विकास का 'ग्रीन' कवच या सामरिक घेराबंदी? ग्रेट निकोबार का सच

 विकास का 'ग्रीन' कवच या सामरिक घेराबंदी? ग्रेट निकोबार का सच

भूमिका
अक्सर कहा जाता है कि राजनीति में जो दिखता है, वह होता नहीं और जो होता है, वह आसानी से दिखता नहीं। बंगाल के चुनावों की गहमागहमी के बीच राहुल गांधी का अचानक अंडमान की यात्रा पर निकलना और उससे पहले सोनिया गांधी का निकोबार के पर्यावरण पर भावुक लेख लिखना, केवल 'प्रकृति प्रेम' का मामला नहीं है। यह भारत की उभरती समुद्री शक्ति और वैश्विक भू-राजनीति (Geopolitics) के उस शतरंज का हिस्सा है, जिसकी बिसात हिंद महासागर में बिछी है।
1. ग्रेट निकोबार: सिर्फ एक द्वीप नहीं, भारत का 'अनसिंकेबल एयरक्राफ्ट कैरियर'
भारत सरकार का ₹75,000 करोड़ का 'ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट' कोई साधारण कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट नहीं है। गालथेया बे में बनने वाला कंटेनर पोर्ट और INS Baaz जैसे एयरबेस का विस्तार भारत को मलक्का जलडमरूमध्य (Strait of Malacca) का द्वारपाल बना देगा।
दुनिया का 25% व्यापार और चीन का 80% तेल आयात इसी संकरे रास्ते से गुजरता है। अगर भारत यहां अपनी सैन्य मौजूदगी मजबूत करता है, तो युद्ध या तनाव की स्थिति में हम चीन की जीवन रेखा (Life-line) को जब चाहे रोक सकते हैं। यही वह डर है जो बीजिंग की रातों की नींद उड़ा रहा है।
 2. 'पर्यावरण' जब हथियार बन जाए
इतिहास गवाह है कि जब-जब भारत ने सामरिक बढ़त बनाने की कोशिश की है, 'पर्यावरण' और 'मानवाधिकार' के नाम पर विरोध की लहरें उठी हैं। सोनिया गांधी का निकोबार के वर्षावनों और आदिवासियों के लिए चिंता जताना संवैधानिक अधिकार हो सकता है, लेकिन इसकी टाइमिंग कई सवाल खड़े करती है।
 स्टरलाइट और नर्मदा की याद: क्या हमें याद है कि कैसे स्टरलाइट कॉपर प्लांट को बंद करवाकर भारत को तांबे का आयातक बना दिया गया?
 * **NGOs का जाल:** अक्सर देखा गया है कि विदेशी फंडिंग से चलने वाले एनजीओ अचानक उन प्रोजेक्ट्स पर सक्रिय हो जाते हैं जो भारत की रक्षा क्षमता या आत्मनिर्भरता से जुड़े होते हैं।

 3. टूलकिट, प्रोपेगेंडा और 'चेहरों' की राजनीति
ब्लॉग का एक कड़वा सच यह भी है कि अब विरोध के लिए स्थानीय लोगों को नहीं, बल्कि 'चेहरों' को मोहरा बनाया जाता है। लद्दाख में जो प्रयोग हुआ या मणिपुर में जो नैरेटिव सेट करने की कोशिश की गई, वही अब निकोबार में देखने को मिल सकती है। कछुओं के घर उजड़ने और जनजातियों के विलुप्त होने की रिपोर्ट्स अंतरराष्ट्रीय मीडिया (जैसे BBC या NYT) में हेडलाइन बनेंगी, ताकि भारत पर वैश्विक दबाव बनाया जा सके।
विडंबना देखिए: चीन जब दक्षिण चीन सागर में कृत्रिम द्वीप बनाकर पूरा इकोसिस्टम तबाह कर देता है, तब ये 'पर्यावरण प्रेमी' मौन रहते हैं। लेकिन जब भारत अपनी सीमा पर एक रनवे बनाता है, तो धरती के विनाश की भविष्यवाणियां शुरू हो जाती हैं।

 4. सामरिक स्वतंत्रता बनाम विदेशी एजेंडा
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने इस प्रोजेक्ट को मंजूरी दे दी है। सरकार का रुख स्पष्ट है—हम पेड़ों के बदले दस गुना पेड़ लगाएंगे, लेकिन देश की सुरक्षा से समझौता नहीं करेंगे। यह लड़ाई कछुओं को बचाने की नहीं, बल्कि भारत को हिंद महासागर में 'नेता' बनने से रोकने की है।
ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट भारत की 'एक्ट ईस्ट' नीति का सबसे मजबूत स्तंभ है। जनता को यह समझना होगा कि हर विरोध 'जनहित' में नहीं होता। कुछ विरोध इसलिए किए जाते हैं ताकि पड़ोसी देश सुरक्षित महसूस कर सकें।
क्या हम कछुओं और पेड़ों की आड़ में अपनी समुद्री सीमाओं को असुरक्षित छोड़ सकते हैं? या फिर हम उस 'नियो-पॉलिटिक्स' को पहचानेंगे जो विकास की राह में पर्यावरण का रोड़ा अटकाती है? आने वाले दिनों में निकोबार पर होने वाला हर 'हंगामा' इसी सच की तस्दीक करेगा।

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