गदर्शन किया। नागपुर के लक्ष्मीनगर स्थित साइंटिफिक सोसायटी सभागार में 'डॉ. हेडगेवार – आधुनिक युग के शालिवाहन' यूट्यूब वीडियो के सार्वजनिक प्रसारण और मिलिंद रहाटगांवकर की दृकश्रव्य श्रृंखला के 101वें भाग के लोकार्पण के अवसर पर उन्होंने संगठन और स्वयंसेवकों के सामने आने वाली समकालीन चुनौतियों और उनके दायित्वों को रेखांकित किया। 1. विस्तार के दौर में सबसे बड़ी चुनौती: मूल तत्वों का संरक्षण डॉ. मोहन भागवत जी ने स्पष्ट रूप से कहा कि समय के साथ किसी भी संगठन के कार्य का विस्तार होता है, उसकी प्रतिष्ठा बढ़ती है और समाज में उसके प्रति विश्वास व सम्मान ...