किस्मत: कैसे एक संघर्षरत कंपनी को मोदी ने बना दिया दुनिया की चर्चित ब्रांड

12 सेकेंड में बदली किस्मत: कैसे एक संघर्षरत कंपनी को मोदी ने बना दिया दुनिया की चर्चित ब्रांड

भारत में कुछ ब्रांड केवल उत्पाद नहीं होते, वे स्मृतियाँ होते हैं।
कुछ नाम ऐसे होते हैं जिन्हें सुनते ही बचपन की आवाज़ें कानों में गूंजने लगती हैं — स्कूल की घंटी, टिफिन की खुशबू, दादी की चाय, ट्रेन का सफर और पाँच रुपए में मिलने वाली छोटी-सी खुशी।

ऐसा ही एक नाम है — Parle Products।

मैंगो बाइट, किस्मी, पॉपिन्स, मेलोडी, मोनाको, क्रैकजैक, हाइड एंड सीक, मैरी और सबसे बढ़कर पार्ले-जी…
यह केवल बिस्किट या टॉफियाँ नहीं हैं, यह भारत की सामूहिक स्मृति का हिस्सा हैं।

बहुत कम लोग जानते हैं कि “पार्ले” नाम मुंबई के उपनगर विले पार्ले से आया। वहीं से 1928 में एक छोटे से सपने ने जन्म लिया था। उस दौर में भारतीय बाजार पर विदेशी कंपनियों का दबदबा था। अंग्रेज़ी ब्रांड्स को ही गुणवत्ता का प्रतीक माना जाता था। ऐसे समय में मोहनलाल दयाल चौहान ने स्वदेशी सोच के साथ एक छोटी फैक्ट्री शुरू की।

1929 में करीब 75 हजार रुपए में मशीनें खरीदी गईं। अगले ही वर्ष ऑरेंज कैंडी बाजार में आई। धीरे-धीरे लोगों ने इस भारतीय ब्रांड को अपनाना शुरू किया।
1939 में वह हुआ जिसने भारतीय खाद्य उद्योग की दिशा बदल दी — Parle-G का जन्म।

उस समय शायद किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि यही बिस्किट एक दिन दुनिया का सबसे अधिक बिकने वाला सिंगल बिस्किट ब्रांड बनेगा।

संघर्ष, विभाजन और फिर विस्तार

समय बदला, पीढ़ियाँ बदलीं, लेकिन पार्ले ने खुद को समय के साथ ढालना नहीं छोड़ा।
1970 के दशक में परिवार का विभाजन हुआ। अलग-अलग व्यवसायों की जिम्मेदारियाँ बाँटी गईं। विजय चौहान, राज चौहान और शरद चौहान ने Parle Products को आगे बढ़ाया।
दूसरी ओर प्रकाश चौहान ने Parle Agro और रमेश चौहान ने Bisleri को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया।

आज विजय चौहान लगभग 90 वर्ष की आयु में भी इस विरासत के मार्गदर्शक माने जाते हैं। MIT से मेकैनिकल इंजीनियरिंग पढ़ चुके विजय चौहान का व्यक्तित्व जितना सरल है, उनकी कारोबारी दृष्टि उतनी ही गहरी रही है। कहा जाता है कि वे J. R. D. Tata के साथ गोल्फ खेल चुके हैं।

आज कंपनी की कमान नई पीढ़ी — अजय चौहान, समर चौहान और अंबिका चौहान — संभाल रही है।
मध्य-पूर्व से लेकर मंगोलिया तक पार्ले के उत्पाद पहुँच रहे हैं।
7000 से अधिक डिस्ट्रीब्यूटर्स और 75 लाख आउटलेट्स का नेटवर्क किसी भी FMCG कंपनी के लिए असाधारण माना जाता है।

फिर आया वह “12 सेकेंड” वाला क्षण

कोविड महामारी के दौरान पूरा देश बंद था। फैक्ट्रियाँ ठप थीं। करोड़ों लोग घरों में कैद थे। उस समय भी पार्ले-जी लगातार लोगों तक पहुँच रहा था। क्योंकि भारतीय घरों में यह केवल बिस्किट नहीं, “ज़रूरत” माना जाता है।

