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आत्मनिर्भर भारत: स्वदेशी संकल्प और वैश्विक चुनौतियों का जवाब

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आत्मनिर्भर भारत: स्वदेशी संकल्प और वैश्विक चुनौतियों का जवाब "देश उठेगा अपने पैरों निज गौरव के     भान से। स्नेह भरा विश्वास जगाकर जीयें सुख सम्मान से।।" —  नंदलाल 'बाबा जी'  भारत आज जिस मोड़ पर खड़ा है, वहाँ चुनौतियाँ भी हैं और अवसर भी। ट्रंप प्रशासन के 60% आयात शुल्क और H1B1 वीज़ा प्रतिबंधों जैसी वैश्विक परिस्थितियों ने भारत को झकझोरा, लेकिन यह झटका भारत के लिए आत्मविश्वास की नई यात्रा की शुरुआत बना। ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान और इसके सहायक मिशन—मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया, स्किल इंडिया और उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना (PLI)—ने इन चुनौतियों को अवसर में बदल दिया। यह कहानी केवल योजनाओं और आंकड़ों की नहीं, बल्कि उस स्वदेशी गौरव की है, जो हमें अपने पैरों पर खड़ा होना और आत्मसम्मान के साथ आगे बढ़ना सिखाती है। स्वदेशी गौरव की नींव बाबा जी के इसी गीत की पंक्ति कितनी सत्य है। “परावलम्बी देश जगत में,  कभी न यश पा सकता है”  यह आत्मनिर्भर भारत का सार है। 2020 में कोविड संकट के बीच इस अभियान की शुरुआत हुई और इसका लक्ष्य आर्थिक, तकनीकी और स...

"शिक्षा नीति : वर्तमान और भविष्य की आधारशिला"

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✍️ "शिक्षा नीति : वर्तमान और भविष्य की आधारशिला"   भारत आज ऐसे ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है जहाँ वह "विकसित भारत @2047" की संकल्पना को साकार करने की ओर तेजी से अग्रसर है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने "आत्मनिर्भर भारत" और "विकसित भारत" का जो स्वप्न देखा है, उसकी बुनियाद शिक्षा है। महात्मा गांधी ने कहा था, "शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य चरित्र निर्माण है।" यह विचार भारत के संपूर्ण विकास के मूल में है। भारतीय शिक्षा : एक गौरवशाली परंपरा भारत की प्राचीन शिक्षा परंपरा विश्व की सबसे पुरानी और समृद्ध परंपराओं में से एक रही है। तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला, वल्लभी और उज्जयिनी जैसे प्राचीन विश्वविद्यालयों ने भारत को ज्ञान का वैश्विक केंद्र बनाया। गुरुकुल परंपरा में विद्यार्थियों को न केवल शास्त्रों का ज्ञान दिया जाता था, बल्कि जीवन मूल्यों, प्रकृति के प्रति प्रेम, आत्मनिर्भरता और चरित्र निर्माण की शिक्षा भी दी जाती थी। आचार्य चाणक्य का कथन है— "शिक्षा सबसे बड़ा धन है, जिसे कोई चुरा नहीं सकता।" यही भारतीय दर्शन...

राहुल गांधी की चुनावी 'बमबारी' और जेन-Z पर भड़कावे का खेल

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राहुल गांधी की राजनीतिक रणनीति इन दिनों चुनावी प्रक्रिया पर हमले करने की लग रही है, लेकिन उनके हर दावे की हकीकत जल्दी ही सामने आ जाती है। उनकी टीम द्वारा दिए जाने वाले अधपके सबूतों की वजह से ये आरोप जनता के सामने कुछ मिनट भी टिक नहीं पाते। प्रेस कॉन्फ्रेंस में ही इनकी पोल खुल जाती है, और जब वे फंसते हैं, तो राष्ट्रगान गवाकर बात टालने की कोशिश करते हैं – वो भी अधूरा। अब तक उन्होंने तीन बड़े 'धमाके' करने की कोशिश की है, लेकिन हर बार ये फुस्स साबित हुए। सबसे पहले महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के बाद उन्होंने वोटरों की संख्या में अचानक बढ़ोतरी और आखिरी घंटों में वोटिंग बढ़ने का हल्ला मचाया। लेकिन ये तो कोई नई बात नहीं – पूरे देश में शाम के समय वोटिंग में तेजी आना आम है, और इसके आंकड़े सार्वजनिक हैं। महाराष्ट्र के उनके सभी आरोपों को हिंदुस्तान टाइम्स ने गहन जांच के बाद गलत ठहराया। फिर कर्नाटक की एक विधानसभा सीट पर उन्होंने 'परमाणु बम' जैसा दावा किया, जो बाद में सुतली बम निकला। वोटर लिस्ट में गड़बड़ी का आरोप लगाया, लेकिन न तो चुनाव आयोग, डीएम या सीईओ के पास कोई औपचारि...

