रामोन्मुख भारत: सभ्यता का पुनरुत्थान और वैचारिक विजय
रामोन्मुख भारत: सभ्यता का पुनरुत्थान और वैचारिक विजय भारतीय इतिहास के पन्नों में कुछ क्षण ऐसे आते हैं, जो केवल सत्ता परिवर्तन के प्रतीक नहीं होते, बल्कि एक सभ्यता के पुनर्जागरण का शंखनाद होते हैं। आज भारत जिस मोड़ पर खड़ा है, वहाँ अतीत और वर्तमान एक-दूसरे से गुत्थमगुत्था हैं। जो लोग इतिहास को केवल बीता हुआ कल मानते हैं, वे शायद उस 'आलोड़न' को न समझ पाएँ, लेकिन जो आगत (भविष्य) के प्रति स्वप्नशील हैं, वे जानते हैं कि राम केवल एक पौराणिक पात्र नहीं, बल्कि हमारी आत्मा में बसने वाला वह शाश्वत स्वर हैं जो हर युग में अपनी भूमिका बदलकर अधर्म के विरुद्ध खड़े होते हैं। बंगाल और राम : भ्रांतियों का अंत अक्सर कुछ विद्वानों द्वारा यह तर्क दिया जाता रहा कि बंगाल केवल 'शाक्त' परंपरा की धरती है और वहाँ भगवान राम की उपस्थिति नहीं है। यह दावा किया गया कि रामनवमी बंगाल की संस्कृति का हिस्सा नहीं है और इसे बाहर से थोपा जा रहा है। परंतु सत्य इसके विपरीत है। बंगाल के मध्यकालीन कवि कृत्तिवास ने जब 'रामायण' की रचना की, तब उन्होंने राम और शक्ति के उसी अटूट संबंध को दर्शाया...