'न्यू नॉर्मल' के नाम पर फैलाई जा रही सांस्कृतिक गंध: क्या सेलिब्रिटी संस्कृति भारतीय परिवार व्यवस्था का नया मानक गढ़ रही है?
'न्यू नॉर्मल' के नाम पर फैलाई जा रही सांस्कृतिक गंध: क्या सेलिब्रिटी संस्कृति भारतीय परिवार व्यवस्था का नया मानक गढ़ रही है?
आज के दौर में समाचार केवल सूचना नहीं रह गए हैं, वे समाज के विचारों और व्यवहारों को भी प्रभावित करते हैं। विशेष रूप से जब कोई प्रसिद्ध अभिनेता, खिलाड़ी या अन्य सेलिब्रिटी अपने निजी जीवन से जुड़ा निर्णय लेता है, तो मीडिया उसे सामान्य खबर की तरह नहीं बल्कि एक 'सेलिब्रेशन' के रूप में प्रस्तुत करता है।
हाल में एक चर्चित अभिनेता के तीसरे विवाह के दौरान उनकी पूर्व पत्नियों और बच्चों की उपस्थिति को कई मीडिया संस्थानों ने "परिपक्वता", "नई सोच" और "आधुनिक परिवार" के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया। स्वाभाविक प्रश्न यह है कि क्या यह केवल एक समाचार था, या इसके माध्यम से समाज को एक नया सामाजिक मानदंड भी दिखाया जा रहा था?
यहीं से "न्यू नॉर्मल" पर गंभीर विमर्श प्रारम्भ होता है।
'न्यू नॉर्मल' आखिर है क्या?
"New Normal" केवल अंग्रेजी का आकर्षक शब्द नहीं है।
संचार विज्ञान और समाजशास्त्र में इसका अर्थ है—
ऐसी बात जिसे पहले असामान्य माना जाता था, उसे लगातार दोहराकर सामान्य और स्वीकार्य बना देना।
यह प्रक्रिया धीरे-धीरे चलती है—
पहले चर्चा होती है।
फिर उसका महिमामंडन होता है।
फिर उसे आधुनिकता कहा जाता है।
और अंततः वह सामाजिक व्यवहार का नया मानक बन जाता है।
क्या मीडिया केवल समाचार दिखा रहा है?
यदि किसी प्रसिद्ध व्यक्ति का निजी निर्णय केवल सूचना के रूप में प्रकाशित हो तो वह पत्रकारिता है।
लेकिन जब उसी घटना को इन शब्दों में प्रस्तुत किया जाने लगे—
"मैच्योर रिलेशनशिप"
"मॉडर्न फैमिली"
"नई सोच"
"प्रोग्रेसिव समाज"
तो समाचार धीरे-धीरे सामाजिक संदेश का रूप लेने लगता है।
यहीं से मीडिया की भूमिका पर प्रश्न उठते हैं।
विवाह: अनुबंध नहीं, संस्कार
भारतीय सभ्यता में विवाह केवल दो व्यक्तियों का निजी समझौता नहीं है।
इसे संस्कार कहा गया है।
सप्तपदी के सात वचन केवल पति-पत्नी के लिए नहीं बल्कि दो परिवारों, आने वाली पीढ़ियों और सामाजिक उत्तरदायित्व के लिए भी होते हैं।
भारतीय परंपरा में विवाह का उद्देश्य केवल व्यक्तिगत सुख नहीं बल्कि—
परिवार की स्थिरता
संतानों का संतुलित पालन
सामाजिक उत्तरदायित्व
पीढ़ियों की निरंतरता
भी माना गया है।
सेलिब्रिटी संस्कृति क्यों प्रभावशाली होती है?
