ब्राह्मणों का ‘सौ प्रतिशत आरक्षण’ और भारतीय शिक्षा का सच: नैरेटिव बनाम ऐतिहासिक दस्तावेज़


ब्राह्मणों का ‘सौ प्रतिशत आरक्षण’ और भारतीय शिक्षा का सच: नैरेटिव बनाम ऐतिहासिक दस्तावेज़

पिछले कुछ समय से सोशल मीडिया, अकादमिक विमर्शों और सार्वजनिक मंचों से एक नैरेटिव बहुत आक्रामक ढंग से दोहराया जाता रहा है कि प्राचीन और मध्यकालीन भारत में पढ़ाई-लिखाई पर केवल ब्राह्मणों का हक था और उनके लिए ‘सौ प्रतिशत आरक्षण’ था। इस दावे के पीछे तर्क दिया जाता है कि चूँकि ब्राह्मण आबादी में मात्र दस प्रतिशत (या उससे कम) थे, इसलिए उन्होंने ज्ञान, भाषा और सत्ता के केंद्रों से बाकी नब्बे प्रतिशत समाज को पूरी तरह बेदखल कर रखा था।
यह सुनने में एक प्रभावी सामाजिक-राजनीतिक वक्तव्य लग सकता है, और आधुनिक राजनीति के समीकरणों में पूरी तरह फिट भी बैठता है। लेकिन जब हम इस दावे की गहराई में जाकर भारत के साहित्यिक इतिहास, समाजशास्त्र और स्वयं अंग्रेजों के तैयार किए हुए आधिकारिक दस्तावेज़ों को खंगालते हैं, तो यह नैरेटिव पूरी तरह भरभरा कर ढह जाता है। तथ्य यह बताते हैं कि अंग्रेजों के आने से पहले भारत की ज्ञान-परंपरा न केवल विकेंद्रीकृत थी, बल्कि सामाजिक रूप से बेहद समावेशी भी थी।
 आरोप: "तीन हज़ार साल तक शिक्षा पर केवल एक जाति का एकाधिकार था"
इस नैरेटिव के पैरोकारों का मुख्य तर्क यह है कि शूद्रों, महिलाओं, वैश्यों और अन्य श्रमजीवी जातियों को अक्षरों के ज्ञान से पूरी तरह दूर रखा गया। ज्ञान-विज्ञान, चिकित्सा, खगोल, न्याय और साहित्य सृजन जैसे काम केवल एक वर्ग विशेष के दायरे में ही सिमटे रहे और बाकी समाज केवल अशिक्षा के अंधकार में जीने को अभिशप्त था।
 खंडन १: हमारा साहित्यिक इतिहास और जातियों की विविधता

यदि शिक्षा पर सौ प्रतिशत आरक्षण की बात सच होती, तो भारत की विभिन्न भाषाओं का समृद्ध और कालजयी साहित्य केवल एक विशिष्ट जाति की कलम से निकला होता। लेकिन हमारी साहित्यिक और सांस्कृतिक विरासत इसके ठीक उलट गवाही देती है:
 शासक और क्षत्रिय वर्ग: वर्धन वंश के महाराजा हर्षवर्धन, परमार वंश के राजा भोज (जिन्होंने व्याकरण से लेकर वास्तुकला तक पर ग्रंथ लिखे), चालुक्य वंश के सोमेश्वर तृतीय और पल्लव वंश के महेंद्रवर्मा संस्कृत साहित्य के धुरंधर रचनाकार रहे हैं। वहीं प्राकृत में राजा हाल और तेलुगु में विजयनगर के महाराजा कृष्णदेवराय का नाम साहित्य जगत में अमर है।
 वैश्य और जैन परंपरा: आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह भारतेंदु हरिश्चंद्र और 'सुन्दरविलास' जैसी उत्कृष्ट रचना के कर्ता संत सुंदरदास वैश्य समाज से थे। संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश का एक बहुत बड़ा हिस्सा जैन साहित्यकारों (जैसे हेमचन्द्र, समन्तभद्र, मल्लिनाथ सूरी, और ब्रजभाषा में पहली आत्मकथा लिखने वाले बनारसीदास) ने रचा, जो मूलतः व्यापारिक और सामाजिक रूप से गैर-ब्राह्मण पृष्ठभूमि से थे।
 कायस्थ समाज का योगदान: प्रशासनिक और लिपिकीय कार्यों में अग्रणी इस समाज ने पढ़ने-लिखने की अपनी अलग समृद्ध परंपरा विकसित की और 'कैथी' जैसी स्वतंत्र लिपि को जन्म दिया, जिसमें मध्यकाल के अनगिनत प्रशासनिक और विधिक दस्तावेज़ लिखे गए।
 शूद्र और वंचित वर्ग का पुरुषार्थ: संस्कृत और क्षेत्रीय भाषाओं का इतिहास शूद्र वर्ग के कवियों और मनीषियों के योगदान के बिना अधूरा है। 'अमरुशतक' के रचयिता अमरु (अमरुक), काटय वेमा रेड्डी, कुमारगिरि, केरल के महान संत-दार्शनिक नारायण गुरु और कर्नाटक के लिंगायत समाज का 'वचन साहित्य' (जिसमें अक्का महादेवी जैसी महिलाएँ भी शामिल थीं) इसके जीवंत उदाहरण हैं।
यदि पढ़ने-लिखने पर पूरी तरह पाबंदी होती, तो समाज के इन कथित रूप से वंचित वर्गों से इतने बड़े रचनाकार, दार्शनिक और ऋषि-मनीषी कैसे पैदा होते?

