संसदीय पतन की पराकाष्ठा: लोकतंत्र के मंदिर में 'अराजकता' का सुनियोजित तंत्र
संसदीय पतन की पराकाष्ठा: लोकतंत्र के मंदिर में 'अराजकता' का सुनियोजित तंत्र
भारतीय लोकतंत्र का हृदय, संसद, आज एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहाँ 'विरोध' और 'विद्रोह' के बीच की रेखा धुंधली होती जा रही है। विपक्ष द्वारा अपनाए गए नए तौर-तरीके—जैसे सदन में पोस्टरबाजी, खान-पान और शोर-शराबा—महज तात्कालिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि संसदीय गरिमा को योजनाबद्ध तरीके से धूलधूसरित करने का एक षड्यंत्र प्रतीत होते हैं।
1. नियमों की धज्जियां उड़ाता 'विजुअल प्रोटेस्ट'
लोकसभा की नियमावली का नियम 349 (xiv) स्पष्ट रूप से कहता है कि कोई भी सदस्य सदन में 'प्रदर्शनी की वस्तुएं' (Exhibits) या प्लेकार्ड नहीं लाएगा। इसके बावजूद, राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं द्वारा सदन के भीतर बार-बार पोस्टर लहराना और संविधान की प्रति को एक राजनीतिक औजार की तरह इस्तेमाल करना सीधे तौर पर 'कंटेंप्ट ऑफ द हाउस' (सदन की अवमानना) है। यह आचरण सदन की उस शुचिता पर प्रहार है जहाँ केवल शब्दों की मर्यादा से युद्ध जीता जाना चाहिए।
2. 'पिकनिक कल्चर' बनाम विधायी उत्तरदायित्व
सदन के भीतर चाय पीना या वेल में बैठकर जलपान करना उस मर्यादा का हनन है जिसे संसदीय शिष्टाचार (Parliamentary Etiquette) के तहत 'अपराध' माना जाता है। जब सांसद वेल में अराजकता फैलाते हैं, तो वे नियम 374 के उल्लंघन के दोषी होते हैं, जो सदन की कार्यवाही में जानबूझकर बाधा डालने से संबंधित है। यह "पिकनिक कल्चर" देश के करोड़ों करदाताओं के पैसे और समय का आपराधिक दुरुपयोग है।
3. ऐतिहासिक गिरावट और षड्यंत्र का संकेत
इतिहास गवाह है कि महान संसदविद् जैसे अटल बिहारी वाजपेयी या ज्योतिर्मय बसु ने घंटों सरकार को घेरा, लेकिन कभी सदन के भीतर अराजकता का सहारा नहीं लिया। वर्तमान में राहुल गांधी द्वारा अपनाई गई 'छात्र राजनीति' जैसी शैली संसद को एक 'स्ट्रीट थिएटर' में तब्दील कर रही है। यह एक बड़ा षड्यंत्र है ताकि:
* सदन की कार्यवाही बाधित हो और महत्वपूर्ण विधायी कार्य (जैसे नया आयकर अधिनियम 2025) बिना चर्चा के पारित हों, जिससे बाद में सरकार को 'अलोकतांत्रिक' कहा जा सके।
* वैश्विक स्तर पर भारत की संसदीय छवि को एक 'कमजोर और शोरगुल वाले लोकतंत्र' के रूप में पेश किया जा सके।
4. पराकाष्ठा: अराजकता के अंतिम परिणाम
यदि इस प्रवृत्ति को यहीं नहीं रोका गया, तो इसकी पराकाष्ठा लोकतंत्र के लिए आत्मघाती होगी:
* हिंसक प्रवृत्तियों का उदय: मार्शल के साथ धक्का-मुक्की कल को सदन के भीतर शारीरिक हिंसा में बदल सकती है।
* संवैधानिक संस्थानों का पतन: जब जनता अपने प्रतिनिधियों को सदन में 'मॉक पार्लियामेंट' करते या मिमिक्री करते देखती है, तो उसका लोकतंत्र से विश्वास उठ जाता है। यह स्थिति देश को 'भीड़तंत्र' (Ochlocracy) की ओर ले जाएगी।
* विदेशी हस्तक्षेप को आमंत्रण: सदन के भीतर का तनाव और अराजकता बाहरी शक्तियों को भारत की आंतरिक राजनीति में टिप्पणी करने का अवसर प्रदान करती है।
सत्ता को कठोर संज्ञान लेने की चुनौती
अब समय आ गया है कि सरकार और लोकसभा अध्यक्ष इस 'न्यू नॉर्मल' को 'एबनॉर्मल' घोषित करें। अनुच्छेद 105 के तहत सांसदों को मिलने वाले विशेषाधिकार (Privileges) सदन की गरिमा बढ़ाने के लिए हैं, उसे गिराने के लिए नहीं।
सत्ता पक्ष को निम्नलिखित कदम उठाने हेतु विवश होना होगा:
* कठोर दंड संहिता: प्लेकार्ड लाने या वेल में आकर व्यवधान डालने पर सदस्य की सदस्यता को एक निश्चित अवधि के लिए स्वतः निलंबित करने का नियम बने।
* टेलीकास्ट में बदलाव: संसद टीवी के कैमरों को केवल आसन (Speaker) या बोलने वाले सदस्य पर केंद्रित रखा जाए, ताकि अराजकता फैलाने वालों को 'स्क्रीन टाइम' का माइलेज न मिले।
* आर्थिक दंड: सदन का समय बर्बाद करने वाले सांसदों के वेतन और भत्तों में कटौती की जाए।
संसद वह स्थान है जहाँ शब्द 'ब्रह्म' होते हैं। यदि हम इसे केवल शोर, चाय और पोस्टरों तक सीमित कर देंगे, तो हम आने वाली पीढ़ियों को एक खंडित लोकतंत्र सौंपेंगे। सत्ता पक्ष को इस अराजकता के विरुद्ध 'जीरो टॉलरेंस' अपनाना ही होगा, वरना इतिहास इस पतन का साक्षी बनेगा।
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