संविधान की हत्या के पचास वर्ष-3 भारत बना एक जेलखाना
संविधान की हत्या के पचास वर्ष / 3 भारत बना एक जेलखाना – वह सुबह जब आज़ादी थम गई ✍️ "26 जून 1975 की सुबह कुछ अजीब थी..." देश की फिज़ा कुछ बदल गई थी। रात में चुपचाप कुछ ऐसा हो गया था जिससे सूरज जरूर निकला, लेकिन आज़ादी की रौशनी जैसे कहीं गुम हो गई थी। देश स्वतंत्र था, लेकिन उस सुबह के साथ ही आत्मा फिर से गुलाम बन गई थी – और गुलामी भी ऐसी कि खुद अपनी सरकार ने हथकड़ी पहनाई थी। दिल्ली के 'मदरलैंड' अख़बार के दफ़्तर में जैसे ही प्रिंटिंग प्रेस घनघनाई, पुलिस ने धड़धड़ाकर दरवाज़ा तोड़ा और मशीन को बंद करा दिया। 'ट्रिब्यून' और 'स्वदेश' जैसे अख़बारों की बिजली ही काट दी गई। 'के.आर. मलकानी' को रातोंरात उठा लिया गया। अख़बार स्याही से नहीं, सन्नाटे से छपने लगे। भाग 1 यहां पढ़ें देश के हर कोने में ख़बरें थीं – लेकिन वो छप नहीं सकती थीं। 'प्रेस सेंसरशिप' का ऐलान हो चुका था। अब कोई भी पंक्ति सरकारी इजाज़त के बिना नहीं छप सकती थी। यह उस अभिव्यक्ति की हत्या थी जिसे कभी बाबासाहेब अंबेडकर ने भारतीय लोकतंत्र की आत्मा कहा था। डर सिर्फ अख़बा...