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कोविड महामारी और बच्चो की पढ़ाई

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यह सर्वकालिक सत्य है कि बड़ी कक्षाओं के छात्रो को स्व अध्ययन करने की ओर प्रवृत्त करना चाहिए जिससे कि वे स्वयं अध्ययन कर तथ्यों को समझ सके।। जो छात्र स्व अध्ययन करने के अभ्यस्त हो जाते हैं वे जीवन भर हर अध्ययन कक्षा में श्रेष्ठ परिणाम देते ही हैं। इसके लिए शिक्षक और अभिभावक छात्रों को प्रेरित करने के साथ ही साथ इसका अभ्यास भी करवाएं यह ज़रूरी है, तभी वे अध्ययन कर पाएंगे। कोविड-19 महामारी काल में प्रत्यक्ष कक्षा शिक्षण बाधित हुआ है। कक्षाओं में एक साथ लंबे समय तक अधिक संख्या में छात्रों को बुलाकर शिक्षण करवाया जाना कब प्रारंभ हो सकेगा ऐसा स्पष्ट कहा नहीं जा सकता। ऐसे में शिक्षकों के बिना अध्ययन कराया जाना बाधित ही होगा। शिक्षा विभाग के अधिकारी, शिक्षाविद और अभिभावक इस दिशा में चिंतित भी है और विकल्प की तलाश में बही है। छात्रों को घर बैठे ही शिक्षण अधिगम प्रक्रिया से जोड़े रखने के लिए आनन-फानन में जो निर्णय लिया गया था, वह था ऑनलाइन शिक्षण का। पिछले एक-दो माह में इस विकल्प को उपयोग में लेते हुए हम सब ने इसकी खूबियों को भी जाना तो इसकी सीमाओं की भी जानकारी हुई। ऑनलाइन शिक्षण के साइड इफेक्ट ...

भारत क्यों 800 वर्षों तक गुलाम रहा?

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 भारत क्यों 800 वर्ष गुलाम रहा? इसका उत्तर, जम्मू कश्मीर के पूर्व CM फारूक अब्दुल्ला के हालिया वक्तव्य में मिल जाता है।  एक टीवी चैनल द्वारा पूछे चीन संबंधी सवाल पर अब्दुल्ला कहते हैं, 'अल्लाह करे कि उनके जोर से हमारे लोगों को मदद मिले और अनुच्छेद 370-35ए बहाल हो।' फारूक का यह वक्तव्य ऐसे समय पर आया है, जब सीमा पर भारत-चीन युद्ध के मुहाने पर खड़े हैं।  यह न तो कोई पहली घटना है और न ही फारूक ऐसा विचार रखने वाले पहले व्यक्ति। वास्तव में, फारूक उन भारतीयों में से एक हैं, जो 'बौद्धिक दासता' रूपी रोग से ग्रस्त हैं। यह पहली बार नहीं है, जब 'व्यक्तिगत हिसाब', 'महत्वाकांक्षा' और 'मजहबी जुनून' पूरा करने और सत्ता पाने की उत्कंठा में कोई जन्म से 'भारतीय'देश के प्रति अपनी संदिग्ध निष्ठा के साथ या विदेशी शक्तियों के हिमायती के रूप में सामने आया हो। क्या मीर जाफर ने बंगाल का नवाब बनने की लालसा में प्लासी के युद्ध में अंग्रेजों की मदद नहीं की? क्या यह सत्य नहीं कि जयचंद, पृथ्वीराज चौहान से निजी रंजिश के कारण विदेशी इस्लामी आक्रांता मोहम्मद गौरी से जा मि...

