अतीत का आदर बनाम वर्तमान का विवाद: सावरकर और गाँधी के रिश्तों से आज हम क्या सीखें?
"महात्मा गाँधी और वीर सावरकर के वैचारिक मतभेदों के पीछे छिपे आपसी सम्मान के ऐतिहासिक सच को जानिए। इतिहास के पन्नों से वर्तमान राजनीतिक विवादों का एक निष्पक्ष विश्लेषण।"
आज का दौर सोशल मीडिया की 'रील्स' और चंद सेकेंड्स की 'हेडलाइंस' का दौर है। इस दौर में इतिहास को समझने से ज्यादा, उसे अपनी राजनीतिक सहूलियत के हिसाब से इस्तेमाल करने की होड़ मची है। वर्तमान राजनीतिक विमर्श में दो नाम ऐसे हैं, जिन्हें अक्सर एक-दूसरे के धुर विरोधी और विपरीत ध्रुवों के रूप में खड़ा कर दिया जाता है—महात्मा गाँधी और वीर विनायक दामोदर सावरकर।
आज की युवा पीढ़ी को सोशल मीडिया पर चल रही बहसों को देखकर ऐसा लग सकता है कि इन दोनों महापुरुषों के बीच केवल कटुता और बैर था। लेकिन जब हम इतिहास के पन्नों को पलटते हैं और तथ्यों की गहराई में उतरते हैं, तो एक अलग ही सच्चाई सामने आती है। प्रसिद्ध जीवनीकार धनंजय कीर ने ठीक ही लिखा था:
“समाज की भलाई के लिए कई बार दो महान लोग एक समय में अलग-अलग कार्य कर रहे होते हैं। इसमें एक व्यक्ति वह होता है, जोकि समाज की भलाई के लिए कष्ट सहन करता है और दूसरा उसकी बेहतरी का बीड़ा उठाता है। गाँधी पहली तरह के व्यक्तियों में शामिल थे जबकि सावरकर दूसरी तरह के लोगों का नेतृत्व करते हैं।”
1. वैचारिक मतभेद, लेकिन व्यक्तिगत सम्मान
आज के दौर में यदि दो लोगों के विचार अलग हों, तो वे एक-दूसरे के घोर विरोधी हो जाते हैं। लेकिन गाँधी और सावरकर का रिश्ता इससे बिल्कुल अलग था। साल 1909 में लंदन में विजयादशमी के दिन हुई उनकी पहली मुलाकात से लेकर 1927 में रत्नागिरी की प्रत्यक्ष मुलाकात तक, दोनों के बीच राष्ट्र के मुद्दों पर गंभीर मतभेद थे। अस्पृश्यता और शुद्धि जैसे विषयों पर दोनों की राहें अलग थीं, लेकिन मन में कोई मैल नहीं था।
गाँधी जी ने सावरकर के बारे में लिखा था:
“सत्यप्रेमी तथा सत्य के लिए प्राण तक न्योछावर कर सकने वाले व्यक्ति के रूप में आपके लिए मेरे मन में कितना आदर है। अंततः हम दोनों का ध्येय भी एक है...”
