मैडिसन स्क्वायर गार्डन से ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का संदेश: डॉ. मोहन भागवत ने दुनिया के सामने रखा हिंदू जीवन-दर्शन
मैडिसन स्क्वायर गार्डन से ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का संदेश: डॉ. मोहन भागवत ने दुनिया के सामने रखा हिंदू जीवन-दर्शन
‘Universal Oneness Celebration’ में 6,000 प्रतिनिधियों के बीच सरसंघचालक का संदेश—विविधता विभाजन नहीं, एकात्मता का शृंगार; प्रवासी भारतीय अपनी कर्मभूमि के प्रति निष्ठावान रहते हुए सेवा, पर्यावरण और मानवीय एकता का उदाहरण प्रस्तुत करें
न्यूयॉर्क का मैडिसन स्क्वायर गार्डन। अमेरिका के अलग-अलग राज्यों और शहरों से आए हजारों भारतीय मूल के लोग। उनके बीच अमेरिका में जन्मी और पली-बढ़ी भारतीय मूल की नई पीढ़ी भी मौजूद थी।
मंच पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत थे और चर्चा का विषय था—‘Universal Oneness’ यानी वैश्विक एकात्मता।
भारतीय समयानुसार 30 अगस्त की भोर में लगभग 3 बजे जब यह कार्यक्रम समाप्त हुआ, तब न्यूयॉर्क में एक विचार-विमर्श अपने पीछे छोड़ चुका था—एक ऐसा विचार जिसकी जड़ें भारत की प्राचीन सभ्यता में हैं, लेकिन जिसका संदेश आज की पूरी मानवता के लिए है।
डॉ. भागवत ने कहा कि विविधता विभाजन नहीं है, बल्कि एकता का शृंगार है।
29 अगस्त को न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन स्थित इन्फोसिस थिएटर में आयोजित ‘Universal Oneness Celebration’ में अमेरिका के 39 राज्यों और 850 शहरों से लगभग 6,000 भारतीय-अमेरिकियों के शामिल होने की जानकारी आयोजकों ने दी। लगभग 250 संस्थाओं के सहयोग से हुए इस आयोजन में भारतीय मूल के युवाओं की उल्लेखनीय भागीदारी रही। (vskbharat.com)
लेकिन इस आयोजन का महत्व केवल इतनी बड़ी संख्या में लोगों के एकत्र होने में नहीं था।
असल महत्व उस विचार का था जिसे न्यूयॉर्क की धरती से दुनिया के सामने रखा गया—
क्या मनुष्य अपनी विविधताओं को बचाए रखते हुए भी एक हो सकता है?
डॉ. भागवत का उत्तर था—हाँ। और हिंदू जीवन-दर्शन इसे संभव मानता है।
‘One Source of Energy’ : सृष्टि के पीछे एक ही एकात्मता
डॉ. भागवत के उद्बोधन का एक महत्वपूर्ण केंद्र था—‘One Source of Energy’।
उनके विचार का मूल यह था कि हिंदू जीवन-दर्शन सृष्टि को अलग-अलग और परस्पर विरोधी हिस्सों में नहीं देखता। उसके पीछे एक ही मूल ऊर्जा और एक ही व्यापक एकात्मता को स्वीकार करता है।
यही कारण है कि भारतीय परंपरा में मनुष्य और प्रकृति के बीच कोई स्थायी संघर्ष नहीं माना गया।
पेड़, नदी, पर्वत, पशु-पक्षी और मनुष्य—सभी को जीवन की एक ही व्यापक व्यवस्था का हिस्सा माना गया।
भारतीय चिंतन में यही भाव अलग-अलग रूपों में दिखाई देता है—
“ईशावास्यमिदं सर्वम्।”
और—
“वसुधैव कुटुम्बकम्।”
इन सूत्रों को यदि आज की भाषा में समझें तो संदेश बहुत सरल है—दुनिया को केवल अपने उपयोग की वस्तु मानकर नहीं, बल्कि अपने परिवार की तरह देखना।
यही दृष्टि पर्यावरण संरक्षण को भी केवल आधुनिक नीति नहीं रहने देती। वह उसे जीवन का दायित्व बना देती है।
विविधता से डरने की नहीं, उसे समझने की जरूरत
डॉ. भागवत के भाषण में बार-बार एक बात उभरकर आई—विविधता और एकता एक-दूसरे की विरोधी नहीं हैं।
भारत में भाषाएँ अलग हैं। पूजा-पद्धतियाँ अलग हैं। वेशभूषा और खान-पान अलग हैं। क्षेत्र बदलने के साथ लोकजीवन बदल जाता है।
फिर भी भारत को एक बनाए रखने वाली कोई अदृश्य डोर है।
इसी भाव को उन्होंने कहा कि हिंदू विविधता को विभाजन नहीं मानता। विविधता तो एकता का शृंगार है। (ndtv.com)
यह विचार आज के समय में इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि दुनिया के अनेक हिस्सों में पहचान की राजनीति और सांस्कृतिक टकराव बढ़ रहे हैं।
सवाल यह है कि क्या अलग होना अनिवार्य रूप से अलग-थलग होना है?
