Celebration of Oneness: अपनापन ही हिंदू का मूल स्वभाव

 

ब्लॉग 1 : अपनापन ही हिंदू का मूल स्वभाव

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अपनापन ही हिंदू का मूल स्वभाव, हिंदू जीवन दृष्टि, Celebration of Oneness, मोहन भागवत, हिंदू संस्कृति, एकात्मता, विविधता में एकता, शुद्ध सात्त्विक प्रेम


अपनापन ही हिंदू का मूल स्वभाव

दुनिया आज अनेक प्रकार के विभाजनों से गुजर रही है। कहीं विचारों का संघर्ष है, कहीं पहचान का संकट, कहीं धार्मिक और सांस्कृतिक असहिष्णुता तो कहीं मनुष्य और प्रकृति के बीच बढ़ती दूरी। ऐसे समय में यदि किसी सभ्यता से यह पूछा जाए कि मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने वाला सबसे सरल और सबसे गहरा सूत्र क्या हो सकता है, तो भारत की ओर से आने वाला उत्तर शायद एक शब्द में दिया जा सकता है—अपनापन।

6 सितंबर 2026 को लंदन में आयोजित ‘Celebration of Oneness’ संवाद में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने हिंदू स्वभाव के मूल तत्व के रूप में इसी ‘अपनापन’ को रेखांकित किया। उन्होंने इसे शुद्ध सात्त्विक प्रेम अर्थात सबके प्रति निर्मल और निःस्वार्थ प्रेम के रूप में प्रस्तुत किया।

यह बात केवल किसी संगठन या विचारधारा की व्याख्या भर नहीं है। इसके भीतर भारतीय समाज और संस्कृति को देखने की एक ऐसी दृष्टि छिपी है, जिसमें ‘मैं’ अकेला नहीं है। ‘मैं’ के साथ मेरा परिवार है, मेरा समाज है, मेरी प्रकृति है और अंततः संपूर्ण मानवता है।

यही शायद ‘Celebration of Oneness’ के नाम को भी अर्थ देता है—अनेकता के बीच उस एकत्व को अनुभव करना, जो सबको जोड़ता है।


अपनापन आखिर है क्या?

‘अपनापन’ शब्द सुनने में बहुत सामान्य लगता है। हम रोजमर्रा की बातचीत में भी कहते हैं—“उसमें बहुत अपनापन है।”

लेकिन भारतीय संदर्भ में अपनापन केवल आत्मीय व्यवहार या व्यक्तिगत स्नेह नहीं है। यह उससे कहीं व्यापक भाव है।

जब किसी दूसरे व्यक्ति का सुख हमें अपना सुख लगे, उसके दुःख से हमारे भीतर संवेदना जागे और उसके अस्तित्व को अपने अस्तित्व से अलग न मानें, तब अपनापन केवल भावना नहीं रहता—वह जीवन-दृष्टि बन जाता है।

डॉ. भागवत के वक्तव्य में यही विस्तार दिखाई देता है। उन्होंने हिंदू को केवल एक व्यक्ति के रूप में नहीं, बल्कि परिवार, समुदाय, समाज और मानवता से जुड़े हुए अस्तित्व के रूप में देखने की बात कही। साथ ही प्रकृति के प्रति भी इसी आत्मीय संबंध को जोड़ा।

अर्थात हिंदू दृष्टि में जीवन को अलग-अलग खानों में बाँटकर नहीं देखा जाता।

व्यक्ति अलग नहीं है।
परिवार अलग नहीं है।
समाज अलग नहीं है।
मानवता अलग नहीं है।
प्रकृति भी अलग नहीं है।

सब एक ही व्यापक अस्तित्व के परस्पर जुड़े हुए आयाम हैं।


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व्यक्ति से मानवता तक : अपनापन का विस्तार

आधुनिक जीवन ने व्यक्ति को बहुत स्वतंत्र बनाया है, लेकिन इसी के साथ अकेलेपन की समस्या भी बढ़ी है। ‘मैं’ की स्वतंत्रता जब ‘हम’ से पूरी तरह कट जाती है, तो जीवन में सुविधाएँ तो बढ़ सकती हैं, लेकिन संबंधों की ऊष्मा कम हो सकती है।

भारतीय चिंतन इसके विपरीत व्यक्ति को संबंधों के व्यापक ताने-बाने में देखता है।

व्यक्ति परिवार का हिस्सा है।
परिवार समाज का हिस्सा है।
समाज राष्ट्र का हिस्सा है।
राष्ट्र मानवता से जुड़ा है।
और मानवता प्रकृति से अलग नहीं है।

इसलिए किसी एक की प्रगति को संपूर्ण प्रगति नहीं माना जा सकता।

डॉ. भागवत ने इसी समग्रता की ओर संकेत करते हुए कहा कि हिंदू केवल पूजा करने वाला व्यक्ति नहीं है; वह प्रकृति से भी प्रेम करता है और परिवार, समुदाय, समाज तथा मानवता से भी जुड़ा है।

यह दृष्टि विकास को भी एक नया अर्थ देती है।

क्या केवल व्यक्ति समृद्ध हो जाए?
या परिवार भी सुखी हो?
क्या केवल समाज आगे बढ़े?
या प्रकृति भी सुरक्षित रहे?

