राजनीति का यह 'शॉर्टकट' कहीं देश के लिए 'डेड एंड' न बन जाए!
राजनीति का यह 'शॉर्टकट' कहीं देश के लिए 'डेड एंड' न बन जाए!
आज हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ राजनीति में तात्कालिक लाभ, वोट बैंक और क्षेत्रीय अस्मिता के नाम पर देश की संप्रभुता को दांव पर लगाने से भी गुरेज़ नहीं किया जा रहा है। हाल ही में देश के एक ज़िम्मेदार राज्य के संवैधानिक शीर्ष पद (मुख्यमंत्री) पर बैठे व्यक्ति द्वारा एक प्रतिबंधित संगठन के मुखिया को सार्वजनिक रूप से श्रद्धांजलि दिया जाना बेहद चौंकाने वाला और चिंताजनक है।
यह केवल एक राजनीतिक घटना नहीं है, बल्कि एक बेहद खतरनाक और गलत परंपरा की शुरुआत है, जिसे यदि आज नहीं टोका गया, तो इसके परिणाम पूरे देश को भुगतने होंगे।
क्षेत्रीय अस्मिता या राष्ट्रीय सुरक्षा से खिलवाड़?
हमारा देश विविधताओं से भरा है। हर राज्य की अपनी भाषा, संस्कृति और भावनाएँ हैं, जिनका सम्मान होना ही चाहिए। लेकिन क्या क्षेत्रीय अस्मिता का दायरा देश की संप्रभुता और कानून से भी बड़ा हो सकता है?
जिस संगठन (LTTE) को भारत सरकार ने पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की जघन्य हत्या और देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए ख़तरा मानते हुए कानूनन प्रतिबंधित (Banned) कर रखा है, उसके प्रति किसी भी प्रकार की सहानुभूति दिखाना देश के कानून को सीधे चुनौती देना है।
सीधा और स्पष्ट नियम है: देश का कानून और राष्ट्र की संप्रभुता हमेशा किसी भी क्षेत्रीय या राजनीतिक लाभ से ऊपर होने चाहिए। जब संवैधानिक पदों पर बैठे लोग ही इन सीमाओं को लांघने लगेंगे, तो हम कानून के राज की उम्मीद किससे करेंगे?
भ्रमित मतदाताओं (Voters) के नाम एक खुली चेतावनी
एक सजग नागरिक और मतदाता के रूप में आज हमें आत्ममंथन करने की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है। अक्सर हम किसी अभिनेता के स्क्रीन-करिश्मे (Screen Charisma) से प्रभावित होकर या क्षेत्रीयता के अति-उत्साह में बहकर उनके हर सही-गलत कदम पर ताली बजाने लगते हैं। हमें समझना होगा कि:
फिल्मी नायक और राजनेता में अंतर है: पर्दे पर व्यवस्था से लड़ने वाले नायक जब असल ज़िंदगी में राजनीति की बिसात पर उतरते हैं, तो वे अक्सर वोटों के ध्रुवीकरण के लिए सबसे आसान और संवेदनशील रास्तों को चुनते हैं।
भावनात्मक शोषण को पहचानें: जो नेता आपके भाषाई या क्षेत्रीय सेंटिमेंट्स (भावनाओं) को सहलाकर देश की अखंडता को चोट पहुँचाने वाले तत्वों को सही ठहराने की कोशिश कर रहे हैं, वे असल में आपका भला नहीं कर रहे, बल्कि वे आपके कंधों पर बंदूक रखकर अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की फसल काट रहे हैं।
सोचिए कि कल क्या होगा: यदि आज हम इस कदम को 'राजनीतिक मजबूरी' या 'भावनात्मक एकजुटता' कहकर अनदेखा कर देते हैं, तो कल को कोई दूसरा दल किसी दूसरे हिस्से में देश-विरोधी ताकतों को अपनी 'मजबूरी' बताकर गले लगा लेगा। तब हमारे पास विरोध करने का नैतिक अधिकार भी नहीं बचेगा।
राष्ट्र सर्वोपरि: अब जागने का समय है
राजनीति में वोट बटोरने के शॉर्टकट देश के भविष्य के लिए हमेशा 'डेड एंड' साबित हुए हैं। इतिहास गवाह है कि जब-जब क्षेत्रीय लाभ के लिए अलगाववादी या उग्रवादी विचारधाराओं को खाद-पानी दिया गया है, तब-तब देश ने अपने महान नेताओं और मासूम नागरिकों को खोया है।
चेतावनी साफ़ है— अगर आज मतदाता के रूप में हम भ्रमित रहे, और सही-गलत का अंतर भूलकर ऐसी खतरनाक राजनीति को मूक सहमति देते रहे, तो हम खुद अपने हाथों से देश के संघीय ढांचे और आंतरिक सुरक्षा को कमज़ोर करेंगे।
नेताओं को यह कड़ा संदेश जाना ही चाहिए कि वे सत्ता की कुर्सी तक पहुँचने के लिए देश की एकता और संप्रभुता की लक्ष्मण रेखा को पार करने की जुर्रत न करें। दल आते-जाते रहेंगे, सरकारें बदलती रहेंगी, लेकिन यह देश और इसकी संप्रभुता अक्षुण्ण रहनी चाहिए।
जागिए, सोचिए और देश को सर्वोपरि रखिए!
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