हिंदू दर्शन कहता है—नहीं।
अनेक रास्ते हो सकते हैं, लेकिन मानवता का मूल एक हो सकता है।
अमेरिका में जन्मी भारतीय पीढ़ी के लिए संदेश
इस आयोजन की सबसे खास बातों में से एक यह थी कि इसमें अमेरिका में जन्मे और पले-बढ़े भारतीय मूल के युवाओं की बड़ी भागीदारी दिखाई दी।
यह पीढ़ी भारत को केवल अपने माता-पिता की स्मृतियों से नहीं जानती। उसका जीवन अमेरिका में है। उसकी शिक्षा, नौकरी, मित्रता और सामाजिक पहचान अमेरिका से जुड़ी है।
ऐसे में उसके सामने एक स्वाभाविक सवाल हो सकता है—
क्या अपनी भारतीय जड़ों से जुड़े रहना और अमेरिका के प्रति पूरी निष्ठा रखना दोनों एक साथ संभव हैं?
डॉ. भागवत ने इसका उत्तर बहुत स्पष्ट शब्दों में दिया।
उन्होंने प्रवासी भारतीयों से कहा कि वे जिस देश में रहते हैं और जहाँ अपना कर्म करते हैं, उस कर्मभूमि के प्रति पूरी निष्ठा रखें और वहाँ के समाज के लिए सकारात्मक योगदान दें। (vskbharat.com)
यह संदेश विशेष रूप से नई पीढ़ी के लिए महत्वपूर्ण है।
अपनी जड़ों से जुड़ना किसी दूसरी भूमि के प्रति निष्ठा को कम नहीं करता।
बल्कि अपनी संस्कृति से मिले अच्छे मूल्यों को लेकर जिस समाज में हम रहते हैं, उसके निर्माण में योगदान देना ही शायद सांस्कृतिक पहचान का सबसे स्वस्थ रूप है।
भारतीय मूल और अमेरिकी नागरिकता—दोनों के बीच संघर्ष आवश्यक नहीं है।
हिंदू विचार को समझाने से अधिक जरूरी है उसे जीना
डॉ. भागवत ने एक और महत्वपूर्ण बात कही—दुनिया को हिंदू जीवन-दर्शन समझाने का सबसे अच्छा तरीका केवल भाषण देना नहीं, बल्कि उसे अपने जीवन में उतारना है। (vskbharat.com)
यह बात साधारण लग सकती है, लेकिन इसका अर्थ बहुत गहरा है।
यदि कोई व्यक्ति ईमानदारी से काम करता है, अपने परिवार और समाज के प्रति जिम्मेदार है, प्रकृति का सम्मान करता है, जरूरतमंद की मदद करता है और अलग विचार रखने वाले व्यक्ति के प्रति भी सम्मान बनाए रखता है, तो वह बिना कोई भाषण दिए भी अपने संस्कारों का परिचय दे रहा है।
यानी—
भारतीय दर्शन का सबसे प्रभावशाली प्रचार उसका आचरण है।
‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ केवल मंच का मंत्र नहीं
‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ भारत की पहचान से जुड़ा एक अत्यंत लोकप्रिय सूत्र है।
लेकिन इसकी वास्तविक परीक्षा तब होती है जब इसे जीवन में उतारने की बात आती है।
यदि पूरी पृथ्वी परिवार है तो प्रकृति के साथ हमारा व्यवहार कैसा होना चाहिए?
