विविधता स्वाभाविक है, एकता सत्य है : हिंदू चिंतन में अनेकता के भीतर एकात्मता


विविधता स्वाभाविक है, एकता सत्य है

दुनिया को देखकर एक प्रश्न बार बार सामने आता है।

इतने अलग अलग लोग हैं, इतनी अलग भाषाएं हैं, अलग वेशभूषाएं हैं, अलग पूजा पद्धतियां हैं, अलग विचार हैं, अलग संस्कृतियां हैं, फिर भी मनुष्य एक दूसरे के इतने निकट क्यों आते हैं और इतनी बार एक दूसरे से टकराते भी क्यों हैं?

क्या मनुष्य की शांति के लिए सबका एक जैसा होना आवश्यक है?

क्या एकता का अर्थ समानता है?

क्या विविधता अपने आप में संघर्ष का कारण है?

या फिर समस्या विविधता में नहीं, बल्कि विविधता को स्वीकार न कर पाने वाली मानसिकता में है?

लंदन में आयोजित Celebration of Oneness के संवाद में हिंदू चिंतन के इसी अत्यंत महत्वपूर्ण पक्ष पर प्रकाश डाला गया। विचार सामने आया कि विविधता कोई विकृति नहीं है। वह प्रकृति का स्वभाव है। आवश्यकता इस बात की है कि विविधता के भीतर विद्यमान एकता को पहचाना जाए।

यही भारतीय दृष्टि का एक महत्वपूर्ण सूत्र है।

विविधता स्वाभाविक है और एकता सत्य है।

यह विचार हिंदू चिंतन की उस व्यापक दृष्टि से जुड़ा है जो विविधताओं को स्वीकार और सम्मान करने तथा उनके भीतर अस्तित्व की एकता को देखने की बात करती है।

एक जैसे होना एकता नहीं है

हम प्रायः एकता को एकरूपता के अर्थ में समझ लेते हैं।

एक भाषा हो।

एक वेश हो।

एक विचार हो।

एक पूजा पद्धति हो।

एक जीवन शैली हो।

तभी समाज एक होगा।

लेकिन भारतीय चिंतन की दृष्टि इससे कहीं अधिक व्यापक है।

यह मानता है कि प्रकृति स्वयं विविध है। एक ही वृक्ष पर सभी पत्ते एक जैसे नहीं होते। एक ही परिवार में सभी व्यक्तियों की रुचियां एक जैसी नहीं होतीं। अलग अलग नदियां अलग दिशाओं से चलती हैं। फिर भी वे अपने अंतिम गंतव्य की ओर बढ़ती हैं।

इसलिए विविधता को समाप्त करना एकता स्थापित करना नहीं है।

वास्तविक एकता वह है जिसमें विविधता के अस्तित्व को स्वीकार करते हुए उसके पीछे छिपे एकत्व को पहचाना जाए।

Celebration of Oneness के संवाद में इसी बात को हिंदू चिंतन का मूल आधार बताया गया कि अस्तित्व वास्तव में एक है, दिखाई विविध देता है। विविधता उस एकता की विभिन्न अभिव्यक्तियां हैं।

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विविधता प्रकृति का स्वभाव है

यदि हम अपने चारों ओर देखें तो विविधता हर जगह दिखाई देती है।

प्रकृति में विविधता है।

जीवन में विविधता है।

मानवीय स्वभाव में विविधता है।

समाज में विविधता है।

विचारों में विविधता है।

पूजा और उपासना की पद्धतियों में विविधता है।

फिर विविधता को अस्वाभाविक क्यों माना जाए?