खंडन २: अंग्रेजों के अपने दस्तावेज़ क्या कहते हैं? (इतिहासकार धर्मपाल का शोध)

इस विषय पर सबसे बड़ा और अकाट्य प्रमाण महान इतिहासकार और विचारक धर्मपाल ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक "द ब्यूटीफुल ट्री" (The Beautiful Tree) में दिया है। उन्होंने कोई वैचारिक उड़ान नहीं भरी, बल्कि 1820 से 1830 के दौरान ब्रिटिश सरकार (मद्रास प्रेसीडेंसी के गवर्नर सर थॉमस मुनरो) द्वारा करवाए गए विस्तृत और आधिकारिक शिक्षा सर्वेक्षणों के मूल आंकड़ों को लंदन के आर्काइव्स से निकालकर दुनिया के सामने रखा।
जब अंग्रेजों ने भारत पर पूरी तरह कब्ज़ा करने के बाद यहाँ की पारंपरिक शिक्षा व्यवस्था को समझना और उस पर नियंत्रण पाना चाहा, तो जो सरकारी आंकड़े सामने आए, वे आधुनिक नैरेटिव को पूरी तरह झुठलाते हैं:
 १. स्कूलों में शूद्रों का भारी बहुमत
मद्रास प्रेसीडेंसी के तत्कालीन कलेक्टर्स की रिपोर्ट के अनुसार, पारंपरिक प्राथमिक विद्यालयों (Elementary Schools) में पढ़ने वाले छात्रों में ब्राह्मणों की संख्या मात्र 20 से 25 प्रतिशत के बीच थी, जबकि शूद्र और अन्य पिछड़ी जातियों के छात्रों की हिस्सेदारी 50 से 70 प्रतिशत तक थी।
 सैलम (Salem) जिला: यहाँ कुल स्कूली छात्रों में ब्राह्मण मात्र 13.6% थे, जबकि शूद्र और अन्य पिछड़ी जातियाँ 69.8% थीं।
 तिरुचिरापल्ली (Trichinopoly): यहाँ ब्राह्मण 21.1% और शूद्र व अन्य वर्ग 66.5% थे।
 दक्खिन अर्कॉट (South Arcot): यहाँ तो स्थिति और भी स्पष्ट थी; ब्राह्मण छात्र 16.5% थे और शूद्रों की संख्या 82.3% थी।
 २. उच्च शिक्षा और विज्ञान में हिस्सेदारी
अक्सर यह मान लिया जाता है कि प्राथमिक शिक्षा भले ही सबके लिए हो, लेकिन विज्ञान और उच्च शिक्षा में केवल उच्च जातियाँ थीं। लेकिन धर्मपाल जी द्वारा संकलित मालाबार और कडापा जैसे क्षेत्रों के आंकड़ों से पता चलता है कि एस्ट्रोनॉमी' (खगोल विज्ञान), 'मेडिसिन' (चिकित्सा/आयुर्वेद), 'लॉ' (न्याय शास्त्र) और 'एस्ट्रोलॉजी' (ज्योतिष) की उच्च शिक्षा लेने वाले छात्रों में एक बहुत बड़ा हिस्सा उन जातियों का था जिन्हें आज हम ओबीसी या वंचित वर्ग में गिनते हैं। विशेषकर चिकित्सा और तकनीकी विधाओं में ये वर्ग अपनी पारिवारिक और सामाजिक परंपराओं के कारण अग्रणी थे।
३. शिक्षक भी समाज के सभी वर्गों से थे
बंगाल और बिहार में विलियम एडम (William Adam) द्वारा 1835-38 में किए गए सर्वेक्षणों का विश्लेषण करते हुए धर्मपाल जी बताते हैं कि गाँवों के सामान्य स्कूलों में केवल ब्राह्मण शिक्षक नहीं थे। वहाँ कायस्थ, सद्गोप, मंडल, तेली और यहाँ तक कि कई जगहों पर 'चांडाल' (वंचित) जाति के शिक्षक भी सभी वर्ग के बच्चों को शिक्षा दे रहे थे।
 खंडन ३: अन्य क्षेत्रीय शोध और ऐतिहासिक साक्ष्य