राष्ट्रीय शिक्षा नीति और हमारी ज्ञान विरासत-1

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वासुदेव प्रजापति आदिकाल से अखिल विश्व को देती जीवन यही धरा, गौरवशाली परम्परा। सघन ध्यान एकाग्र ज्योति से, किये गहनतम अनुसन्धान। कला शिल्प संगीत रसायन, गणित अणु आयुर्विज्ञान। सभी विधायें आलोकित कर, महिमा मय भूलोक वरा।। गौरवशाली परम्परा।। हमारे देश की ज्ञान परम्परा अति प्राचीन एवं गौरवशाली रही है। पश्चिमी जगत को जब पहली बार भारतीय ज्ञान तथा साहित्य की एक झलक मात्र मिली तो वह विस्मय-चकित हो गया। सन 1789 में विलियम जोन्स ने जब कालिदास रचित अभिज्ञान शाकुन्तलम् व पंडित नारायण लिखित हितोपदेश पढ़ा तो उसका मन मयूर नाँच उठा। उसने उसी समय दोनों रचनाओं का अनुवाद कर लिया। सन 1794 में मनु के धर्मशास्त्र का परिचय मिला तो उसका भी लैटिन में अनुवाद कर लिया गया। सन 1801 में अन्तकुवेतिल दुपरोन ने दारा शिकोह कृत उपनिषदों के फारसी अनुवाद का लैटिन में ओपनेखत (उपनिषद्) नाम से अनुवाद कर लिया। उपनिषदों के अनुवाद को पढने के प्रसिद्ध जर्मन विद्वान शोपन हॉवर ने कहा – “उपनिषद् सर्वोच्च मानव बुद्धि की उपज है। यह मेरे जीवन के लिए शान्ति का आश्वासन रहा है और मेरी मृत्यु के बाद तक बना रहेगा।” सन 1805 में हेनरी कोलब्रुक...

राष्ट्रीय शिक्षा नीति और हमारी ज्ञान विरासत- 2

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वासुदेव प्रजापति भारतीय शिक्षा भारतीय समाज की सुव्यवस्था का श्रेय सनातन शिक्षा व्यवस्था को है। डा. ए एस अल्तेकर के अनुसार उपनिषत्काल में भारत में साक्षरता ८० प्रतिशत थी। तक्षशिला, नालन्दा, वल्लभी, विक्रमशिला, ओदन्तपुरी, मिथिला, नदिया और काशी जैसे विश्वविद्यालयों की ख्याति सम्पूर्ण विश्व में फैली हुई थी। भारतीय शिक्षा का उद्देश्य मानव व्यक्तित्व का उच्चतम विकास था। भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों ही क्षेत्रों में भारतीय विद्या-केन्द्रों ने ऐसा ज्ञान आविष्कृत किया, जिसके ऋणी आज विश्व के दार्शनिक एवं वैज्ञानिक दोनों ही हैं। भारतीय संस्कृति अपनी श्रेष्ठ संस्कृति एवं शिक्षा के बल पर ही भारत विश्वगुरु के पद पर प्रतिष्ठित हुआ। सम्पूर्ण विश्व में भारतीय संस्कृति की विजय पताका फहराई। प्रज्ञाचक्षु पू.गुलाबराव महाराज ने अपने अन्वेषण के आधार पर स्पष्ट कहा कि “प्राचीन काल में पूरे विश्व में एक ही विश्व व्यापिनी संस्कृति विद्यमान थी – वह थी वैदिक संस्कृति।” विश्व के अनेक देशों में यथा – अमेरिका, मेक्सिको, पेरू, यूरोप, चीन, जापान, इण्डोनेशिया, जावा, सुमात्रा आदि में आज भी हिन्दू संस्कृति के अवशेष दिखाई दे...

राष्ट्र मंदिर के पुजारी सोहन सिंह

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"18 अक्तूबर/जन्म-दिवस" आरएसएस प्रचारक संघ कार्य के लिए जीवन समर्पित करने वाले वरिष्ठ प्रचारक श्री सोहन सिंह जी का जन्म 18 अक्तूबर, 1923 (आश्विन शुक्ल 9, वि.सं. 1980) को ग्राम हर्चना (जिला बुलंदशहर, उ.प्र.) में चैधरी रामसिंह जी के घर में हुआ था। छह भाई-बहिनों में वे सबसे छोटे थे। 16 वर्ष की अवस्था में वे स्वयंसेवक बने। 1942 में बी.एस-सी. करते ही उनका चयन भारतीय वायुसेना में हो गया; पर उन्होंने नौकरी की बजाय प्रचारक कार्य को स्वीकार किया। 1942 में ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ की विफलता से युवक बहुत उद्विग्न थे। उन दिनों सरसंघचालक श्री गुरुजी युवकों को देश के लिए समय देने का आग्रह कर रहे थे। उनकी प्रेरणा से दिल्ली के 80 युवक प्रचारक बने। उनमें सोहन सिंह जी भी थे। इससे पूर्व वे दिल्ली में सायं शाखाओं के मंडल कार्यवाह थे। 1943, 44 और 45 में उन्होंने तीनों संघ शिक्षा वर्ग पूरे किये। प्रचारक बनने पर उन पर क्रमशः करनाल, रोहतक, झज्जर और अम्बाला में तहसील; करनाल जिला, हरियाणा संभाग और दिल्ली महानगर का काम रहा। 1973 में उन्हें जयपुर विभाग का काम देकर राजस्थान भेजा गया। आपातकाल में वे वहीं गिरफ्...