हिंदू विचार कहता है कि विविधता को स्वीकार करना होगा और उसका सम्मान करना होगा। क्योंकि ये विविधताएं अस्तित्व की एकता की सजावट हैं।

यह विचार केवल सहन करने की बात नहीं करता।

यह उससे आगे जाकर सम्मान की बात करता है।

यही अंतर बहुत महत्वपूर्ण है।

किसी दूसरे व्यक्ति को सहन करना और किसी दूसरे व्यक्ति की भिन्नता का सम्मान करना दोनों एक बात नहीं हैं।

सहनशीलता में भीतर कहीं यह भाव रह सकता है कि दूसरा गलत है, फिर भी मैं उसे सहन कर रहा हूं।

सम्मान में भाव बदल जाता है।

वह कहता है कि तुम्हारी भिन्नता भी अस्तित्व की उसी व्यापक व्यवस्था का हिस्सा है।

अनेक रास्ते, एक गंतव्य

भारतीय चिंतन ने इस विचार को केवल सिद्धांत के रूप में नहीं रखा। उसे अत्यंत सुंदर प्रतीक के माध्यम से समझाया गया है।

संस्कृत का प्रसिद्ध श्लोक है

रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिल नानापथजुषां

नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव

अर्थात जिस प्रकार अलग अलग स्रोतों से निकलने वाला जल अनेक मार्गों से होकर अंततः समुद्र तक पहुंचता है, उसी प्रकार मनुष्य अलग अलग मार्गों का अनुसरण करते हुए एक ही परम लक्ष्य की ओर बढ़ सकते हैं।

यह केवल धार्मिक दृष्टांत नहीं है।

यह जीवन को देखने की एक पद्धति है।

यह कहता है कि रास्ते अलग हो सकते हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि प्रत्येक अलग रास्ता दूसरे रास्ते का शत्रु है।

यहां से एक अत्यंत सुंदर सामाजिक दृष्टि जन्म लेती है।

भिन्नता संघर्ष का कारण नहीं, संवाद का अवसर बन सकती है।

हम भी सही, आप भी सही

शायद इसी विचार को सबसे सरल शब्दों में कहा जा सकता है।

हम भी सही, आप भी सही।

यह वाक्य पहली दृष्टि में बहुत सामान्य लगता है, लेकिन इसके पीछे एक गहरी सभ्यतागत दृष्टि छिपी है।

इसका अर्थ यह नहीं कि सत्य और असत्य में कोई अंतर ही नहीं है।

इसका अर्थ यह है कि मनुष्य अपनी सीमित दृष्टि से सत्य को देखने का प्रयास करता है। इसलिए दूसरे की दृष्टि को केवल इसलिए नकार देना कि वह हमारी दृष्टि से अलग है, उचित नहीं है।

Celebration of Oneness के मूल विचारों में स्पष्ट कहा गया कि सभी विविधताओं को स्वीकार और सम्मान किया जाना चाहिए, क्योंकि वे एक ही परम लक्ष्य की ओर जाने वाले विभिन्न मार्ग हो सकते हैं।

यह दृष्टि संवाद को जन्म देती है।

संवाद से समझ पैदा होती है।

समझ से विश्वास पैदा होता है।

और विश्वास से सह-अस्तित्व संभव होता है।

भारत ने विविधता को मिटाया नहीं, आत्मसात किया

भारतीय सभ्यता की विशेषता यह रही कि उसने विचारों की विविधता को अपने लिए संकट नहीं माना।

Celebration of Oneness के संवाद में कहा गया कि भारतवर्ष से नास्तिक से लेकर आस्तिक तक अनेक प्रकार के विचार सामने आए हैं। हिंदू को केवल किसी एक धार्मिक आचरण या जीवन पद्धति के आधार पर नहीं समझा जा सकता।

यही कारण है कि भारतीय परंपरा में प्रश्न पूछने की परंपरा भी दिखाई देती है और साधना की परंपरा भी।

तर्क भी मिलता है और श्रद्धा भी।

दर्शन भी मिलता है और लोकजीवन भी।

विविधता यहां विखंडन नहीं बनती, बल्कि व्यापक सभ्यतागत प्रवाह का हिस्सा बनती है।

इसलिए भारतीय दृष्टि में अनेकता को देखकर घबराने के बजाय उसके भीतर एकत्व को खोजने की प्रवृत्ति विकसित हुई।