धर्मपाल जी के अलावा भी कई स्वतंत्र शोधकर्ताओं और ब्रिटिश अधिकारियों की रिपोर्टें इस बात की पुष्टि करती हैं कि भारत की साक्षरता और ज्ञान का ढांचा बहुत व्यापक था।
 १. पश्चिमी भारत के 'महाजनी स्कूल' (डॉ. चित्रा धड़फले का शोध)
पुणे के भांडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट की शोधकर्ता डॉ. चित्रा धड़फले ने बॉम्बे प्रेसीडेंसी (महाराष्ट्र और गुजरात) की पारंपरिक शिक्षा प्रणाली पर गहरा अध्ययन किया है। उनके शोध के अनुसार, इस क्षेत्र में औपनिवेशिक काल से पहले बड़ी संख्या में 'महाजनी स्कूल' या 'पांतोजी स्कूल' चलते थे। इन स्कूलों में व्यापार, व्यावहारिक गणित, बहीखाता (Accounting) और भाषा की शिक्षा दी जाती थी। इन स्कूलों को चलाने वाले और इनमें पढ़ने वाले 90% से अधिक छात्र वैश्य, मराठा, कुनबी और अन्य कृषक व शिल्पी जातियों के थे, जो यह साबित करता है कि देश के पश्चिमी हिस्से में भी शिक्षा का यही लोकतांत्रिक और व्यावहारिक ढांचा काम कर रहा था।
### २. शिल्प और तकनीकी शिक्षा की स्वायत्तता (लशिंगटन की रिपोर्ट, 1811)
लंदन आर्काइव्स में सुरक्षित ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारी जे. डब्ल्यू. लशिंगटन की उत्तर भारत (उत्तर प्रदेश और बिहार) से जुड़ी रिपोर्ट बताती है कि भारत के गाँवों में साक्षरता का स्तर केवल धार्मिक नहीं, बल्कि तकनीकी और व्यावहारिक था। बढ़ई (सूत्रधार), लोहार, कुम्हार और सोनार जैसी जातियाँ अपनी संहिताओं, मापन प्रणालियों और शिल्प-शास्त्रों को बाकायदा लिखित और मौखिक दोनों माध्यमों से अपनी पीढ़ियों को सिखाती थीं। ज्ञान का यह रूप पारंपरिक 'अकादमियों' से बाहर समाज की कार्यशालाओं में फल-फूल रहा था।

वैचारिक विश्लेषण: 'अक्षर-ज्ञान' बनाम 'विद्या' (डॉ. आनंद कुमारस्वामी का दृष्टिकोण)

इस पूरे विवाद की जड़ में एक बहुत बड़ी बौद्धिक भूल है। महान कला-इतिहासकार और विचारक डॉ. आनंद कुमारस्वामी ने अपनी पुस्तक *'The Indian Craftsman'* में इस ओर ध्यान आकर्षित किया है। हम आधुनिक लोग यूरोपीय और मैकालेवादी चश्मे से देखने के कारण केवल यूरोपीय ढंग के 'अक्षर-ज्ञान' (Formal Literacy) को ही शिक्षा मान बैठते हैं, जबकि भारत में 'विद्या' (Knowledge and Skill) को शिक्षा माना जाता था।
भारत का शिल्पी, मूर्तिकार, धातु-विज्ञानी या बुनकर भले ही मैकाले की परिभाषा में 'अक्षर-ज्ञाती' न रहा हो, लेकिन वह रेखागणित, रसायन विज्ञान (रंगों और धातुओं का मिश्रण), भौतिकी और वास्तुकला का प्रकांड विद्वान होता था। यह ज्ञान हवा में नहीं था, इसकी अपनी पोथियाँ, नियम और गुरु-शिष्य परंपराएँ थीं।

