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विकास का 'ग्रीन' कवच या सामरिक घेराबंदी? ग्रेट निकोबार का सच

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  विकास का 'ग्रीन' कवच या सामरिक घेराबंदी? ग्रेट निकोबार का सच भूमिका अक्सर कहा जाता है कि राजनीति में जो दिखता है, वह होता नहीं और जो होता है, वह आसानी से दिखता नहीं। बंगाल के चुनावों की गहमागहमी के बीच राहुल गांधी का अचानक अंडमान की यात्रा पर निकलना और उससे पहले सोनिया गांधी का निकोबार के पर्यावरण पर भावुक लेख लिखना, केवल 'प्रकृति प्रेम' का मामला नहीं है। यह भारत की उभरती समुद्री शक्ति और वैश्विक भू-राजनीति (Geopolitics) के उस शतरंज का हिस्सा है, जिसकी बिसात हिंद महासागर में बिछी है। 1. ग्रेट निकोबार: सिर्फ एक द्वीप नहीं, भारत का 'अनसिंकेबल एयरक्राफ्ट कैरियर' भारत सरकार का ₹75,000 करोड़ का 'ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट' कोई साधारण कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट नहीं है। गालथेया बे में बनने वाला कंटेनर पोर्ट और INS Baaz जैसे एयरबेस का विस्तार भारत को मलक्का जलडमरूमध्य (Strait of Malacca) का द्वारपाल बना देगा। दुनिया का 25% व्यापार और चीन का 80% तेल आयात इसी संकरे रास्ते से गुजरता है। अगर भारत यहां अपनी सैन्य मौजूदगी मजबूत करता है, तो युद्ध या तनाव की स्थि...

1 मई या विश्वकर्मा जयंती: भारतीय श्रमिक चेतना का असली आधार क्या है?

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 1 मई या विश्वकर्मा जयंती: भारतीय श्रमिक चेतना का असली आधार क्या है? भारतीय श्रमिक आंदोलन के इतिहास में अक्सर यह सवाल उठता है कि दुनिया जब 1 मई को 'मई दिवस' मनाती है, तो भारतीय मजदूर संघ (BMS) जैसे संगठन इसे नकार कर विश्वकर्मा जयंती को राष्ट्रीय श्रमिक दिवस के रूप में क्यों प्रतिष्ठित करते हैं? यह केवल तारीख का बदलाव नहीं, बल्कि दो अलग-अलग विचारधाराओं और संस्कृतियों का संघर्ष है।  शिकागो की घटना: संघर्ष या विफलता? मई दिवस का इतिहास 1886 के शिकागो (अमेरिका) के 'हेमार्केट स्क्वायर' की घटना से जुड़ा है। अक्सर इसे श्रमिकों की जीत बताया जाता है, लेकिन गहराई से देखें तो यह आंदोलन अपनी गलत रणनीतियों और हिंसा के कारण विफल रहा था। जिस 8 घंटे के कार्य समय की मांग के लिए यह हुआ, उसे अमेरिकी सरकार ने बहुत पहले (1868 में) ही सैद्धांतिक रूप से स्वीकार कर लिया था। 1 मई को हुई हड़ताल तो शांतिपूर्ण थी, लेकिन 3 और 4 मई को हुई हिंसा ने पूरे अमेरिकी श्रमिक आंदोलन को वर्षों पीछे धकेल दिया। दिलचस्प बात यह है कि आज स्वयं अमेरिका मई दिवस को श्रमिक दिवस के रूप में नहीं मनाता। वहां सित...

