"वंदे मातरम्: 150 वर्षों के 'खंडित' वनवास से 'पूर्ण' गौरव की वापसी"
वंदे मातरम्: खंडित पहचान से पूर्ण गौरव तक की सभ्यतागत यात्रा
भूमिका
भारतीय राष्ट्रवाद की आत्मा और स्वाधीनता संग्राम का महामंत्र 'वंदे मातरम्' एक बार फिर अपनी पूर्णता के साथ चर्चा के केंद्र में है। भारत सरकार द्वारा बंकिमचंद्र चटर्जी रचित इस कालजयी गीत को इसके मूल और संपूर्ण स्वरूप में गाने का निर्णय केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं है, बल्कि यह भारत की सभ्यतागत चेतना (Civilizational Consciousness) की पुनर्स्थापना की दिशा में एक निर्णायक कदम है। वर्षों तक जिस गीत को 'खंडित' करके गाया गया, उसे आज अपनी खोई हुई गरिमा वापस मिल रही है।
1. रचना की अमरता: 150 वर्षों का गौरवशाली इतिहास
वंदे मातरम् महज़ एक कविता नहीं, बल्कि एक साक्षात् अनुभूति है। 1875 में अक्षय नवमी के दिन रचित यह गीत आज 150 वर्षों की यात्रा पूरी कर चुका है। बंगाल में अक्षय नवमी का अर्थ है—जिसका क्षय न हो। बंकिम बाबू ने जब मुर्शिदाबाद के लालगोला स्थित मंदिर में माँ काली के चित्र को बेड़ियों में जकड़ा देखा, तो उनके भीतर की पीड़ा ने एक 'रूपक' का आकार लिया।
यह गीत पुस्तकों और पत्रिकाओं की सीमाओं को लांघकर लोक-मानस में व्याप्त हो गया। महावीर प्रसाद द्विवेदी से लेकर सुमित्रानंदन पंत तक, हिंदी साहित्य के दिग्गजों ने इसका भावानुवाद किया। द्विवेदी जी ने इसे 'सरस्वती' पत्रिका के माध्यम से जन-जन तक पहुँचाया। जो रचना लोक में इस कदर रच-बस जाए, वह कालजयी हो जाती है।
2. सांप्रदायिक राजनीति और गीत का विभाजन
इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि 1920 तक इस गीत के संपूर्ण पाठ पर किसी को कोई आपत्ति नहीं थी। 1896 के कांग्रेस अधिवेशन में स्वयं रवींद्रनाथ ठाकुर ने इसे पूरा गाया था। 1905 में सरला देवी चौधरानी ने इसे स्वर दिया।
विवाद की जड़ें:
* तुष्टीकरण की शुरुआत: 1930 के दशक में मुस्लिम लीग और जिन्ना ने इस गीत को 'हिंदूवादी' बताकर विरोध करना शुरू किया। 17 मार्च 1938 को जिन्ना ने नेहरू को पत्र लिखकर इस पर आपत्ति जताई।
* नेहरू की अनभिज्ञता: अभिलेखों के अनुसार, जवाहरलाल नेहरू ने पहली बार 1937 में 'आनंदमठ' का अंग्रेजी अनुवाद पढ़ा। उन्होंने स्वीकार किया कि उपन्यास की भाषा कठिन थी और वे इसकी पृष्ठभूमि को पूरी तरह समझ नहीं पाए। विडंबना देखिए, जिस कृति को नेता पूरी तरह समझ नहीं पाए, उसे राजनीतिक दबाव में 'काटने' का निर्णय ले लिया गया।
3. बौद्धिक द्वंद्व: रवींद्रनाथ ठाकुर बनाम बौद्धिक समाज
जब विवाद बढ़ा, तो कांग्रेस ने गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर से राय मांगी। गुरुदेव ने कहा कि गीत के पहले दो छंद स्वतंत्र पहचान रख सकते हैं और उनके बिना भी इसकी आत्मा बची रहेगी। उन्होंने इसे 'आनंदमठ' उपन्यास के संदर्भ से अलग करने की वकालत की ताकि मुसलमानों की आपत्तियों को कम किया जा सके।
हालाँकि, बंगाल के बौद्धिक जगत ने ठाकुर के इस मत का कड़ा विरोध किया। उनके मित्र और 'मॉडर्न रिव्यू' के संपादक रामानंद चटर्जी ने स्पष्ट रूप से लिखा कि वंदे मातरम् न तो सांप्रदायिक है और न ही किसी समुदाय के खिलाफ। सी. राजगोपालाचारी (राजाजी) ने भी आगाह किया था कि यह 'काट-छाँट' भविष्य के विभाजन की नींव बनेगी—और उनकी यह भविष्यवाणी 1947 में सच साबित हुई।
4. रचनात्मक स्वतंत्रता और लेखकीय संवेदना
यहाँ एक गंभीर प्रश्न उठता है: क्या किसी राजनीतिक दल या किसी दूसरे लेखक को यह नैतिक अधिकार है कि वह मूल रचनाकार की अनुपस्थिति में उसकी कृति को 'एडिट' या 'सेंसर' करे? साहित्यिक रचनात्मकता में लेखकीय संवेदना सर्वोपरि होती है। वंदे मातरम् का विभाजन केवल शब्दों का विभाजन नहीं था, बल्कि उस 'दृष्टि' का अपमान था जिसके लिए बंकिमचंद्र ने इसे रचा था। क्या हम अपनी विरासत को किसी वर्ग विशेष को 'खुश' करने के लिए खंडित कर सकते हैं?
5. आज की प्रासंगिकता: इतिहास की भूलों का सुधार
आज जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत अपने सभ्यतागत मूल्यों को 'रिक्लेम' कर रहा है, तब वंदे मातरम् को उसके पूर्ण स्वरूप में लाना एक अनिवार्य आवश्यकता थी। यह कदम नई पीढ़ी को यह संदेश देता है कि:
* राजनीतिक लाभ के लिए रचनात्मकता के साथ खिलवाड़ नहीं किया जाना चाहिए।
* सांस्कृतिक धरोहरों को तुष्टीकरण की भेंट नहीं चढ़ाया जा सकता।
* इतिहास की गलतियों पर चर्चा करना और उन्हें सुधारना एक जीवंत राष्ट्र की पहचान है।
निष्कर्ष
वंदे मातरम् का पूर्ण गान उस 'अखंड भारत' की सांस्कृतिक अवधारणा को जीवित करता है, जिसे दशकों पहले राजनीतिक स्वार्थों ने धुंधला कर दिया था। यह गीत हमारी राष्ट्रीय पहचान का प्रतीक है और इसकी पूर्णता ही हमारी सभ्यता की पूर्णता है।
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