आपातकाल की सबसे बड़ी सीख : लोकतंत्र की रक्षा संविधान से नहीं, सजग समाज से होती है
आपातकाल की सबसे बड़ी सीख : लोकतंत्र की रक्षा संविधान से नहीं, सजग समाज से होती है लोकतंत्र पर ग्रहण — आपातकाल की अनकही गाथा (समापन अंक) 25 जून 1975। भारतीय लोकतंत्र की सबसे अंधकारमय रात्रि। 21 मार्च 1977। भारतीय लोकतंत्र की सबसे गौरवपूर्ण प्रभात। इन इक्कीस महीनों के बीच केवल एक राजनीतिक संघर्ष नहीं हुआ। यह सत्ता और संविधान के बीच संघर्ष था। यह अधिकार और अधिनायकवाद के बीच संघर्ष था। यह भय और साहस के बीच संघर्ष था। और सबसे बढ़कर— यह भारत की लोकतांत्रिक आत्मा की परीक्षा थी। पिछले नौ अंकों में हमने उस संपूर्ण यात्रा को समझने का प्रयास किया— कैसे लोकतंत्र पर ग्रहण लगा। कैसे संविधान की आत्मा पर प्रहार हुआ। कैसे समाचार-पत्र मौन कर दिए गए। कैसे हजारों लोकतंत्र सेनानी कारागारों में डाल दिए गए। कैसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सहित अनेक संगठनों के कार्यकर्ताओं ने भूमिगत रहकर प्रतिरोध का संचालन किया। कैसे लोक संघर्ष समिति ने समाज की चेतना को जीवित रखा। कैसे सत्याग्रह हुए। कैसे यातनाएँ दी गईं। कैसे मतपेटी ने अंततः सत्ता का निर्णय बदल दिया। किन्तु... क्या आपातकाल केवल इतिहास का एक बंद अध्याय है? ...