जौहर को कायरता कहना कितना उचित?
जौहर को कायरता कहना कितना उचित? इतिहास, स्त्री अस्मिता और उस दौर की कठोर सच्चाई किसी भी सभ्यता के इतिहास में कुछ ऐसे अध्याय होते हैं, जिन्हें पढ़ते समय केवल तथ्य नहीं, उस समय की मनःस्थिति को भी समझना पड़ता है। जौहर उन्हीं अध्यायों में से एक है। आज के समय में सामूहिक आत्मदाह की कल्पना ही मन को विचलित कर देती है। आधुनिक समाज में जीवन की रक्षा सर्वोच्च मूल्य है और आत्मदाह किसी भी परिस्थिति में स्वीकार्य समाधान नहीं माना जा सकता। लेकिन क्या इसी आधुनिक दृष्टि को लेकर हम मध्यकालीन युद्धों में हुए जौहर को सीधे “कायरता” कह सकते हैं? मेरा उत्तर है— नहीं। जौहर का समर्थन करना और जौहर को ऐतिहासिक संदर्भ में समझना, ये दोनों अलग बातें हैं। किसी त्रासद घटना को समझना उसका महिमामंडन करना नहीं होता। और इतिहास को समझने के लिए सबसे पहले हमें उस काल के युद्ध, पराजित समाज की स्थिति, महिलाओं की सुरक्षा, बंदी बनाए जाने की आशंका और उस समय के सम्मान-बोध को समझना होगा। जौहर आखिर था क्या? जौहर को सामान्यतः ऐसी युद्धकालीन परिस्थिति से जोड़ा जाता है, जब किसी किले की पराजय निश्चित हो जाती थी और महिलाओं को शत्रु द्...