यदि दूसरा व्यक्ति भी उसी व्यापक परिवार का हिस्सा है तो उसके दुःख के प्रति हमारी प्रतिक्रिया कैसी होनी चाहिए?
यहीं से पर्यावरण संरक्षण और निःस्वार्थ सेवा का विचार निकलता है।
डॉ. भागवत ने भी इसी दिशा में विचार रखते हुए कहा कि एकात्मता को केवल विचार न बनाया जाए, बल्कि उसे जीवन और व्यवहार में उतारा जाए। (ndtv.com)
इस दृष्टि से सेवा कोई बाहरी गतिविधि नहीं है।
वह उस विचार का स्वाभाविक परिणाम है कि दूसरे में भी वही जीवन है जो मेरे भीतर है।
धर्म का अर्थ केवल ‘Religion’ नहीं
डॉ. भागवत ने धर्म और मजहब के बीच अंतर की ओर भी संकेत किया।
भारतीय संदर्भ में धर्म का अर्थ केवल किसी विशेष पूजा-पद्धति या संप्रदाय से जुड़ना नहीं है। धर्म जीवन को संतुलित रखने वाली वह व्यवस्था है जो व्यक्ति के अधिकारों के साथ उसके कर्तव्यों को भी याद दिलाती है। (ap7am.com)
यहाँ प्रश्न केवल यह नहीं है कि—
“आप किसकी पूजा करते हैं?”
प्रश्न यह भी है—
“आप दूसरों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं?”
यही भारतीय धर्म-दृष्टि को उसके व्यापक अर्थ में समझने की कुंजी है।
मैडिसन स्क्वायर गार्डन से पहले टाइम्स स्क्वायर पर भी दिखा संदेश
मुख्य आयोजन से पहले न्यूयॉर्क के प्रसिद्ध Times Square पर भी Universal Oneness Celebration से जुड़े संदेश डिजिटल बिलबोर्ड पर प्रदर्शित किए गए।
यह दृश्य अपने आप में प्रतीकात्मक था।
न्यूयॉर्क जैसे वैश्विक महानगर के बीच भारत की ओर से ‘एकात्मता’ और ‘विविधता’ की बात कही जा रही थी। (organiser.org)
यह केवल प्रचार का विषय नहीं है।
प्रवासी भारतीय समाज में भी एक बदलाव दिखाई दे रहा है। नई पीढ़ी केवल आर्थिक सफलता के साथ अपनी सांस्कृतिक पहचान को लेकर भी प्रश्न पूछ रही है।
वह जानना चाहती है—
मेरी जड़ें कहाँ हैं?
मेरी संस्कृति मुझे आज के विश्व के लिए क्या देती है?
Universal Oneness Celebration इसी प्रश्न के सामने एक उत्तर रखने का प्रयास था।
6,000 लोगों की भीड़ से बड़ी बात थी नई पीढ़ी की उपस्थिति
लगभग 6,000 लोगों की उपस्थिति निश्चित रूप से बड़ी बात है।
लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि उनमें बड़ी संख्या में युवा भारतीय-अमेरिकी मौजूद थे। (vskbharat.com)
यह आने वाले समय के लिए महत्वपूर्ण संकेत है।
यदि भारतीय मूल की नई पीढ़ी हिंदू जीवन-दर्शन को केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित न रखकर उसके व्यापक मानवीय पक्ष—परिवार, सेवा, प्रकृति, विविधता और आत्मानुशासन—के रूप में समझती है, तो वह अपनी सांस्कृतिक पहचान को आधुनिक जीवन के साथ सहज रूप से जोड़ सकती है।
आज की युवा पीढ़ी के सामने जिन समस्याओं का सामना है, उनके बीच भारतीय विचार के कई सूत्र नए अर्थ ग्रहण कर सकते हैं—
अत्यधिक उपभोक्तावाद के बीच संयम,
अकेलेपन के बीच परिवार और समुदाय,
ध्रुवीकरण के बीच संवाद,
पर्यावरण संकट के बीच प्रकृति के प्रति संवेदना
और व्यक्तिगत सफलता के साथ समाज के प्रति दायित्व।
26 Second Avenue : विचार के बाद सेवा का दृश्य
डॉ. भागवत की न्यूयॉर्क यात्रा का एक अत्यंत भावपूर्ण प्रसंग 26 Second Avenue स्थित ISKCON के ऐतिहासिक स्थल की यात्रा भी रहा।