""ओ मेरे कुम्हार""

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वाह रे मेरे कुम्हार ढूढता रहा तुझे उम्र भर तेरे हाथों की छुअन का एहसास होता रहा मुझे वाह तेरी कारीगरी जमाना सराहता रहा मुझे मुझे बनाया ऐसा कि तृप्त करता रहा सूखे गलों को तर करता रहा दिलोदिमाग फिर से जब दुनिया कर देगी मिट्टी मुझे तू फिर से संभालेगा कंकड़ों से छानेगा फिर से नया रूप देगा और घड़े को बना देगा"सागर"। "सागर"महेंद्र थानवी। यह भी पढ़ें👇👇 अभी तो चलना है मीलों

भगवान वाल्मीकि कौन थे?

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 महर्षि वाल्मीकि का जीवन परिचय! बंदउँ मुनि पद कंजु रामायन जेहिं निरमयउ। सखर सुकोमल मंजु दोष रहित दूषन सहित॥  भावार्थ:-मैं उन वाल्मीकि मुनि के चरण कमलों की वंदना करता हूँ, जिन्होंने रामायण की रचना की है, जो खर (राक्षस) सहित होने पर भी (खर (कठोर) से विपरीत) बड़ी कोमल और सुंदर है तथा जो दूषण (राक्षस) सहित होने पर भी दूषण अर्थात्‌ दोष से रहित है॥ वाल्मीकि जी प्राचीन भारतीय महर्षि हैं। ये आदिकवि के रुप में प्रसिद्ध हैं। उन्होने संस्कृत मे रामायण की रचना की। उनके द्वारा रची रामायण वाल्मीकि जी रामायण कहलाई। रामायण एक महाकाव्य हैं। जो कि श्रीराम के जीवन के माध्यम से हमें जीवन के सत्य से, कर्तव्य से, परिचित करवाता हैं। महर्षि वाल्मीकि जी को प्राचीन वैदिक काल के महान ऋषियों कि श्रेणी में प्रमुख स्थान प्राप्त हैं। वह संस्कृत भाषा के आदि कवि तथा आदि काव्य ‘रामायण’ के रचयिता के रूप में प्रसिद्ध हैं। भगवान वाल्मीकि जी के पिता का नाम वरुण तथा मां का नाम चार्षणी था। वह अपने माता-पिता के दसवें पुत्र थे। उनके भाई ज्योतिषाचार्य भृगु ऋषि थे। महर्षि कश्यप तथा अदिति के नौवीं संतान थे पिता वरुण। वरुण का एक न...

