नागार्जुन सागर बांध: आधुनिक भारत का जल मंदिर या विकास की वह गाथा जिसने भारत के दक्षिण राज्यों की तस्वीर बदल दी? (भाग–2)
नागार्जुन सागर बांध: आधुनिक भारत का जल मंदिर या विकास की वह गाथा जिसने दक्षिण भारत की तस्वीर बदल दी? (भाग–2)
एक बांध के नीचे दफन हो गया हजारों वर्षों का इतिहास
पहले भाग में हमने जाना कि नागार्जुन सागर बांध केवल सिंचाई परियोजना नहीं, बल्कि स्वतंत्र भारत की विकास दृष्टि का प्रतीक था।
किन्तु प्रत्येक महान निर्माण अपने साथ कुछ कठिन प्रश्न भी लेकर आता है।
नागार्जुन सागर बांध के निर्माण ने जहां लाखों किसानों के जीवन में हरियाली लाई, वहीं इसके विशाल जलाशय ने एक ऐसे नगर को अपने भीतर समा लिया जो कभी भारत के महान बौद्ध शिक्षा केंद्रों में गिना जाता था।
उस नगर का नाम था—विजयपुरी।
विजयपुरी: जहाँ कभी ज्ञान की धारा बहती थी
स्रोत सामग्री के अनुसार विजयपुरी केवल एक नगर नहीं था।
यह प्राचीन भारत में बौद्ध दर्शन, शिक्षा और संस्कृति का महत्वपूर्ण केंद्र था।
यहाँ विशाल बौद्ध विहार, महायान परम्परा के मंदिर तथा अध्ययन परिसर स्थित थे।
चीन, श्रीलंका और बंगाल सहित अनेक क्षेत्रों से विद्यार्थी यहाँ अध्ययन करने आते थे।
यह सम्पूर्ण क्षेत्र भारतीय ज्ञान परम्परा का जीवंत केन्द्र माना जाता था।
किन्तु जब नागार्जुन सागर परियोजना का निर्माण प्रारम्भ हुआ, तब यही ऐतिहासिक क्षेत्र प्रस्तावित जलाशय के भीतर आ गया।
विकास और विरासत—दोनों को बचाने का कठिन निर्णय
सामान्यतः बड़े बांधों के निर्माण में पुरातात्विक धरोहरें नष्ट हो जाती हैं।
किन्तु नागार्जुन सागर परियोजना में एक अलग प्रयास किया गया।
स्रोत सामग्री के अनुसार जलाशय भरने से पहले लगभग छह वर्षों तक व्यापक पुरातात्विक उत्खनन अभियान चलाया गया।
इस दौरान—
प्राचीन स्तूप
बौद्ध विहार
मूर्तियाँ
शिलालेख
ऐतिहासिक अवशेष
प्राचीन बस्तियों के चिन्ह
सावधानीपूर्वक निकाले गए और सुरक्षित स्थानों पर स्थानांतरित किए गए।
यह भारत के सबसे बड़े Rescue Archaeology अभियानों में से एक माना जाता है।
जब पूरा नगर बन गया एक द्वीप
स्रोत सामग्री के अनुसार जिन अवशेषों को बचाया गया, उन्हें नल्लामल पर्वतमाला की एक ऊँची पहाड़ी पर पुनर्स्थापित किया गया।
आज यही स्थान नागार्जुनकोंडा के नाम से प्रसिद्ध है।
विशाल जलाशय के मध्य स्थित यह स्थान आज एक सुंदर द्वीप के रूप में विकसित हो चुका है।
यहाँ तक पहुँचने के लिए नाव यात्रा की सुविधा उपलब्ध है और यह इतिहास, पुरातत्व तथा पर्यटन—तीनों का अनूठा संगम प्रस्तुत करता है।
खुदाई में मिले हजारों वर्ष पुराने रहस्य
उत्खनन के दौरान केवल बौद्ध स्मारक ही नहीं मिले।
स्रोत सामग्री के अनुसार पुरातत्वविदों को लगभग 200 महापाषाणकालीन कब्रें और दफन स्थल भी प्राप्त हुए।
इनसे यह स्पष्ट हुआ कि यह क्षेत्र अत्यन्त प्राचीन मानव सभ्यता का भी महत्वपूर्ण केंद्र रहा है।
उत्खनित अनेक मूर्तियाँ और कलाकृतियाँ आज संग्रहालयों में सुरक्षित हैं।
इनमें विशेष रूप से अमरावती शैली की कलाकृतियाँ भारतीय शिल्पकला की उत्कृष्ट परम्परा का प्रतिनिधित्व करती हैं।
केवल विशाल नहीं, तकनीकी दृष्टि से भी अद्भुत
स्रोत सामग्री के अनुसार नागार्जुन सागर बांध की वास्तविक शक्ति केवल उसकी ऊँचाई या लंबाई में नहीं, बल्कि उसकी वैज्ञानिक संरचना में निहित है।
इसकी प्रमुख तकनीकी विशेषताएँ—
विशाल चिनाई (Masonry) संरचना
उच्च जल भंडारण क्षमता
बाढ़ नियंत्रण हेतु स्पिलवे गेट
दायीं एवं बायीं मुख्य नहर प्रणाली
जलविद्युत उत्पादन केंद्र
व्यापक सिंचाई नेटवर्क
इन्हीं कारणों से इसे केवल एक बांध नहीं, बल्कि सम्पूर्ण जल वितरण एवं जल प्रबंधन प्रणाली माना जाता है।
क्यों कहा जाता है इसे अपने समय का इंजीनियरिंग चमत्कार?
स्रोत सामग्री के अनुसार नागार्जुन सागर परियोजना ने भारत में बड़े बहुउद्देश्यीय बांधों के विकास की दिशा निर्धारित की।
इससे पूर्व अधिकांश परियोजनाएँ सीमित उद्देश्यों तक सीमित थीं।
किन्तु यहाँ—
सिंचाई,
जलविद्युत उत्पादन,
पेयजल,
बाढ़ नियंत्रण,
क्षेत्रीय विकास
को एकीकृत दृष्टिकोण से जोड़ा गया।
इसी कारण यह परियोजना अपने समय की सबसे अग्रणी अवसंरचना योजनाओं में गिनी गई।
अभी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय शेष है...
इतना विशाल निर्माण...
इतना बड़ा विकास...
किन्तु क्या इसकी कोई कीमत भी चुकानी पड़ी?
क्या हजारों लोगों को अपने घर छोड़ने पड़े?
क्या पर्यावरण और पुनर्वास को लेकर विवाद भी हुए?
और आज तेलंगाना तथा आंध्र प्रदेश के बीच इस बांध को लेकर किस प्रकार के मतभेद सामने आते हैं?
भाग–3 में पढ़िए—
जनजीवन पर प्रभाव, किसानों की बदलती तस्वीर, विस्थापन, विवाद, अंतरराज्यीय जल बंटवारा और आज का नागार्जुन सागर।
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