समयक्रम के लिहाज से एक तथ्य स्पष्ट करना जरूरी है—उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार यह यात्रा मुख्य Universal Oneness कार्यक्रम से पहले, 28 अगस्त को हुई थी। (timesofindia.indiatimes.com)
यही वह स्थान है जहाँ 1966 में ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद ने ISKCON की शुरुआत की थी।
डॉ. भागवत ने वहाँ पूजा-अर्चना की और जरूरतमंद तथा बेघर लोगों के लिए चल रहे भोजन वितरण कार्यक्रम में भी भाग लिया। रिपोर्टों के अनुसार उनकी उपस्थिति में Zero Hunger New York initiative के अंतर्गत एक लाखवाँ भोजन वितरित किया गया। (saptashwatv.com)
इस दृश्य को Universal Oneness के संदेश से अलग करके देखना कठिन है।
एक ओर मंच पर कहा जा रहा था—
वसुधैव कुटुम्बकम्।
और दूसरी ओर भूखे व्यक्ति तक भोजन पहुँचाने की सेवा हो रही थी।
विचार तभी अर्थवान होता है जब वह व्यवहार में दिखाई दे।
स्वामी विवेकानंद से डॉ. मोहन भागवत तक : अमेरिका में भारतीय विचार की यात्रा
अमेरिका की धरती पर भारतीय विचार की चर्चा कोई नई बात नहीं है।
1893 में स्वामी विवेकानंद ने शिकागो में विश्व धर्म संसद के मंच से भारतीय आध्यात्मिक दृष्टि का परिचय कराया था।
उन्होंने दुनिया को भारतीय दृष्टि के उस पक्ष से परिचित कराया जिसमें अलग-अलग मार्गों और परंपराओं के बावजूद मानवता की एकता की बात थी।
डॉ. भागवत ने भी अपने न्यूयॉर्क संबोधन में स्वामी विवेकानंद का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत के पास दुनिया को देने के लिए विविधता के भीतर एकात्मता का संदेश है। (ndtv.com)
समय बदल गया है।
मंच बदल गया है।
लेकिन प्रश्न कहीं न कहीं वही है—
भारत दुनिया को क्या देना चाहता है?
और इस बार उत्तर फिर एक शब्द में सामने आया—
एकात्मता।
RSS के शताब्दी वर्ष में वैश्विक संवाद
डॉ. भागवत की अमेरिका यात्रा को RSS के शताब्दी वर्ष के व्यापक संदर्भ में भी देखा जा रहा है। अमेरिका के बाद उनकी यात्रा कनाडा और ब्रिटेन तक जाने वाली है। (english.publictv.in)
RSS के बारे में दुनिया में अलग-अलग धारणाएँ हैं। समर्थक इसे भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के सामाजिक संगठन के रूप में देखते हैं, जबकि आलोचक इसकी विचारधारा को लेकर अलग प्रश्न उठाते हैं।
ऐसे में विदेश में होने वाले संवादों का महत्व इस बात में भी है कि संगठन अपने विचारों को स्वयं किस भाषा और किस संदर्भ में प्रस्तुत करता है।
न्यूयॉर्क के इस आयोजन में जिस भाषा पर जोर रहा, वह थी—
एकात्मता।
विविधता।
सेवा।
प्रकृति।
उत्तरदायित्व।
यानी हिंदुत्व की प्रस्तुति किसी राजनीतिक नारे से अधिक एक जीवन-दृष्टि के रूप में करने का प्रयास दिखाई दिया।
हिंदुत्व का वैश्विक अर्थ : पहचान से आगे जीवन-दृष्टि तक
यदि हिंदुत्व को केवल भारत की राजनीतिक बहसों के संदर्भ में देखा जाए तो उसका अर्थ सीमित हो जाता है।
लेकिन यदि उसे भारतीय सभ्यता की जीवन-दृष्टि के रूप में समझें तो उसके प्रश्न बहुत व्यापक हैं—
मनुष्य और प्रकृति का संबंध कैसा हो?