 वैश्विक अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा प्रमाण

हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि अंग्रेजों के आने से पहले भारत दुनिया के कुल सकल घरेलू उत्पाद (Global GDP) में लगभग 25% से अधिक का योगदान देता था। यह एक आर्थिक और ऐतिहासिक तथ्य है। क्या कोई भी विवेकशील व्यक्ति यह कल्पना कर सकता है कि जिस देश का नब्बे प्रतिशत समाज पूरी तरह अनपढ़, अज्ञानी और अक्षम हो, वह देश सदियों तक दुनिया का सबसे बड़ा औद्योगिक और व्यापारिक केंद्र बना रहे?
जहाज़रानी (Shipbuilding), धातु विज्ञान (Metallurgy—जैसे दिल्ली का लौह स्तंभ या दमिश्क की तलवारों के लिए जाने वाला भारतीय वुट्ज स्टील) और वस्त्र उद्योग (Textile) जैसी उच्च तकनीकी विधाएँ समाज के उन्हीं वर्गों के हाथों में थीं, जिन्हें आज हम पिछड़ा या शूद्र कहते हैं। भारतीय मानवविज्ञान सर्वेक्षण (AnSI) के पूर्व महानिदेशक प्रो. के. एस. सिंह का 'पीपुल ऑफ इंडिया' प्रोजेक्ट भी इस बात को रेखांकित करता है कि भारत की अधिकांश जातियों के पास अपने विशिष्ट पारंपरिक ज्ञान की समृद्ध धरोहर रही है। बिना एक सुदृढ़ और स्वतंत्र शैक्षिक व्यवस्था के इतनी बड़ी वैश्विक औद्योगिक शक्ति बने रहना नामुमकिन था।

 नैरेटिव का सच और मैकाले का प्रभाव
इन तमाम ऐतिहासिक तथ्यों, समाजशास्त्रीय शोधों और स्वयं ब्रिटिश काल के सरकारी आंकड़ों के आलोक में यह पूरी तरह साफ हो जाता है कि भारत की पारंपरिक शिक्षा व्यवस्था 'एक्सक्लूसिव' (किसी एक जाति के लिए आरक्षित) नहीं, बल्कि 'इन्क्लूसिव' (सर्वसमावेशी) और समुदाय आधारित थी। ज्ञान का प्रसार विकेंद्रीकृत था, जहाँ हर समाज अपनी जरूरत, जीविका और हुनर के हिसाब से पढ़ता-लिखता और सिखाता था।
यह कहना कि तीन हज़ार साल तक यहाँ शिक्षा पर "सौ प्रतिशत आरक्षण" था, न केवल इतिहास की गंभीर अज्ञानता है, बल्कि उन लाखों गैर-ब्राह्मण मनीषियों, शिल्पी-वैज्ञानिकों, राजाओं, संतों और आम छात्रों के पुरुषार्थ का अपमान भी है जिन्होंने सदियों से भारत की ज्ञान परंपरा को अपने पसीने और मेधा से सींचा।
वास्तव में, भारत की यह जीवंत, मुफ़्त और सर्वसमावेशी शिक्षा व्यवस्था (जिसे थॉमस मुनरो ने 'द ब्यूटीफुल ट्री' यानी एक सुंदर वृक्ष कहा था) तब नष्ट हुई जब ईस्ट इंडिया कंपनी और मैकाले ने हमारी इस स्वदेशी प्रणाली को गैर-कानूनी और गैर-वैज्ञानिक घोषित करके अपनी औपनिवेशिक शिक्षा पद्धति थोप दी। इस नई पद्धति ने शिक्षा को राज्य के नियंत्रण में लाकर इतना महंगा और सीमित कर दिया कि वह सचमुच चंद रईसों की बपौती बनकर रह गई। अतः, आज जिस ऐतिहासिक अन्याय का रोना रोया जाता है, उसकी जड़ें हमारी प्राचीन परंपरा में नहीं, बल्कि मैकाले की औपनिवेशिक नीति में हैं। आरोप लगाने से पहले हमें नैरेटिव की राजनीति से बाहर निकलकर अपने ही इतिहास के इन धूल धूसरित पन्नों को एक बार गौर से ज़रूर पलट लेना चाहिए।

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