भारतीय दृष्टि इन प्रश्नों को अलग-अलग नहीं करती।


प्रेम केवल भाव नहीं, सामाजिक शक्ति भी है

अपनापन का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि यह समाज को जोड़ता है।

जिस समाज में व्यक्ति दूसरे को ‘पराया’ समझता है, वहाँ स्वाभाविक रूप से दूरी पैदा होती है। दूरी से अविश्वास जन्म लेता है और अविश्वास से संघर्ष।

इसके विपरीत यदि मूल भावना यह हो कि—

“यह भी अपना है।”

तो संवाद की संभावना पैदा होती है।

मत अलग हो सकते हैं।
पूजा-पद्धतियाँ अलग हो सकती हैं।
भाषाएँ अलग हो सकती हैं।
परंपराएँ अलग हो सकती हैं।
जीवन जीने के तरीके अलग हो सकते हैं।

फिर भी दूसरे के अस्तित्व को स्वीकार करने का भाव बना रह सकता है।

यही वह बिंदु है जहाँ अपनापन और विविधता एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक बन जाते हैं।

मूल संवाद में भी विविधता को स्वाभाविक मानते हुए उसके सम्मान की बात कही गई है। विभिन्नताएँ अस्तित्व की एकता की अनेक अभिव्यक्तियाँ हैं—यह विचार हिंदू चिंतन के प्रमुख सूत्र के रूप में सामने रखा गया।


“मैं सही हूँ” से आगे “हम भी सही, आप भी सही”

दुनिया के अनेक संघर्षों की जड़ केवल मतभेद नहीं हैं। असली समस्या तब पैदा होती है जब हम अपने मत को ही एकमात्र सत्य मानकर दूसरे के अस्तित्व या विचार को अस्वीकार कर देते हैं।

भारतीय दृष्टि में इसके स्थान पर एक अलग भाव दिखाई देता है—

“हम भी सही; आप भी सही।”

इसका अर्थ यह नहीं कि सत्य का कोई अस्तित्व ही नहीं है। बल्कि इसका आशय यह है कि मनुष्य सत्य की खोज अलग-अलग मार्गों से कर सकता है और विविधता को स्वीकार करते हुए भी एक व्यापक एकता को अनुभव किया जा सकता है।

इसी भाव को संस्कृत की प्रसिद्ध पंक्तियाँ अत्यंत सुंदर ढंग से व्यक्त करती हैं—

रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिल नानापथजुषां
नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव॥

अर्थात जैसे विभिन्न स्रोतों से निकला जल अलग-अलग मार्गों से बहता हुआ अंततः समुद्र में पहुँचता है, वैसे ही मनुष्य अलग-अलग मार्गों का अनुसरण करते हुए एक ही परम लक्ष्य की ओर अग्रसर हो सकते हैं।

यह श्लोक केवल धार्मिक सहिष्णुता का संदेश नहीं देता। यह उससे आगे जाकर विविधता के भीतर एकत्व को देखने की दृष्टि देता है।


हिंदू होने का अर्थ केवल पूजा-पद्धति नहीं

‘हिंदू’ शब्द को लेकर आधुनिक विमर्श में अक्सर इसकी व्याख्या केवल धर्म, पूजा या किसी विशेष जीवन-पद्धति के आधार पर करने का प्रयास होता है।

लेकिन लंदन संवाद में प्रस्तुत विचार इससे अधिक व्यापक है।

मूल सामग्री में कहा गया है कि हिंदू को केवल किसी धार्मिक अभ्यास या जीवन-शैली के आधार पर नहीं समझा जा सकता। इसे एक ऐसी प्रकृति और सभ्यतागत दृष्टि के रूप में देखा गया है जो विविधताओं को स्वीकार और सम्मान करती है।

भारत की ऐतिहासिक परंपरा में विभिन्न प्रकार के विचारों के लिए स्थान रहा है—आस्तिक विचारों से लेकर नास्तिक विचारों तक।

अर्थात प्रश्न केवल यह नहीं कि “तुम क्या मानते हो?”

बल्कि यह भी है कि—

“क्या तुम दूसरे को उसके अपने विश्वास के साथ स्वीकार कर सकते हो?”

यहीं से अपनापन सामाजिक दर्शन में बदलता है।


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एकात्मता का अर्थ समानता थोपना नहीं

एक महत्वपूर्ण प्रश्न यहाँ उठता है—यदि सबमें एकता है तो फिर इतनी विविधता क्यों?