यह आज के राजनेताओं और विचारकों के लिए एक बहुत बड़ा सबक है कि वैचारिक भिन्नता कभी व्यक्तिगत अनादर का कारण नहीं बननी चाहिए।
2. 'दया याचिका' (Mercy Petition) और आज का चश्मा
वर्तमान समय में वीर सावरकर पर सबसे बड़ा प्रहार उनकी दया याचिकाओं को लेकर किया जाता है। लेकिन इतिहास को तत्कालीन परिस्थितियों के चश्मे से देखना जरूरी है, न कि आज के वातानुकूलित कमरों में बैठकर।
सावरकर ने जेल की कोठरी में सड़ने के बजाय बाहर आकर राष्ट्र कार्य करने को प्राथमिकता दी, जो एक कैदी का कानूनी अधिकार भी था। खुद महात्मा गाँधी ने 1920 में सावरकर के भाई नारायण दामोदर सावरकर को पत्र लिखकर एक संक्षिप्त याचिका (Petition) तैयार करने का सुझाव दिया था, ताकि जनता का ध्यान उनके राजनीतिक संघर्ष की ओर खींचा जा सके। गाँधी जी ने ऐसा ही सुझाव अली बंधुओं को भी दिया था।
अतः, तत्कालीन रणनीतियों को आज 'कायरता' का नाम देना इतिहास के साथ नाइंसाफी है।
3. हर युग की अपनी रणनीतियाँ थीं
यदि हम केवल सावरकर की याचिकाओं पर सवाल उठाते हैं, तो हमें इतिहास के उस पाश को भी देखना होगा जहाँ राष्ट्रहित में कई समझौते हुए।
स्वदेशी आंदोलन के चरम पर होने के बावजूद गोपाल कृष्ण गोखले ने तत्कालीन वायसराय लॉर्ड मिंटो के आश्वासन पर बहिष्कार को रोकने की बात कही थी।
जलियांवाला बाग जैसे वीभत्स नरसंहार के ठीक बाद, 1919 के अमृतसर अधिवेशन में मोतीलाल नेहरू ने ब्रिटिश शासन और प्रिंस ऑफ वेल्स की प्रशंसा में शब्द कहे थे।
क्या इसका यह मतलब है कि गोखले या मोतीलाल नेहरू देशद्रोही थे? बिल्कुल नहीं। वे सभी सच्चे राष्ट्रभक्त थे, जो अपनी-अपनी समझ और रणनीति के अनुसार देश की आजादी के लिए लड़ रहे थे।
4. स्वतंत्रता के बाद का साझा सम्मान: दलगत राजनीति से ऊपर
आज भले ही राजनीतिक दल सावरकर के नाम पर बंटे हों, लेकिन आजादी के तुरंत बाद का भारत अधिक परिपक्व था। 1947 में जब स्वाधीनता आंदोलन पर केंद्रित पुस्तक 'To The Gates of Liberty' का प्रकाशन हुआ, तो उसकी प्रस्तावना खुद प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने लिखी थी। इस पुस्तक की निर्माण समिति (जिसमें डॉ. राजेंद्र प्रसाद और जयप्रकाश नारायण जैसे दिग्गज थे) ने सावरकर के दो लेखों को न केवल शामिल किया, बल्कि उनके नाम के आगे ससम्मान ‘वीर’ भी लगाया।
यहाँ तक कि कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) के वरिष्ठ सांसद ए.के. गोपालन और एच.एन. मुखर्जी ने भी संसद में सावरकर के निधन पर शोक संदेश जारी करने का पुरजोर समर्थन किया था। 1973 में गृह मंत्री उमाशंकर दीक्षित ने संसद में स्पष्ट रूप से उन्हें स्वतंत्रता सेनानी के रूप में मान्यता दिए जाने की पुष्टि की थी।
इतिहास को जोड़ने का माध्यम बनाएं, तोड़ने का नहीं
आज की बदलती परिस्थितियों में जब हम 'न्यू इंडिया' की बात करते हैं, तो हमें अपने अतीत के प्रति भी एक संतुलित और न्यायपूर्ण दृष्टिकोण अपनाना होगा। भारत की आजादी किसी एक विचारधारा या एक व्यक्ति की बपौती नहीं थी। यह सावरकर के क्रांतिकारी राष्ट्रवाद, गाँधी के जन-आंदोलन, तिलक के स्वराज उद्घोष और आंबेडकर के सामाजिक न्याय के सामूहिक प्रयासों का प्रतिफल था।
अपनी तात्कालिक राजनीतिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए इतिहास के नायकों को कठघरे में खड़ा करना बंद होना चाहिए। सावरकर और गाँधी के बीच का संवाद हमें सिखाता है कि हम असहमतियों के बीच भी एक-दूसरे के त्याग का सम्मान कैसे कर सकते हैं। वर्तमान भारत को आज इसी 'संवाद और सम्मान' की संस्कृति की सबसे ज्यादा जरूरत है।
आपकी राय: क्या आपको लगता है कि आज के राजनेताओं को इतिहास के इन संदर्भों से सीख लेकर अपनी राजनीतिक भाषा में सुधार करना चाहिए? नीचे कमेंट बॉक्स में अपने विचार साझा करें।
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