विभिन्न समुदायों के बीच संबंध कैसा हो?
व्यक्ति की स्वतंत्रता और समाज के प्रति दायित्व में संतुलन कैसे बने?
समृद्धि के साथ सेवा की भावना कैसे आए?
और अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहते हुए दूसरे समाज के प्रति जिम्मेदार नागरिक कैसे बना जाए?
Universal Oneness Celebration में डॉ. भागवत का संदेश इन्हीं प्रश्नों के इर्द-गिर्द घूमता दिखाई दिया।
यही कारण है कि कार्यक्रम के नाम में शामिल ‘Oneness’ केवल एक आकर्षक अंग्रेजी शब्द नहीं रह जाता।
वह हिंदू दर्शन की उस मूल भावना की ओर संकेत करता है जिसमें अनेकता के भीतर एकता को देखा जाता है।
प्रवेश भी अनुशासित, आयोजन भी विशिष्ट
कार्यक्रम में प्रवेश सामान्य सार्वजनिक प्रवेश जैसा नहीं था। जिन लोगों ने पहले से पंजीकरण कराया था, उनका डिजिटल आईडी सत्यापन पूरा होने के बाद ही उन्हें अंदर प्रवेश दिया गया।
यह व्यवस्था बताती है कि आयोजन को कितनी गंभीरता और सुव्यवस्थित तरीके से तैयार किया गया था।
39 राज्यों और 850 शहरों से आए लोगों का एक ही स्थान पर पहुँचना अपने आप में बड़ी संगठनात्मक चुनौती थी।
लेकिन इससे भी बड़ी चुनौती थी—इतने विविध पृष्ठभूमि वाले लोगों को एक विचार के सूत्र में जोड़ना।
और उस सूत्र का नाम था—
Universal Oneness.
निष्कर्ष : न्यूयॉर्क से निकला संदेश केवल भारतीयों के लिए नहीं था
मैडिसन स्क्वायर गार्डन में आयोजित इस कार्यक्रम को केवल इस आधार पर नहीं देखा जाना चाहिए कि वहाँ कितने लोग आए।
महत्वपूर्ण यह है कि वहाँ क्या कहा गया और किससे कहा गया।
प्रवासी भारतीयों से कहा गया—
जिस देश को आपने अपनी कर्मभूमि बनाया है, उसके प्रति पूरी निष्ठा रखिए।
युवा पीढ़ी से कहा गया—
अपनी जड़ों से जुड़िए, लेकिन अपनी विविधता को विभाजन मत बनने दीजिए।
समाज से कहा गया—
विचार को व्यवहार में उतारिए।
और दुनिया से कहा गया—
विविधता संघर्ष का कारण होना जरूरी नहीं है।
हिंदुत्व की इस प्रस्तुति में किसी एकरूप दुनिया की कल्पना नहीं है।
इसके बजाय एक ऐसी दुनिया की कल्पना है जिसमें लोग अपनी-अपनी पहचान के साथ रहते हुए भी एक-दूसरे को स्वीकार कर सकें।
शायद यही कारण है कि डॉ. भागवत के इस कार्यक्रम का सबसे महत्वपूर्ण संदेश किसी लंबे भाषण में नहीं, बल्कि एक सरल विचार में समाया हुआ है—
“विविधता हमारी दूरी नहीं, हमारी एकात्मता का शृंगार है।”
और यदि ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ केवल मंच पर बोला जाने वाला मंत्र न रहकर पर्यावरण संरक्षण, सेवा, सामाजिक संवेदना और जिम्मेदार नागरिकता में दिखाई देने लगे, तो यह विचार वास्तव में वैश्विक बन सकता है।
न्यूयॉर्क से उठी यह आवाज इसलिए महत्वपूर्ण है कि वह दुनिया को अपने जैसा बनाने का आग्रह नहीं करती।
वह दुनिया से केवल इतना कहती है—
अलग-अलग रहकर भी एक होने की संभावना को पहचानिए।
यही भारत की प्राचीन सभ्यता का आधुनिक संदेश हो सकता है।
और यही Universal Oneness Celebration की सबसे बड़ी सार्थकता भी है।
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