एकता दिखाई नहीं देती, अनुभव करनी पड़ती है

विविधता आंखों से दिखाई देती है।

एकता का अनुभव करना पड़ता है।

हम व्यक्ति को देखते हैं, परिवार दिखाई नहीं देता।

परिवार को देखते हैं, समाज दिखाई नहीं देता।

समाज को देखते हैं, मानवता दिखाई नहीं देती।

और मानवता को देखते हुए भी उस व्यापक अस्तित्व का अनुभव सहज नहीं होता जिससे सब जुड़े हुए हैं।

हिंदू चिंतन इसीलिए व्यक्ति को अकेली इकाई नहीं मानता। व्यक्ति परिवार, समुदाय, समाज और मानवता से जुड़ा हुआ है। वह केवल पूजा नहीं करता, प्रकृति से भी संबंध रखता है।

अर्थात व्यक्ति से समाज तक और समाज से प्रकृति तक एक संबंध सूत्र है।

इसी संबंध को पहचानना एकात्मता की ओर पहला कदम है।

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जब एकता दिखाई देती है, तब भिन्नता डराती नहीं

हमारी अनेक सामाजिक समस्याओं का मूल कहीं न कहीं यह भी है कि हम पहले भिन्नता देखते हैं और बाद में संबंध।

यदि पहले संबंध दिखाई देने लगे तो भिन्नता का अर्थ बदल जाता है।

तब भाषा अलग होने पर भी व्यक्ति अपना लगता है।

पूजा की पद्धति अलग होने पर भी संवाद संभव रहता है।

विचार अलग होने पर भी सम्मान बना रह सकता है।

क्षेत्र अलग होने पर भी राष्ट्रभाव बना रह सकता है।

यही वह मानसिक परिवर्तन है जिसकी आवश्यकता आज केवल भारत को नहीं, पूरे विश्व को है।

Celebration of Oneness के संदेश में भी इस बात पर बल दिया गया कि समाज और विश्व को उन तत्वों पर अधिक ध्यान देना चाहिए जो मनुष्यों को जोड़ते हैं, न कि केवल उन बातों पर जो उन्हें अलग करती हैं।

आज के विश्व के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह विचार

आज दुनिया में संवाद की जगह आरोप बढ़ रहे हैं।

असहमति की जगह विरोध बढ़ रहा है।

विचारों के अंतर को शत्रुता समझ लिया जाता है।

पहचान के अंतर संघर्ष का कारण बन जाते हैं।

ऐसे समय में विविधता को स्वीकार करने और एकता को पहचानने वाली दृष्टि अत्यंत प्रासंगिक हो जाती है।

यदि हम यह समझ सकें कि भिन्नता होना स्वाभाविक है और फिर भी हम एक दूसरे से जुड़े हुए हैं, तो अनेक संघर्षों की दिशा बदल सकती है।

यह दृष्टि किसी एकरूप विश्व की कल्पना नहीं करती।

यह ऐसे विश्व की कल्पना करती है जिसमें अलग अलग पहचानें रहते हुए भी मनुष्य एक दूसरे के अस्तित्व का सम्मान करें।

यही वास्तविक सह-अस्तित्व है।

विविधता में एकता नहीं, विविधता के भीतर एकता

अक्सर हम कहते हैं

विविधता में एकता।

लेकिन भारतीय चिंतन को इससे भी अधिक गहराई से समझने की आवश्यकता है।

यह केवल विविध वस्तुओं को एक साथ रखने की बात नहीं है।

यह कहता है कि विविधता के पीछे अस्तित्व का एकत्व है।

एक ही चेतना अनेक रूपों में दिखाई दे सकती है।

एक ही सत्य तक पहुंचने के अनेक मार्ग हो सकते हैं।

एक ही मानवता अनेक संस्कृतियों में अभिव्यक्त हो सकती है।

इसलिए विविधता एकता के बाहर नहीं है।

विविधता स्वयं उस एकता की अभिव्यक्ति है।

इसीलिए कहा गया कि अनेकता एकत्व की विभिन्न सजावटों के समान है।

परिवार से विश्व तक यही सूत्र

इस विचार की शुरुआत किसी अंतरराष्ट्रीय मंच से नहीं होती।

इसकी शुरुआत हमारे घर से हो सकती है।

परिवार में दो व्यक्तियों की रुचियां अलग हैं तो क्या परिवार टूट जाता है?

