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​"वंदे मातरम्: 150 वर्षों के 'खंडित' वनवास से 'पूर्ण' गौरव की वापसी"

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वंदे मातरम्: खंडित पहचान से पूर्ण गौरव तक की सभ्यतागत यात्रा भूमिका भारतीय राष्ट्रवाद की आत्मा और स्वाधीनता संग्राम का महामंत्र 'वंदे मातरम्' एक बार फिर अपनी पूर्णता के साथ चर्चा के केंद्र में है। भारत सरकार द्वारा बंकिमचंद्र चटर्जी रचित इस कालजयी गीत को इसके मूल और संपूर्ण स्वरूप में गाने का निर्णय केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं है, बल्कि यह भारत की सभ्यतागत चेतना (Civilizational Consciousness) की पुनर्स्थापना की दिशा में एक निर्णायक कदम है। वर्षों तक जिस गीत को 'खंडित' करके गाया गया, उसे आज अपनी खोई हुई गरिमा वापस मिल रही है। 1. रचना की अमरता: 150 वर्षों का गौरवशाली इतिहास वंदे मातरम् महज़ एक कविता नहीं, बल्कि एक साक्षात् अनुभूति है। 1875 में अक्षय नवमी के दिन रचित यह गीत आज 150 वर्षों की यात्रा पूरी कर चुका है। बंगाल में अक्षय नवमी का अर्थ है—जिसका क्षय न हो। बंकिम बाबू ने जब मुर्शिदाबाद के लालगोला स्थित मंदिर में माँ काली के चित्र को बेड़ियों में जकड़ा देखा, तो उनके भीतर की पीड़ा ने एक 'रूपक' का आकार लिया। यह गीत पुस्तकों और पत्रिकाओं की सीमाओं को ला...

राजनीति विज्ञान या वैचारिक तानाशाही?

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राजनीति विज्ञान या वैचारिक तानाशाही? RSS पर प्रश्नों से डरने का 'बौद्धिक ढोंग' शेखावाटी विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान के प्रश्नपत्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े प्रश्नों पर खड़ा किया गया बवंडर शिक्षा की रक्षा नहीं, बल्कि बौद्धिक गुंडागर्दी का प्रयास है। जब विश्वविद्यालयों में किसी संगठन की विचारधारा, इतिहास और कार्यप्रणाली पर प्रश्न पूछे जाते हैं, तो वह 'अकादमिक अन्वेषण' होता है, लेकिन जैसे ही विषय आरएसएस होता है, उसे 'निंदनीय' और 'एजेंडा' बता दिया जाता है। यह रवैया शिक्षा नहीं, बल्कि एक शुद्ध वैचारिक तानाशाही है। घटना का संदर्भ: क्या था विवाद? हाल ही में पंडित दीनदयाल उपाध्याय शेखावाटी विश्वविद्यालय की परीक्षाओं में राजनीति विज्ञान के पर्चे में आरएसएस से संबंधित लगभग 8-10 प्रश्न पूछे गए। इनमें संघ की स्थापना, विचारधारा और समाज सेवा से जुड़े तथ्यात्मक सवाल थे। लेकिन कुछ राजनीतिक समूहों और तथाकथित बुद्धिजीवियों ने इसे "भगवाकरण" का नाम देकर सड़क से सोशल मीडिया तक हंगामा खड़ा कर दिया। 1. राजनीति विज्ञान: विश्लेषण या सुवि...

संसदीय पतन की पराकाष्ठा: लोकतंत्र के मंदिर में 'अराजकता' का सुनियोजित तंत्र

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संसदीय पतन की पराकाष्ठा: लोकतंत्र के मंदिर में 'अराजकता' का सुनियोजित तंत्र भारतीय लोकतंत्र का हृदय, संसद, आज एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहाँ 'विरोध' और 'विद्रोह' के बीच की रेखा धुंधली होती जा रही है। विपक्ष द्वारा अपनाए गए नए तौर-तरीके—जैसे सदन में पोस्टरबाजी, खान-पान और शोर-शराबा—महज तात्कालिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि संसदीय गरिमा को योजनाबद्ध तरीके से धूलधूसरित करने का एक षड्यंत्र प्रतीत होते हैं। 1. नियमों की धज्जियां उड़ाता 'विजुअल प्रोटेस्ट' लोकसभा की नियमावली का नियम 349 (xiv) स्पष्ट रूप से कहता है कि कोई भी सदस्य सदन में 'प्रदर्शनी की वस्तुएं' (Exhibits) या प्लेकार्ड नहीं लाएगा। इसके बावजूद, राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं द्वारा सदन के भीतर बार-बार पोस्टर लहराना और संविधान की प्रति को एक राजनीतिक औजार की तरह इस्तेमाल करना सीधे तौर पर 'कंटेंप्ट ऑफ द हाउस' (सदन की अवमानना) है। यह आचरण सदन की उस शुचिता पर प्रहार है जहाँ केवल शब्दों की मर्यादा से युद्ध जीता जाना चाहिए। 2. 'पिकनिक कल्चर' बनाम विधायी उत्तर...