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सेक्युलरिज्म की भ्रामक अवधारणा: भारतीय परिप्रेक्ष्य में पुनर्विश्लेषण

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सेक्युलरिज्म की भ्रामक अवधारणा: भारतीय परिप्रेक्ष्य में पुनर्विश्लेषण सेक्युलरिज्म की भ्रामक अवधारणा: भारतीय परिप्रेक्ष्य में पुनर्विश्लेषण हाल ही में पुणे में एक न्यायालय भवन की आधारशिला रखते समय आयोजित  ‘भूमि-पूजन’  कार्यक्रम पर  सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश अभय एस. ओका  ने टिप्पणी की कि न्यायालय परिसर में किसी भी प्रकार की  पूजा-अर्चना या दीप-प्रज्वलन  जैसे अनुष्ठानों को समाप्त कर देना चाहिए। उनके अनुसार, ऐसे अवसरों पर  संविधान की प्रस्तावना  के समक्ष सिर झुकाकर  पंथनिरपेक्षता को बढ़ावा दिया जाना चाहिए । इससे पहले,  सेवानिवृत्त न्यायाधीश कुरियन जोसेफ  ने भी सर्वोच्च न्यायालय के आदर्श वाक्य  ‘यतो धर्मस्ततो जयः’  (जहां धर्म है, वहां जय है) को बदलने की वकालत की थी। उनका मत था कि सत्य ही संविधान है, जबकि धर्म सदा सत्य नहीं होता। उन्होंने यह भी प्रश्न उठाया कि जब अन्य राष्ट्रीय संस्थानों और उच्च न्यायालयों में  ‘सत्यमेव जयते’  को आदर्श वाक्य के रूप में स्वीकार किया गया है, तो फिर  सर्वोच्च न्यायालय का आदर्श ...