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सिंध और बंगाल के लिए स्वायत्त हिंदू अल्पसंख्यक परिक्षेत्र की आवश्यकता

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बांग्लादेश में हिंदुओं की स्थिति अत्यंत भयावह है। हत्या, बलात्कार, मंदिरों का विध्वंस, और उत्पीड़न की घटनाएं लगातार जारी हैं। यह स्थिति तात्कालिक नहीं है बल्कि पिछले 75 वर्षों की सतत प्रताड़ना का अनन्त दौर है। इसके  बावजूद, बांग्लादेशी हिंदू समाज ने न तो कभी स्वतंत्रता की मांग की, न ही कोई प्रतिरोधी मोर्चा खड़ा किया। इसे सहिष्णुता की मूर्खता के स्तर तक कि पराकाष्ठा कहा जाए या भीरुता लगता है दोनों ही शब्द इसे ठीक से परिभाषित नही कर पाएंगे। लगभग डेढ़ करोड़ की जनसंख्या होने के बावजूद, उन्होंने अपने दुर्भाग्य को स्वीकार करते हुए एक गुलाम जीवन जीने का निश्चय कर लिया है। किसी भी प्रकार का राष्ट्रीय नेतृत्व वहां से उभरता नहीं दिखाई देता और न ही कोई सैन्य हिंदू मिलिशिया का गठन हुआ। दुर्भाग्य तो तब और अधिक हो जाता है जब बंग्लादेश से मुस्लिम शरणार्थी भारत आकर भारत की डेमोग्राफी बदलने पर आमादा है और वहां रह रहा हिन्दू वहीं नारकीय जीवन जीने को अपना भाग समझ बैठा है। इसके विपरीत, पाकिस्तान में बलोच समुदाय ने अपनी स्वतंत्रता के लिए संघर्ष जारी रखा है। वे सतत संघर्षशील है। ...