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हम भी सही, आप भी सही : संघर्ष के बजाय सह-अस्तित्व की हिंदू दृष्टि

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हम भी सही, आप भी सही : संघर्ष के बजाय सह-अस्तित्व की हिंदू दृष्टि क्या किसी दूसरे का सही होना हमारे गलत होने का प्रमाण है? क्या अपने विचार पर दृढ़ रहने के लिए यह आवश्यक है कि हम दूसरे के विचार को गलत सिद्ध करें? और क्या दुनिया में शांति तभी संभव है जब सब लोग एक जैसा सोचें, एक जैसी पूजा करें और एक जैसी जीवन पद्धति अपनाएं? इन प्रश्नों के उत्तर की तलाश में जब हम भारतीय चिंतन की ओर देखते हैं तो एक अत्यंत सरल, किंतु गहरी बात सामने आती है हम भी सही हैं, आप भी सही हैं। पहली दृष्टि में यह वाक्य बहुत सामान्य लगता है। लेकिन इसके भीतर एक ऐसी जीवन दृष्टि छिपी है जो मनुष्य को अपने सत्य पर दृढ़ रहते हुए भी दूसरे के अस्तित्व और उसकी सत्य की खोज का सम्मान करना सिखाती है। यही वह दृष्टि है जो विविधता को संघर्ष नहीं मानती और एकता को एकरूपता नहीं समझती। लंदन में 6 सितंबर 2026 को आयोजित Celebration of Oneness में डॉ मोहन भागवत ने इसी भाव को सामने रखते हुए कहा कि हिंदू दृष्टि में विविधताओं को स्वीकार करने का भाव है और अलग अलग मार्गों के माध्यम से एक ही परम सत्य तक पहुंचने की संभावना को स्वीकार किया जाता है।...

विविधता स्वाभाविक है, एकता सत्य है : हिंदू चिंतन में अनेकता के भीतर एकात्मता

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विविधता स्वाभाविक है, एकता सत्य है दुनिया को देखकर एक प्रश्न बार बार सामने आता है। इतने अलग अलग लोग हैं, इतनी अलग भाषाएं हैं, अलग वेशभूषाएं हैं, अलग पूजा पद्धतियां हैं, अलग विचार हैं, अलग संस्कृतियां हैं, फिर भी मनुष्य एक दूसरे के इतने निकट क्यों आते हैं और इतनी बार एक दूसरे से टकराते भी क्यों हैं? क्या मनुष्य की शांति के लिए सबका एक जैसा होना आवश्यक है? क्या एकता का अर्थ समानता है? क्या विविधता अपने आप में संघर्ष का कारण है? या फिर समस्या विविधता में नहीं, बल्कि विविधता को स्वीकार न कर पाने वाली मानसिकता में है? लंदन में आयोजित Celebration of Oneness के संवाद में हिंदू चिंतन के इसी अत्यंत महत्वपूर्ण पक्ष पर प्रकाश डाला गया। विचार सामने आया कि विविधता कोई विकृति नहीं है। वह प्रकृति का स्वभाव है। आवश्यकता इस बात की है कि विविधता के भीतर विद्यमान एकता को पहचाना जाए। यही भारतीय दृष्टि का एक महत्वपूर्ण सूत्र है। विविधता स्वाभाविक है और एकता सत्य है। यह विचार हिंदू चिंतन की उस व्यापक दृष्टि से जुड़ा है जो विविधताओं को स्वीकार और सम्मान करने तथा उनके भीतर अस्तित्व की एकता को देखने की बात करत...

Celebration of Oneness 2: हिंदू कौन है? पूजा-पद्धति से परे एक व्यापक जीवन-दृष्टि |

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   हिंदू कौन है? पूजा-पद्धति से परे एक व्यापक जीवन-दृष्टि हिंदू कौन है? ‘हिंदू’ शब्द सुनते ही हमारे मन में क्या आता है? कोई पूजा-पद्धति? कोई धार्मिक पहचान? कोई विशेष जीवन-शैली? या फिर भारतीय सभ्यता से जुड़ी कोई ऐसी व्यापक दृष्टि, जिसके भीतर अनेक विचार, अनेक पंथ, अनेक परंपराएँ और अनेक जीवन-पद्धतियाँ साथ-साथ चलती रही हैं? यह प्रश्न जितना सरल दिखाई देता है, उतना ही गहरा है। लंदन में 6 सितंबर 2026 को आयोजित ‘Celebration of Oneness’ संवाद में हिंदू की प्रकृति और हिंदुत्व को लेकर इसी प्रश्न पर महत्वपूर्ण विचार सामने आए। वहाँ हिंदू को केवल किसी धार्मिक अभ्यास या जीवन-शैली के आधार पर समझने के बजाय ऐसी व्यापक प्रकृति के रूप में देखने की बात कही गई, जो विविधताओं को स्वीकार करती है, उनका सम्मान करती है और उनमें निहित एकता को पहचानती है। यहीं से इस प्रश्न की वास्तविक यात्रा शुरू होती है— क्या हिंदू होना किसी एक पूजा-पद्धति को मानना है, या विविधता में एकता को जीने की एक प्रकृति? हिंदू को केवल पूजा से समझना पर्याप्त क्यों नहीं? किसी व्यक्ति की धार्मिक पहचान को समझने के लिए सामान्यतः उसकी प...