राजनीति विज्ञान या वैचारिक तानाशाही?



राजनीति विज्ञान या वैचारिक तानाशाही? RSS पर प्रश्नों से डरने का 'बौद्धिक ढोंग'
शेखावाटी विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान के प्रश्नपत्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े प्रश्नों पर खड़ा किया गया बवंडर शिक्षा की रक्षा नहीं, बल्कि बौद्धिक गुंडागर्दी का प्रयास है। जब विश्वविद्यालयों में किसी संगठन की विचारधारा, इतिहास और कार्यप्रणाली पर प्रश्न पूछे जाते हैं, तो वह 'अकादमिक अन्वेषण' होता है, लेकिन जैसे ही विषय आरएसएस होता है, उसे 'निंदनीय' और 'एजेंडा' बता दिया जाता है। यह रवैया शिक्षा नहीं, बल्कि एक शुद्ध वैचारिक तानाशाही है।
घटना का संदर्भ: क्या था विवाद?
हाल ही में पंडित दीनदयाल उपाध्याय शेखावाटी विश्वविद्यालय की परीक्षाओं में राजनीति विज्ञान के पर्चे में आरएसएस से संबंधित लगभग 8-10 प्रश्न पूछे गए। इनमें संघ की स्थापना, विचारधारा और समाज सेवा से जुड़े तथ्यात्मक सवाल थे। लेकिन कुछ राजनीतिक समूहों और तथाकथित बुद्धिजीवियों ने इसे "भगवाकरण" का नाम देकर सड़क से सोशल मीडिया तक हंगामा खड़ा कर दिया।
1. राजनीति विज्ञान: विश्लेषण या सुविधा का पाठ?
राजनीति विज्ञान कोई कविता-पाठ नहीं है कि सिर्फ "सुविधाजनक विचार" ही पढ़ाए जाएँ। यह एक गंभीर अनुशासन है। आरएसएस भारत का कोई गुमनाम संगठन नहीं, बल्कि 100 वर्षों से सक्रिय विश्व का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन है। यदि राजनीति विज्ञान का छात्र उस संगठन के बारे में नहीं पढ़ेगा जिसने भारतीय राजनीति की दिशा और दशा को प्रभावित किया है, तो उसकी शिक्षा अधूरी है।
> तुलनात्मक उदाहरण: दशकों तक भारतीय विश्वविद्यालयों में कार्ल मार्क्स, लेनिन, माओ और ग्राम्शी की विचारधाराएं पढ़ाई गईं। वामपंथी आंदोलनों पर पूरे-पूरे अध्याय लिखे गए। तब इसे "शैक्षणिक स्वतंत्रता" और "वैश्विक दृष्टिकोण" कहा गया। लेकिन जैसे ही अपनी मिट्टी से जुड़े संगठन पर प्रश्न आए, अचानक 'निष्पक्षता' खतरे में आ गई। यह पाखंड नहीं तो और क्या है?
2. छात्रों की मेधा का अपमान
यह तर्क देना कि ऐसे प्रश्नों से विद्यार्थियों पर "वैचारिक प्रभाव" पड़ेगा, छात्रों की मेधा का अपमान है। क्या हमारे विद्यार्थी इतने कमजोर हैं कि एक प्रश्नपत्र उनके विचारों को बदल देगा? शिक्षा का उद्देश्य ही विचारों से टकराना सिखाना है, उनसे भागना नहीं। जो लोग इन प्रश्नों का विरोध कर रहे हैं, वे दरअसल छात्रों को 'वैचारिक कूपमंडूक' बनाना चाहते हैं।
3. वैचारिक वर्चस्व बचाने की छटपटाहट
दरअसल समस्या प्रश्नों की संख्या नहीं, बल्कि उस 'इकोसिस्टम' को मिलने वाली चुनौती है जो वर्षों से विश्वविद्यालयों को अपनी विचारधारा का अड्डा बनाए बैठा था। उन्हें अब बहस और संतुलन से डर लगने लगा है।
 * क्या प्रश्न पाठ्यक्रम से बाहर थे? नहीं। * क्या प्रश्न गलत थे? नहीं। विवाद सिर्फ इसलिए है क्योंकि यह उनकी तय की गई "सेक्युलर लकीर" के बाहर का विषय है।
4. पराकाष्ठा: बौद्धिक फासीवाद की ओर
अगर आज विश्वविद्यालय को यह डराया गया कि वह क्या पूछे और क्या न पूछे, तो कल को इतिहास के पन्नों से उन महानायकों को भी मिटा दिया जाएगा जो एक विशेष वर्ग को पसंद नहीं हैं। यह बौद्धिक फासीवाद का लक्षण है, जहाँ असहमति की जगह केवल प्रतिबंध और शोरशराबा ले लेता है।
निष्कर्ष: विश्वविद्यालयों को झुकना नहीं चाहिए
यह लड़ाई केवल एक प्रश्नपत्र की नहीं है। यह लड़ाई अकादमिक स्वायत्तता बनाम वैचारिक दबाव की है। विश्वविद्यालयों को चेतावनी देना और प्रश्नपत्रों पर पहरा बैठाना बंद होना चाहिए।
सत्ता और समाज को संज्ञान लेना होगा:
विश्वविद्यालय वह स्थान है जहाँ हर विचार को तराशा जाना चाहिए। यदि हम संघ, जनसंघ या किसी भी दक्षिणपंथी विचारधारा को अकादमिक चर्चा से बाहर रखेंगे, तो हम राजनीति विज्ञान के साथ न्याय नहीं करेंगे। डर के दम पर शिक्षा नहीं, बल्कि केवल प्रोपेगेंडा चलता है। शेखावाटी विश्वविद्यालय की घटना एक चेतावनी है कि बौद्धिक जगत के 'स्वयंभू ठेकेदार' अब चर्चा से भाग रहे हैं।

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