इसी दौरान प्रधानमंत्री Narendra Modi ने एक सार्वजनिक संदर्भ में पार्ले-जी का उल्लेख किया।
बस कुछ सेकेंड की चर्चा थी, लेकिन उसके बाद सोशल मीडिया पर मानो विस्फोट हो गया।
मीम्स बने, वीडियो बने, nostalgic पोस्ट्स की बाढ़ आ गई। लोगों ने अपने बचपन की यादें साझा करनी शुरू कर दीं।

मार्केटिंग विशेषज्ञों ने बाद में कहा — जिस ब्रांड को नई पीढ़ी केवल “पुराना बिस्किट” मानने लगी थी, वह अचानक फिर से सांस्कृतिक चर्चा के केंद्र में आ गया।

विज्ञापन पर करोड़ों खर्च करने के बाद भी कंपनियाँ जो पहचान नहीं बना पातीं, वह पार्ले को कुछ सेकेंड में मिल गई।

लेकिन केवल चर्चा से ब्रांड नहीं बचते।
ब्रांड बचते हैं भरोसे से।

पार्ले आज भी क्यों प्रासंगिक है?

क्योंकि इस कंपनी ने कभी अपने मूल ग्राहक को नहीं छोड़ा।

जब दुनिया “प्रीमियम” की दौड़ में भाग रही थी, तब भी पार्ले गाँवों की छोटी दुकानों तक पहुँचता रहा।
जब विदेशी स्नैक्स बाजार में आए, तब भी पाँच-दस रुपए के पैक पर ध्यान बना रहा।
जब नई पीढ़ी चॉकलेट्स की ओर बढ़ी, तब पार्ले ने डार्क बिस्किट्स और प्रीमियम प्लैटिना रेंज लॉन्च कर दी।

यानी परंपरा भी, प्रयोग भी।

आज कंपनी के पास 50 से अधिक ब्रांड हैं।
हर वर्ष 12 लाख मीट्रिक टन से अधिक बिस्किट बेचना कोई सामान्य उपलब्धि नहीं।
बाजार हिस्सेदारी में भले कुछ कंपनियाँ आगे दिखें, लेकिन मात्रा के स्तर पर पार्ले अब भी बेहद मजबूत है।

सबसे दिलचस्प बात यह है कि इतना विशाल समूह आज तक शेयर बाजार में सूचीबद्ध नहीं हुआ।
कारण साफ है — परिवार को बाहरी पूंजी की आवश्यकता महसूस नहीं हुई।
125 से अधिक कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफैक्चरर्स के साथ साझेदारी कर कंपनी ने लागत और विस्तार दोनों को संतुलित रखा।

केवल ब्रांड नहीं, भावनात्मक रिश्ता

कोविड काल में कंपनी द्वारा करोड़ों बिस्किट पैकेट दान करना केवल CSR गतिविधि नहीं थी।
वह उस रिश्ते का प्रमाण था जो पार्ले ने भारत के साथ बनाया है।

किसी भी रेलवे स्टेशन पर जाइए, किसी गाँव की दुकान पर जाइए, किसी सरकारी कार्यालय की चाय देख लीजिए — पार्ले आपको मिल जाएगा।

क्योंकि कुछ चीजें स्वाद से नहीं, विश्वास से चलती हैं।

आज भी करोड़ों भारतीयों के लिए चाय का मतलब पार्ले-जी है।
बचपन का मतलब मैंगो बाइट है।
रेल यात्रा का मतलब मोनाको है।
और मेहमानों की प्लेट में रखा रस्क एक घरेलू अपनापन है।

व्यापार केवल उत्पाद बेचने से नहीं चलता।
व्यापार पीढ़ियों के साथ रिश्ता बनाने से चलता है।

और शायद यही कारण है कि लगभग सौ वर्ष पुरानी यह भारतीय कंपनी आज भी केवल जीवित नहीं है — बल्कि प्रासंगिक भी है।

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