संबलन का वास्तविक अर्थ: कक्षा में बदलाव, न कि केवल रिपोर्ट में

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संबलन का वास्तविक अर्थ: कक्षा में बदलाव, न कि केवल रिपोर्ट में आज राजकीय प्राथमिक विद्यालय, सांसी बस्ती (फलोदी शहर की पिछड़ी बस्ती) में मासिक संबलन के दौरान एक ऐसा अनुभव सामने आया, जिसने स्पष्ट कर दिया कि संबलन और निरीक्षण में कितना बड़ा अंतर है। यह विद्यालय मेरे UCEEO क्षेत्र में आता है। विद्यालय में कुल नामांकन 42 छात्र है और 3 शिक्षक कार्यरत हैं। कक्षा व्यवस्था की वास्तविक स्थिति निरीक्षण के दौरान कक्षा 1, 2, 3, 4 और 5 के कुल 15 बच्चे एक साथ एक ही कक्षा में बैठे पाए गए। स्पष्ट रूप से कक्षा व्यवस्था अस्त-व्यस्त थी। यहाँ एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया— मल्टी ग्रेड होना स्वयं में समस्या नहीं है, समस्या यह है कि जब 3 शिक्षक उपलब्ध हैं, तो कम से कम 3 अलग-अलग समूहों में कक्षाएं संचालित की जानी चाहिए थीं। परंतु ऐसा नहीं किया गया। यह स्पष्ट रूप से शिक्षकों के स्तर पर कार्य निष्पादन की कमी को दर्शाता है। संबलन या केवल औपचारिकता? सामान्यतः संबलनकर्ता अधिकारी शाला संबलन एप में जानकारी भरकर अपना लक्ष्य पूरा कर लेते हैं। मैं भी ऐसा कर सकता था— डेटा भरता, रिपोर्ट अपलोड करता और आगे बढ़ ज...

भारत की ‘स्व’देशी जीवन-शैली में ‘स्व’ के आयाम

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भारत की ‘स्व’देशी जीवन-शैली में ‘स्व’ के आयाम डॉ. मनमोहन वैद्य (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय कार्यकारिणी के सदस्य)  भारत की स्वदेशी जीवन-शैली में निहित ‘स्व’ के भारत में निर्मित वस्तुओं का प्रधानतः उपयोग करने के साथ भी अनेक महत्वपूर्ण पहलू हैं। भारत की शिक्षा-पद्धति के मूल्यांकन के लिए 1964–1966 के दौरान डॉ. डी. एस. कोठारी के नेतृत्व में एक आयोग का गठन किया गया था। इस आयोग का एक प्रमुख निष्कर्ष यह था कि भारत का वैचारिक जगत यूरोप-केंद्रित हो गया है, जबकि उसे भारत-केंद्रित होना चाहिए। इस तथ्य को समझने के लिए कुछ समकालीन उदाहरणों पर दृष्टि डालना उपयोगी होगा। दृष्टिकोण का परिवर्तन : यूरोप से भारत की ओर – मध्य - पूर्व नहीं, पश्चिम एशिया आज इज़राइल और हमास के बीच जो युद्ध चल रहा है, उसे भारत सहित पूरी दुनिया की मीडिया “मध्य-पूर्व (Middle East)” क्षेत्र का युद्ध कह रही है। स्वतंत्रता के बाद भी भारत लंबे समय तक उस भूभाग को इसी नाम से संबोधित करता रहा। किंतु हाल ही में भारत के विदेश मंत्रालय ने उसे “पश्चिम एशिया” कहना आरंभ किया है। प्रश्न ...

काल और मोक्ष का संगम: जब काशी के द्वार पहुँची उज्जैन की 'वैदिक घड़ी'

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काल और मोक्ष का संगम: जब काशी के द्वार पहुँची उज्जैन की 'वैदिक घड़ी' "कालचक्राय नमः" भारत की धरती हमेशा से ज्ञान और विज्ञान की जननी रही है। एक दौर था जब दुनिया समय को समझने की कोशिश कर रही थी, तब हमारे ऋषि-मुनि नक्षत्रों की चाल और ब्रह्मांड की लय पर अपनी दिनचर्या निर्धारित कर रहे थे। इसी गौरवशाली परंपरा को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़ते हुए, हाल ही में एक ऐतिहासिक घटना घटी है— विश्व की प्रथम 'विक्रमादित्य वैदिक घड़ी' की काशी विश्वनाथ मंदिर में स्थापना। 1. उज्जैन और काशी: दो जीवंत नगरों का महामिलन भारतीय संस्कृति में उज्जैन को 'काल की राजधानी' (महाकाल की नगरी) माना जाता है, जहाँ से कभी दुनिया की समय गणना (Prime Meridian) शुरू होती थी। वहीं, काशी 'मोक्ष की नगरी' है, जहाँ जीवन अपने अंतिम सत्य से मिलता है। जब मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की पहल पर उज्जैन की यह 'वैदिक घड़ी' बाबा विश्वनाथ के प्रांगण में स्थापित हुई, तो यह केवल एक यंत्र की स्थापना नहीं, बल्कि काल (Time) और मोक्ष (Liberation) के बीच एक शाश्वत संवाद की शुरुआत ...