नहीं।

यदि परिवार के भीतर अपनापन बना रहे तो भिन्नता सहज स्वीकार्य होती है।

यही सूत्र समाज पर लागू होता है।

यही राष्ट्र पर लागू होता है।

और यही मानवता पर लागू हो सकता है।

व्यक्ति से परिवार।

परिवार से समाज।

समाज से मानवता।

और मानवता से समस्त प्रकृति।

यह संबंध जितना व्यापक होता जाता है, एकात्मता का अनुभव उतना गहरा होता जाता है।

हिंदू चिंतन में व्यक्ति, परिवार, समाज और प्रकृति को एक दूसरे से जुड़े हुए देखने की यही व्यापक दृष्टि सामने आती है।

भारत का संदेश केवल भारत के लिए नहीं

यदि विविधता स्वाभाविक है और एकता अस्तित्व का सत्य है, तो यह विचार किसी एक समाज तक सीमित नहीं रह सकता।

आज विश्व को ऐसी दृष्टि की आवश्यकता है जो विविधता को समाप्त किए बिना एकता स्थापित कर सके।

ऐसी दृष्टि जो कहे

तुम अलग हो, इसलिए गलत नहीं हो।

तुम्हारा मार्ग अलग है, इसलिए तुम मेरे विरोधी नहीं हो।

तुम्हारी पहचान अलग है, इसलिए हमारा संबंध समाप्त नहीं होता।

बल्कि तुम्हारी भिन्नता को समझते हुए हम उस व्यापक एकता को पहचान सकते हैं जो हम दोनों को जोड़ती है।

Celebration of Oneness में व्यक्त संदेश का सार भी यही है कि मनुष्य और समाज उन बातों पर अधिक बल दें जो उन्हें जोड़ती हैं। इससे समाज में समृद्धि और विश्व में बेहतर वातावरण निर्मित हो सकता है।

निष्कर्ष : अनेक रंग, एक आकाश

आकाश एक है।

उसके नीचे दिखाई देने वाले रंग अनेक हैं।

नदियां अनेक हैं।

उनके प्रवाह अलग हैं।

लेकिन जल का मूल स्वभाव एक है।

मनुष्य अनेक हैं।

उनकी भाषाएं, संस्कृतियां, मान्यताएं और जीवन पद्धतियां अनेक हैं।

लेकिन मानवता का आधार एक है।

यही वह दृष्टि है जो विविधता को संघर्ष का कारण बनने से रोकती है।

हिंदू चिंतन का यह संदेश आज के समय में इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह एकता के लिए विविधता को नष्ट करने की मांग नहीं करता। वह विविधता का सम्मान करते हुए उसके भीतर एकत्व का अनुभव करने की बात करता है।

विविधता स्वाभाविक है।

एकता सत्य है।

और जब यह सत्य जीवन में उतरता है तो भिन्नता भय का कारण नहीं रहती।

वह सौंदर्य बन जाती है।

शायद इसी कारण Celebration of Oneness का मूल संदेश केवल एक कार्यक्रम का संदेश नहीं है। यह मनुष्य को देखने की एक ऐसी दृष्टि प्रस्तुत करता है जिसमें अनेकता के बीच भी अपनापन बचा रहता है।

लेकिन यहां एक और महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा होता है।

यदि सब अलग हैं और फिर भी सब एक हैं, तो क्या इसका अर्थ यह है कि हमें यह कहना चाहिए कि हम भी सही हैं और आप भी सही?

क्या यह केवल सहिष्णुता है या इसके पीछे कोई और गहरी सभ्यतागत दृष्टि है?

अगले ब्लॉग में इसी प्रश्न की ओर बढ़ेंगे।

हम भी सही, आप भी सही : संघर्ष के बजाय सह-अस्तित्व की हिंदू दृष्टि

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