रतन टाटा के नाम खुला_खत

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आदरणीय रतन टाटा जी, सादर नमस्ते, आपको स्मरण कराना आवश्यक है कि अरब से होने वाले आक्रमणों से हुए बर्बर रक्तपात से संतप्त आपके पूर्वज यानि कुछ मुट्ठी भर  पारसी  जन जब अपनी जीवन रक्षा हेतु समुद्र के रास्ते भारत आये थे तब उनके पास अपनी नाव में पवित्र अग्नि और पवित्र जेंदावेस्ता बस ये दो चीजें ही थी। अपनी इन धरोहरों के साथ आपके पूर्वज पहले खम्भात की खाड़ी में भारत के दीव नामक टापू में उतरे थे फिर सन् 716 ई. के लगभग दमन के दक्षिण दिशा में लगभग 25 मील की दूरी पर अवस्थित एक हिन्दू राजा राजा #यादव_राणा के राज्य क्षे‍त्र में बसने गये। उस हिन्दू राजा ने न केवल आपके पूर्वजों को अपने राज्य में शरण दी बल्कि उनके अग्नि मंदिर की स्थापना के लिए भूमि और कई अन्य प्रकार की सहायता भी की और वहां सन् 721 ई. में प्रथम  पारसी अग्नि मंदिर  बना। रोचक बात ये है कि इस मंदिर के बनने की अनुमति के साथ आपके पूर्वजों ने यह शर्त भी रखी थी कि हमारे मन्दिर के कुछ इतने किलोमीटर की परिधि में कोई गैर-पारसी दाखिल न हो सके; क्योंकि उनके दाखिल होने से हम उसे अपवित्र समझेंगे। उस हिन्दू राजा ने उस शर्त को सुना और फिर उसे मानते ह...

आतंकवादी का बेटा बना कश्मीर में प्रशासनिक अधिकारी, सेना से सम्मानित किया

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कश्मीर प्रशासनिक सेवा (केएएस) में 46वीं रैंक हासिल करने वाले गाजी अब्दुल्ला को 10 राष्ट्रीय राइफल्स ने डोडा में सम्मानित किया है। दरअसल गाजी अब्दुल्ला के पिता मोहम्मद अब्दुल्ला एक आतंकवादी थे और वह हिज्बुल मुजाहिदीन आतंकवादी संगठन से जुड़े हुये थे। जब गाजी अब्दुल्ला छोटे थे, तभी सेना ने एक एनकाउंटर के दौरान उनके आतंकी पिता को ढेर किया था। गाजी अब्दुल्ला गुंडना के पिछड़े इलाके से आते हैं। उन्होंने श्रीनगर के एक अनाथालय में रहते हुये कठिन हालात में पढ़ाई की और गरीबी, आतंकवाद, संसाधनों की कमी से लड़ते हुये प्रशासनिक सेवा में पद हासिल किया है। पढ़िए 👇 लेखक कैसे बनें? सेना ने सम्मान कार्यक्रम में उन सभी छात्रों को बुलाया था, जो भविष्य में प्रशासनिक अधिकारी बनना चाहते हैं। सभी छात्रों के लिए यह कार्यक्रम प्रेरक और फलदायी साबित हुआ है। कार्यक्रम के दौरान गाजी अब्दुल्ला ने युवाओं के साथ एक गरीब बच्चे से एक सफल अधिकारी बनने तक के अपने सफर के कहानी को साझा किया और उन्हें जीवन में सफल होने के लिए प्रेरित किया। समारोह के दौरान छात्रों ने कामयाबी का मंत्र पूछा तो गाजी अब्दुल्ला ने कहा कि मेहनत औ...

भगिनी निवेदिता सेवा की प्रतिमूर्ति

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मार्गरेट नोबेल 28 जनवरी,1898 को अपना परिवार, देश, नाम, यश छोड़ कर भारत आई थीं। यहां आने के बाद 25 मार्च, 1898 को स्वामी विवेकानंद उनको ब्रह्मचर्य की दीक्षा दी और निवेदिता नाम भी । 13 अक्टूबर 1911 को 44 साल की उम्र में उन्होंने दार्जीलिंग में अंतिम सांस ली। अपने नाम निवेदिता के अनुरूप ही उन्होंने अपना पूरा जीवन भारतीयों की सेवा में समर्पित कर दिया।  त्याग, सेवा और समर्पण शब्दों की परिभाषा भगिनी निवेदिता के जीवन से उधारणतः स्पष्ट हो जाती है जब आयरलैंड में जन्मी और इंग्लैंड के लंदन शहर में मात्र 17 वर्ष की उम्र में शिक्षिका बनने वाली, लंदन की बौद्धिक मंडली "सीसेमक्लब" में अपने लेखों और व्याख्यानों से स्वयं को प्रतिष्ठित करने वाली, इंग्लैंड के विम्बलडन शहर में अपना विद्यालय शुरू करने वाली 'मार्गरेट एलिजाबेथ नोबल' अपना सब कुछ त्याग कर स्वामी विवेकानंद के आह्वान पर उस समय के गुलाम देश भारत में महिलाओं की शिक्षा और स्वास्थ के क्षेत्र में काम करने आती हैं। 1899 में जब बंगाल में प्लेग महामारी फैलती है तो सड़कों पर उतर कर नालियां और कूड़ा भी साफ़ करती हैं और जन साधारण को जागरू...