समाज मनोविज्ञान बताता है कि प्रसिद्ध व्यक्तियों का व्यवहार सामान्य नागरिकों की तुलना में अधिक प्रभाव डालता है।
युवा वर्ग प्रायः उन्हीं की—
जीवनशैली
पहनावा
भाषा
रिश्तों
जीवन-दर्शन
की नकल करता है।
इसी कारण मीडिया द्वारा प्रस्तुत प्रत्येक सेलिब्रिटी नैरेटिव केवल मनोरंजन नहीं रहता।
वह सामाजिक प्रभाव भी उत्पन्न करता है।
आधुनिकता और उत्तरदायित्व
आधुनिकता का अर्थ यह नहीं कि हर परंपरा अप्रासंगिक हो गई।
इसी प्रकार परंपरा का अर्थ यह भी नहीं कि व्यक्ति की स्वतंत्रता समाप्त हो जाए।
एक लोकतांत्रिक समाज में प्रत्येक वयस्क को अपने निजी निर्णय लेने का अधिकार है।
लेकिन उतना ही आवश्यक प्रश्न यह भी है—
क्या प्रत्येक निजी निर्णय को समाज का आदर्श घोषित कर देना उचित है?
यहीं स्वस्थ लोकतांत्रिक बहस की आवश्यकता है।
परिवार संस्था क्यों महत्वपूर्ण है?
विश्व के अधिकांश समाजों में परिवार को सामाजिक स्थिरता की सबसे छोटी इकाई माना जाता है।
परिवार केवल साथ रहने का नाम नहीं है।
वह—
संस्कार देता है।
जिम्मेदारी सिखाता है।
भावनात्मक सुरक्षा देता है।
सामाजिक अनुशासन विकसित करता है।
जब सार्वजनिक विमर्श में परिवार की स्थिरता की अपेक्षा केवल व्यक्तिगत विकल्पों का उत्सव अधिक दिखाई देता है, तब स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है कि सार्वजनिक संस्कृति किस दिशा में जा रही है।
क्या हर बदलाव प्रगति होता है?
इतिहास बताता है कि समाज लगातार बदलता है।
लेकिन प्रत्येक परिवर्तन स्वतः प्रगति नहीं कहलाता।
प्रगति वही है—
जिससे समाज अधिक स्थिर बने।
परिवार मजबूत हों।
बच्चों का हित सुरक्षित रहे।
उत्तरदायित्व बढ़े।
सामाजिक विश्वास मजबूत हो।
यदि किसी परिवर्तन से ये प्रश्न उत्पन्न होते हैं, तो उस पर चर्चा करना लोकतांत्रिक समाज का स्वाभाविक अधिकार है।
मीडिया के सामने भी कुछ प्रश्न
क्या समाचार संस्थानों को—
केवल सूचना देनी चाहिए?
या जीवनशैली भी निर्धारित करनी चाहिए?
क्या निजी जीवन का उत्सव सामाजिक आदर्श बन सकता है?
क्या परिवार संस्था पर भी समान गंभीरता से चर्चा होती है?
क्या विवाह की स्थिरता को भी उतना ही स्थान मिलता है जितना उसके टूटने के बाद के "सेलिब्रेशन" को?
ये प्रश्न किसी एक व्यक्ति के बारे में नहीं बल्कि मीडिया की प्राथमिकताओं के बारे में हैं।
निष्कर्ष
भारतीय संस्कृति परिवर्तन का विरोध नहीं करती।
भारत ने सदैव समयानुकूल सुधारों का स्वागत किया है।
लेकिन भारतीय चिंतन यह भी कहता है कि स्वतंत्रता के साथ उत्तरदायित्व भी होना चाहिए।
किसी भी व्यक्ति का निजी जीवन उसका अधिकार है।
साथ ही, समाज को यह अधिकार भी है कि वह सार्वजनिक विमर्श में प्रस्तुत किए जा रहे सांस्कृतिक संदेशों पर विचार करे, प्रश्न पूछे और यह तय करे कि किन मूल्यों को आने वाली पीढ़ियों के लिए आदर्श के रूप में सामने रखा जाना चाहिए।
"न्यू नॉर्मल" का अर्थ केवल नया होना नहीं होना चाहिए; उसका अर्थ समाज के दीर्घकालिक हित, परिवार की स्थिरता और उत्तरदायी नागरिकता के संदर्भ में भी परखा जाना चाहिए।
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