जब न्याय की प्रतीक्षा प्रतिशोध में बदल जाती है: दो फिल्मों के बहाने समाज के आक्रोश की पड़ताल
जब न्याय की प्रतीक्षा प्रतिशोध में बदल जाती है: दो फिल्मों के बहाने समाज के आक्रोश की पड़ताल सिनेमा केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं होता। कई बार वह समाज के भीतर वर्षों से सुलग रहे आक्रोश, असुरक्षा, न्याय व्यवस्था के प्रति अविश्वास और मानवीय संवेदनाओं को इस तरह पर्दे पर उतार देता है कि दर्शक केवल कहानी नहीं देखता, बल्कि स्वयं को उसके भीतर खड़ा हुआ महसूस करता है। हाल में चर्चित फिल्म 'धुरंधर' और विवादों में रही 'Citizen Vigilante' इसी श्रेणी की फिल्में हैं। दोनों की पृष्ठभूमि अलग है, पात्र अलग हैं और सामाजिक संदर्भ भी भिन्न हैं, लेकिन एक प्रश्न दोनों के केंद्र में समान रूप से उपस्थित है—यदि पीड़ित को न्याय मिलने की आशा समाप्त हो जाए, तो उसके भीतर जन्म लेने वाले प्रतिशोध को क्या केवल अपराध कहकर समझा जा सकता है? पीड़ा की पराकाष्ठा और एक भाई का आक्रोश 'धुरंधर' में घटनाएँ उस समय निर्णायक मोड़ लेती हैं, जब एक राजनीतिक रूप से प्रभावशाली परिवार के गुंडे नायक जस्सी के परिवार को बर्बाद कर देते हैं। पिता की हत्या, बहनों पर अत्याचार और छोटी बहन का अपहरण—इन घटनाओं के बाद जस्सी प...