बॉलीवुड में मची खलबली

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70 साल के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है जब पूरा बॉलीवुड एकजुट होकर सामने आया है... कल पूरे बॉलीवुड की तरफ से सुप्रीम_कोर्ट में 2 मीडिया चैनलों के खिलाफ शिकायत डाली गई... शिकायत डालने वालों में ना सिर्फ खान गैंग शामिल था... बल्कि उनके साथ अजय देवगन...अक्षय कुमार जैसे तथाकथित राष्ट्रवादी हीरो भी हैं... और वो 2 मीडिया चैनल हैं...  रिपब्लिक  और  TimesNow   शिकायत ये है कि ये दोनों चैनल बॉलीवुड की छवि को खराब कर रहे हैं... ....बॉलीवुड क्यों एकजुट हुए? सांप और नेवलों को एक ही मंच पर क्यों आना पड़ा? जो एक दूसरे की शक्ल से भी नफरत करते हैं, वो एकजुट क्यों हुए?  वजह है डर...खौफ...जो हाल सड़क2 का हुआ, जो हाल KBC का हुआ जो हाल टीपू_सुल्तान का हुआ जो हाल BigBoss का हुआ वो किसी के साथ भी हो सकता है। किसी की भी फ़िल्म के साथ हो सकता है।  क्योंकि जनता के सामने हर रोज़ बॉलीवुड की एक नई गन्दगी का खुलासा हो रहा है और जनता अब किसी को भी माफ करने के मूड में नहीं है। चाहे वो सदी के महानायक हों, चाहे किंग खान हो, चाहे भाईजान हों, चाहे खिलाड़ी कुमार हों। पब्लिक की नज़र में अब पूरा बॉलीवुड नंगा हो चुका है और इनको ...

कोरोनामुक्त भारत के लिए राष्ट्रव्यापी जन-आंदोलन समय की माँग

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जीवन की सुंदरता विपरीत परिस्थिति में भी गतिशीलता में है- जीवन की सबसे बड़ी सुंदरता ही यह है कि वह प्रतिकूल-से-प्रतिकूल परिस्थितियों में भी निरंतर गतिशील रहता है। अपितु यह कहना चाहिए कि गति ही जीवन है, जड़ता व ठहराव ही मृत्यु है। विनाश और विध्वंस के मध्य भी सृजन और निर्माण कभी थमता नहीं। संपूर्ण चराचर सृजनधर्मा है। मनुष्य की तो प्रधान विशेषता ही उसकी संवेदनशीलता एवं सृजनधर्मिता है।  यों तो भारतीय जीवन-दृष्टि प्रकृति के साथ सहयोग, सामंजस्य एवं साहचर्य का भाव रखती आई है। परन्तु यह भी सत्य है कि मनुष्य की अजेय जिजीविषा एवं सर्वव्यापक कालाग्नि के बीच सतत संघर्ष छिड़ा रहता है। जीर्ण और दुर्बल झड़ जाते हैं, परंतु वे सभी टिके, डटे और बचे रहते हैं जिनकी चेतना उर्ध्वगामी है, जिनकी प्राणशक्ति मज़बूत है, जो अपने भीतर से ही जीवन-रस खींचकर स्वयं को हर हाल में मज़बूत और सकारात्मक बनाए रखते हैं। यह भी पढ़ें कोर्पिरेट जगत में जाग्रत होता राष्ट्रभाव कोरोना काल योद्धाओं का साक्षी यह कोविड-काल ऐसे ही योद्धाओं का साक्षी रहा है। इस कोविड काल में ऐसे तमाम योद्धा समय के सारथि रहे। उन्होंने अपना सलीब अपने ही कंधों पर...