1977 : जब मतपेटी ने तानाशाही को पराजित किया और लोकतंत्र ने नई साँस ली

 

1977 : जब मतपेटी ने तानाशाही को पराजित किया और लोकतंत्र ने नई साँस ली

लोकतंत्र पर ग्रहण — आपातकाल की अनकही गाथा (भाग–9)

पिछले आठ अंकों में हमने उस अंधकारमय कालखंड की यात्रा की, जब संविधान की आत्मा पर आघात हुआ, नागरिक स्वतंत्रताएँ सीमित कर दी गईं, समाचार-पत्रों की वाणी पर ताले जड़ दिए गए, हजारों लोकतंत्र सेनानी कारागारों में डाल दिए गए और राष्ट्रव्यापी प्रतिरोध ने भूमिगत होकर भी अपना प्रवाह बनाए रखा।

अब इतिहास उस मोड़ पर आ पहुँचा था, जहाँ निर्णय किसी न्यायालय, किसी कारागार, किसी मंत्री अथवा किसी प्रशासनिक अधिकारी को नहीं करना था।

अब निर्णय भारत की जनता को करना था।

इक्कीस महीनों तक मौन रहने को विवश किया गया समाज अब मतपेटी के सामने खड़ा था।

और इतिहास साक्षी है—

जब जनता बोलती है, तब सबसे शक्तिशाली सत्ता भी मौन हो जाती है।


चुनाव की घोषणा : आत्मविश्वास या राजनीतिक भ्रम?

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18 जनवरी 1977 को देश को अप्रत्याशित सूचना मिली।

लोकसभा चुनाव की घोषणा कर दी गई।

इक्कीस महीने तक असाधारण अधिकारों का उपयोग करने वाली सरकार अब जनता के बीच जाने को तैयार थी।

शासन को विश्वास था कि प्रशासनिक नियंत्रण, विपक्ष की कमजोरी और सरकारी प्रचार उसके पक्ष में वातावरण निर्मित कर चुके हैं।

किन्तु सत्ता ने एक भूल कर दी।

उसने सरकारी रिपोर्टें पढ़ीं...

परंतु जनता का मौन नहीं पढ़ा।


कारागारों के द्वार खुले... लोकतंत्र सेनानी फिर जनता के बीच पहुँचे

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धीरे-धीरे बंदी नेताओं की रिहाई प्रारम्भ हुई।

जेलों से बाहर निकलने वाले नेताओं के सामने एक कठिन कार्य था—

इक्कीस महीनों के मौन को कुछ ही सप्ताहों में जनमत में परिवर्तित करना।

लोकनायक जयप्रकाश नारायण स्वास्थ्य की दृष्टि से अत्यंत दुर्बल थे, परंतु उनकी नैतिक शक्ति करोड़ों भारतीयों के लिए प्रेरणा बनी रही।

देशभर में वे लोकतंत्र की पुनर्स्थापना का संदेश देने लगे।

भूमिगत कार्यकर्ता अब खुले रूप से सक्रिय होने लगे।


वर्षों की तपस्या चुनाव अभियान में बदल गई

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आपातकाल के दौरान जो संपर्क तंत्र भूमिगत रूप से सक्रिय था, वही अब लोकतांत्रिक अभियान का आधार बन गया।

गाँव-गाँव जाकर लोगों को मतदान का महत्व समझाया गया।

लोक संघर्ष समिति से जुड़े अनेक कार्यकर्ता लोकतांत्रिक परिवर्तन के अभियान में जुट गए।

यह केवल चुनाव प्रचार नहीं था।

यह नागरिक अधिकारों की पुनर्स्मृति का अभियान था।

जनता से कहा जा रहा था—

अब निर्णय आपका है।


मतपेटी ने वह निर्णय दिया जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी

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मार्च 1977।

मतगणना प्रारम्भ हुई।

परिणाम आते गए।

और धीरे-धीरे स्पष्ट होने लगा कि भारतीय लोकतंत्र ने अपना निर्णय सुना दिया है।

उत्तरी भारत में कांग्रेस को अभूतपूर्व पराजय का सामना करना पड़ा।

स्वयं प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और संजय गांधी भी चुनाव हार गए।

जनता पार्टी को बहुमत प्राप्त हुआ।

यह केवल सरकार का परिवर्तन नहीं था।

यह लोकतंत्र की आत्मशक्ति का उद्घोष था।


विश्व ने भारत से क्या सीखा?

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विश्व के अनेक देशों ने भारत के इस लोकतांत्रिक परिवर्तन को आश्चर्य से देखा।

अनेक राष्ट्रों में तानाशाही चुनावों को नियंत्रित कर लेती है।

किन्तु भारत में वही मतदाता, जिसके अधिकार सीमित कर दिए गए थे, शांतिपूर्ण ढंग से मतदान करता है और सत्ता परिवर्तन कर देता है।

यह भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता का प्रमाण था।


विजय किसी दल की नहीं, लोकतांत्रिक चेतना की थी

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1977 का जनादेश किसी एक दल की विजय भर नहीं था।

यह उस सिद्धांत की विजय थी कि—

सत्ता जनता से बड़ी नहीं हो सकती।

संविधान शासन का उपकरण नहीं, राष्ट्रजीवन का मार्गदर्शक है।

और नागरिक स्वतंत्रता किसी सरकार का अनुग्रह नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था का मूलाधार है।

यही कारण है कि 1977 का चुनाव केवल राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का एक स्वर्णिम अध्याय माना जाता है।


उपसंहार : इतिहास समाप्त नहीं होता, वह चेतावनी छोड़ जाता है

आपातकाल समाप्त हो गया।

बंदी मुक्त हो गए।

प्रतिबंध हट गए।

समाचार-पत्रों ने फिर लिखना प्रारम्भ किया।

लोकसभा पुनः जनादेश से बनी।

किन्तु क्या केवल इतना पर्याप्त है?

क्या लोकतंत्र केवल चुनावों से सुरक्षित रह सकता है?

क्या संविधान की रक्षा केवल न्यायालय करेंगे?

या फिर प्रत्येक जागरूक नागरिक को लोकतंत्र का प्रहरी बनना होगा?

कल पढ़िए इस श्रृंखला का अंतिम और सबसे महत्त्वपूर्ण अंक—

"आपातकाल की सबसे बड़ी सीख : लोकतंत्र की रक्षा संविधान से नहीं, सजग समाज से होती है"

यह केवल इतिहास का निष्कर्ष नहीं होगा।

यह भारत के भविष्य के लिए एक राष्ट्रीय संदेश होगा।

(समापन अंक शेष...)

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