स्वदेशी अस्त्र: राष्ट्रचेतना, सामर्थ्य और आत्मनिर्भरता का पुनर्जागरण
स्वदेशी अस्त्र: राष्ट्रचेतना, सामर्थ्य और आत्मनिर्भरता का पुनर्जागरण
✍️ मनमोहन पुरोहित ‘मनु महाराज’
इतिहास साक्षी है कि जिन राष्ट्रों ने अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी दूसरों पर छोड़ी, उनका अस्तित्व अंततः संकट में पड़ गया। पराधीनता केवल राजनीतिक नहीं होती, वह मानसिक और सामरिक भी होती है। भारत ने इस सत्य को भोगा भी है और समझा भी है। इसलिए आज जब हम स्वदेशी अस्त्र-शस्त्रों की चर्चा करते हैं, तो यह केवल तकनीकी प्रगति का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रचेतना के पुनर्जागरण का संकेत है।
भारतीय चिंतन में “शक्ति” और “शांति” को विरोधी नहीं, पूरक माना गया है। हमारे शास्त्रों में कहा गया है—“शस्त्र और शास्त्र, दोनों का संतुलन ही धर्म की स्थापना करता है।” यदि शास्त्र ज्ञान का प्रतीक हैं, तो शस्त्र उसकी रक्षा का माध्यम हैं। बिना शक्ति के शांति केवल एक आदर्श बनकर रह जाती है, जिसकी रक्षा संभव नहीं होती।
लंबे समय तक भारत ने अपनी रक्षा आवश्यकताओं के लिए बाहरी शक्तियों पर निर्भरता बनाए रखी। इसका परिणाम यह हुआ कि हमारी रणनीतिक स्वतंत्रता सीमित हो गई। परंतु पिछले कुछ वर्षों में स्वदेशीकरण की जो प्रक्रिया प्रारंभ हुई है, उसने इस निर्भरता को चुनौती दी है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन, सार्वजनिक उपक्रमों और निजी क्षेत्र की सहभागिता ने एक नए आत्मविश्वास को जन्म दिया है।
ब्रह्मोस मिसाइल इस आत्मविश्वास का प्रतीक है। यह केवल एक तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्कि उस मानसिकता का परिवर्तन है जिसमें भारत अब प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि पहल करने की क्षमता रखता है। इसी प्रकार रुद्रम-II जैसी मिसाइलें आधुनिक युद्ध की आवश्यकताओं को समझते हुए विकसित की गई हैं, जो यह दर्शाती हैं कि भारत अब केवल वर्तमान नहीं, भविष्य के युद्ध की भी तैयारी कर रहा है।
वर्तमान वैश्विक परिदृश्य यह स्पष्ट करता है कि युद्ध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। सूचना, तकनीक और सटीक प्रहार अब युद्ध की निर्णायक शक्तियाँ बन चुकी हैं। ड्रोन तकनीक और स्वचालित प्रणालियाँ युद्ध को अधिक जटिल और व्यापक बना रही हैं। ऐसे समय में भारत का स्वदेशी तकनीकों की ओर बढ़ना केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता है।
यह भी महत्वपूर्ण है कि भारत ने आत्मनिर्भरता को केवल सरकारी प्रयासों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि निजी क्षेत्र को भी इस अभियान में सहभागी बनाया। इससे न केवल नवाचार को प्रोत्साहन मिला है, बल्कि एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा का वातावरण भी विकसित हुआ है। रक्षा निर्यात में वृद्धि इस बात का प्रमाण है कि भारत अब वैश्विक मंच पर एक जिम्मेदार और सक्षम भागीदार के रूप में उभर रहा है।
किन्तु इस समस्त प्रगति के पीछे जो मूल तत्व कार्य कर रहा है, वह है—राष्ट्र के प्रति आत्मविश्वास। जब कोई राष्ट्र अपनी शक्ति को पहचानता है, तभी वह आत्मनिर्भर बनता है। स्वदेशी अस्त्र-शस्त्र इसी आत्मविश्वास की अभिव्यक्ति हैं।
अंततः प्रश्न केवल यह नहीं है कि हमारे पास कितनी मिसाइलें या कितने ड्रोन हैं। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या हमारे भीतर वह संकल्प है, जो राष्ट्र की सुरक्षा और सम्मान के लिए आवश्यक है। यदि वह संकल्प जीवित है, तो साधन स्वयं निर्मित हो जाते हैं।
आज का भारत उसी संकल्प के साथ आगे बढ़ रहा है—जहाँ शांति उसकी प्रकृति है, परंतु शक्ति उसकी आवश्यकता। और जब यह दोनों एक साथ चलते हैं, तब ही एक सशक्त, सुरक्षित और आत्मनिर्भर राष्ट्र का निर्माण होता है।
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