भारतीय उत्तर है—विविधता स्वयं प्रकृति का स्वभाव है।

इसलिए एकता का अर्थ यह नहीं कि सभी एक जैसे दिखाई दें, एक जैसा सोचें या एक जैसी परंपरा अपनाएँ।

एकता का अर्थ है कि विविधता के बीच भी हम एक-दूसरे के अस्तित्व को स्वीकार करें।

यही कारण है कि मूल संवाद में विविधता को “एकता के विभिन्न अलंकार” की तरह देखने की बात सामने आती है।

यह दृष्टि आज के विश्व के लिए विशेष रूप से प्रासंगिक हो सकती है।

क्योंकि आधुनिक समाजों के सामने सबसे बड़ी चुनौती शायद विविधता का होना नहीं है; चुनौती यह है कि विविधता के साथ शांतिपूर्वक और सम्मानपूर्वक कैसे रहा जाए।


अपनापन से विश्वबंधुत्व तक

जब अपनापन केवल अपने परिवार तक सीमित रहता है तो वह स्नेह है।

जब वह समाज तक पहुँचता है तो सामाजिक समरसता बनता है।

जब वह मानवता तक फैलता है तो विश्वबंधुत्व का रूप लेता है।

और जब यही भाव प्रकृति तक पहुँचता है तो मनुष्य और पर्यावरण के बीच संघर्ष के स्थान पर सह-अस्तित्व की भावना पैदा होती है।

इसीलिए ‘Celebration of Oneness’ में व्यक्त दृष्टि केवल हिंदू समाज की आंतरिक एकता तक सीमित नहीं रहती। उसमें मानवता और प्रकृति के साथ एक व्यापक संबंध की बात भी सामने आती है।

यही वह बिंदु है जहाँ अपनापन एक व्यक्तिगत सद्गुण से आगे बढ़कर वैश्विक समाधान का आधार बन सकता है।


आज के समय में अपनापन की आवश्यकता क्यों?

आज तकनीक ने दुनिया को पहले से कहीं अधिक निकट ला दिया है। हम हजारों किलोमीटर दूर बैठे व्यक्ति से कुछ सेकंड में संवाद कर सकते हैं।

लेकिन क्या वास्तव में मनुष्य एक-दूसरे के निकट आए हैं?

यह प्रश्न विचारणीय है।

सूचना की दूरी कम हुई है, लेकिन मन की दूरी कई बार बढ़ती दिखाई देती है।

ऐसे समय में अपनापन हमें एक सरल लेकिन गहरा सूत्र देता है—

दूसरे को पहले ‘दूसरा’ मत देखो।
पहले उसे ‘अपना’ देखने का प्रयास करो।

यह दृष्टि मतभेद समाप्त नहीं करती, लेकिन मतभेदों को संघर्ष बनने से रोक सकती है।

यह विविधता समाप्त नहीं करती, बल्कि विविधता के साथ जीने की क्षमता विकसित करती है।

और शायद यही कारण है कि संवाद में हिंदू दृष्टि को विश्व के लिए एक संतुलित दृष्टिकोण देने वाली परंपरा के रूप में प्रस्तुत किया गया।


निष्कर्ष : शुरुआत एक शब्द से, यात्रा संपूर्ण मानवता तक

‘Celebration of Oneness’ के लंदन संवाद में हिंदू स्वभाव की चर्चा एक बड़े दार्शनिक व्याख्यान से नहीं, बल्कि एक अत्यंत सरल शब्द से शुरू होती है—

अपनापन।

लेकिन यही छोटा-सा शब्द धीरे-धीरे अपना विस्तार करता है—

अपनापन → परिवार → समाज → मानवता → प्रकृति → संपूर्ण अस्तित्व।

यही भारतीय एकात्म दृष्टि की विशेषता है।

यह कहती है कि मनुष्य अकेला नहीं है। उसका अस्तित्व संबंधों से बना है। इसलिए अपनी उन्नति के साथ दूसरों की उन्नति, समाज के साथ प्रकृति और राष्ट्र के साथ मानवता का विचार भी आवश्यक है।

डॉ. भागवत ने हिंदू स्वभाव को “शुद्ध सात्त्विक प्रेम” से जोड़ते हुए इसी व्यापक अपनत्व को रेखांकित किया।

शायद इसीलिए इस पूरी चर्चा का सबसे सरल निष्कर्ष यही हो सकता है—

जहाँ ‘मैं’ से ‘हम’ की यात्रा शुरू होती है, वहीं अपनापन जन्म लेता है।
और जहाँ ‘हम’ का विस्तार संपूर्ण मानवता तक हो जाता है, वहीं एकात्मता का अनुभव होता है।

अगले ब्लॉग में प्रश्न और गहरा होगा—यदि हिंदू का मूल स्वभाव अपनापन है, तो आखिर “हिंदू” को केवल धर्म या पूजा-पद्धति से क्यों नहीं समझा जा सकता? क्या हिंदू एक धर्म है, एक जीवन-पद्धति है या उससे भी व्यापक कोई सभ्यतागत दृष्टि?

अगला ब्लॉग : “हिंदू कौन है? पूजा-पद्धति से परे एक व्यापक जीवन-दृष्टि”

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