नेपाल की आग भारत की चिंता

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नेपाल में हाल की अराजकता ने न केवल काठमांडू की सड़कों को, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया की स्थिरता को हिला दिया है। एक मामूली सोशल मीडिया प्रतिबंध से शुरू हुआ विरोध प्रदर्शन "Gen Zee" (डिजिटल पीढ़ी) के नेतृत्व में एक बड़े आक्रोश में बदल गया, जिसने सत्ता के हर स्तंभ को निशाना बनाया। ऐसा माना जा रहा है। सच्चाई कुछ और है। दरअसल नेपाल में डीप स्टेट के दंगाई गुर्गों की गुंडागर्दी हुई है, इसको मीडिया द्वारा जेन-जी की क्रांति कहना बंद होना चाहिए । वर्तमान की भयावहता और अराजकता इस आंदोलन ने सबसे पहले कार्यपालिका पर हमला किया। प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली को इस्तीफ़ा देना पड़ा, और पूर्व प्रधानमंत्री प्रचंड के आवास पर भीड़ ने हमला किया। गृह और वित्त मंत्रियों सहित कई कैबिनेट सदस्यों को सुरक्षित ठिकानों की तलाश में भागना पड़ा, जिससे सरकार का केंद्र बिखर गया। इसके बाद, लोकतंत्र के अन्य स्तंभ भी सुरक्षित नहीं रहे। संसद भवन और सुप्रीम कोर्ट की ऐतिहासिक इमारतों में आग लगा दी गई। नेपाल की प्रशासनिक धड़कन माने जाने वाले सिंग्हा दरबार को ध्वस्त कर दिया गया। यह केवल सरकारी इमारतों का विध्व...

आरएसएस की 100 साल की यात्रा और बदलती छवि

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आरएसएस की 100 साल की यात्रा और बदलती छवि हाल ही में, दिल्ली में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में एक तीन दिवसीय कार्यक्रम का आयोजन हुआ। इस कार्यक्रम में, सरसंघचालक मोहन भागवत जी ने RSS की भूमिका, इतिहास और उद्देश्यों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने 200 से अधिक सवालों के धैर्यपूर्वक और संतोषजनक जवाब भी दिए। यह प्रश्न मन में उठता है कि, जब RSS पिछले कई दशकों से भारत के हर क्षेत्र में सक्रिय है—चाहे राजनीतिक हो या श्रमिक, कृषि हो या शिक्षा, प्रशासन हो या संस्कृति—फिर भी उसे अपने 100 साल पूरे होने के बाद अपने विचारों को साफ करने की ज़रूरत क्यों पड़ रही है? वास्तव में, जो संघ अब तक कहता-करता रहा है और जो देश-विदेश में उसकी छवि है, उसमें भारी अंतर है। संक्षेप में कहें, तो संघ आज भी ‘छवि-अभाव’ और ‘नकारात्मक धारणा’ का शिकार है। इसके तीन प्रमुख कारण हैं। 1. अद्वितीय संगठन और औपनिवेशिक मानसिकता पहला कारण यह है कि संघ एक अद्वितीय संगठन है, जिसका समकक्ष पश्चिमी सभ्यता में कहीं नहीं मिलता। भारतीय समाज का एक वर्ग जो आज भी औपनिवेशिक मानसिकता से ग्रस्त है, व...