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लोकतंत्र का अदृश्य सेनापति : नानाजी देशमुख और लोक संघर्ष समिति का कमांड सेंटर

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लोकतंत्र का अदृश्य सेनापति : नानाजी देशमुख और लोक संघर्ष समिति का कमांड सेंटर लोकतंत्र पर ग्रहण — आपातकाल की अनकही गाथा (भाग–4) 4 जुलाई 1975 को प्रतिबंध लग चुका था। हजारों कार्यकर्ता बंदी बनाए जा चुके थे। समाचार-पत्रों पर पहरा था। देश के बड़े नेता जेलों में थे। सत्ता प्रतिष्ठान को विश्वास था कि अब प्रतिरोध की धारा सूख जाएगी। किन्तु कुछ ऐसा हुआ जिसकी शायद किसी ने कल्पना नहीं की थी। दिल्ली से लेकर पटना और बंगलौर से लेकर नागपुर तक एक नाम धीरे-धीरे प्रतिरोध की धुरी बनता जा रहा था। वह व्यक्ति न प्रधानमंत्री था। न मुख्यमंत्री। न संसद में था। और न ही उसके पास कोई सरकारी पद था। फिर भी संपूर्ण आपातकाल विरोधी संघर्ष का संचालन उसी के हाथों में आने लगा। आखिर कौन था यह व्यक्ति? और क्यों लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने उस पर इतना विश्वास किया? जब लोकनायक ने एक प्रचारक के कंधों पर रखा आंदोलन का भार 25 जून 1975 की रात के साथ ही देश का राजनीतिक नेतृत्व कारागारों में भेजा जाने लगा। परिस्थितियाँ असाधारण थीं। ऐसे समय लोकनायक जयप्रकाश नारायण को भलीभाँति ज्ञात था कि संघर्ष को निरंतर चलाने के लिए केवल भाषण पर्याप...

जब हजारों स्वयंसेवक भूमिगत हुए : लोकतंत्र बचाने की गुप्त लड़ाई

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जब हजारों स्वयंसेवक भूमिगत हुए : लोकतंत्र बचाने की गुप्त लड़ाई लोकतंत्र पर ग्रहण — आपातकाल की अनकही गाथा (भाग-3) 4 जुलाई 1975। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लग चुका था। सरसंघचालक बंदी बनाए जा चुके थे। हजारों कार्यकर्ता जेलों में थे। कार्यालयों पर ताले लटक चुके थे। समाचार-पत्रों पर सेंसरशिप का पहरा था। रेडियो शासन के नियंत्रण में था। और सत्ता प्रतिष्ठान को विश्वास था कि अब प्रतिरोध की अंतिम चिंगारी भी बुझ चुकी है। किन्तु इतिहास का एक नियम है— विचारों को कारागार में बंद किया जा सकता है, परंतु संकल्प को नहीं। इसी अंधकार के बीच एक ऐसी अदृश्य लड़ाई प्रारंभ हुई, जिसे न दूरदर्शन दिखा रहा था, न समाचार-पत्र लिख सकते थे। फिर भी वह चल रही थी। और इतनी व्यापक थी कि कुछ वर्षों बाद विदेशी पत्रकार भी उसके संगठन कौशल का उल्लेख करने लगे। लेकिन प्रश्न यह है कि जब सारे मार्ग बंद थे, तब यह संघर्ष चल कैसे रहा था? प्रतिबंध के बाद भी क्यों नहीं टूटा संगठन? शासन की सबसे बड़ी अपेक्षा यही थी कि शीर्ष नेतृत्व की गिरफ्तारी के बाद संगठन स्वतः निष्क्रिय हो जाएगा। क्योंकि अधिकांश राजनीतिक दलों का ढाँचा व्यक्तिय...

अफगानिस्तान: डूरंड रेखा, तालिबान, पश्तून और चाबहार पोर्ट से जुड़ी भारत की पूरी रणनीति

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अफगानिस्तान: डूरंड रेखा से चाबहार पोर्ट तक, भारत की रणनीति और एशिया का नया भू-राजनीतिक संघर्ष अफगानिस्तान: डूरंड रेखा, तालिबान, पश्तून और चाबहार पोर्ट से जुड़ी भारत की पूरी रणनीति- लेखन मनमोहन पुरोहित मनु महाराज  डूरंड रेखा क्या है? पश्तून कौन हैं? तालिबान कैसे उभरा? उत्तरी गठबंधन की भूमिका क्या रही? चाबहार पोर्ट भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है? जानिए अफगानिस्तान के इतिहास, भू-राजनीति और भारत की रणनीति का विस्तृत विश्लेषण। अफगानिस्तान: डूरंड रेखा से चाबहार पोर्ट तक, भारत की रणनीति और एशिया का नया भू-राजनीतिक संघर्ष प्रस्तावना: क्यों फिर दुनिया की नजर अफगानिस्तान पर है? अफगानिस्तान को यूँ ही "साम्राज्यों का कब्रिस्तान" नहीं कहा जाता। सिकंदर महान से लेकर ब्रिटिश साम्राज्य, सोवियत संघ और अमेरिका तक, हर महाशक्ति ने यहाँ अपने प्रभाव का विस्तार करने का प्रयास किया, लेकिन अंततः उसे भारी कीमत चुकानी पड़ी। आज भी अफगानिस्तान केवल एक देश नहीं, बल्कि एशिया की भू-राजनीतिक शतरंज का सबसे महत्वपूर्ण मोहरा है। इसकी अस्थिरता भारत, पाकिस्तान, चीन, रूस, ईरान और अमेरिका जैसे देशों की रणनीतियों को...