कारागारों के भीतर का नरक : यातनाएँ, मौन और लोकतंत्र सेनानियों का अदम्य साहस
कारागारों के भीतर का नरक : यातनाएँ, मौन और लोकतंत्र सेनानियों का अदम्य साहस
लोकतंत्र पर ग्रहण — आपातकाल की अनकही गाथा (भाग–6)
पाँचवें भाग में हमने देखा कि सत्याग्रह की ज्वाला पूरे देश में फैल चुकी थी।
हजारों लोग स्वेच्छा से जेल जा रहे थे।
कारागार अब भय के नहीं, बल्कि संकल्प के प्रतीक बन चुके थे।
शासन के सामने एक विचित्र परिस्थिति उत्पन्न हो गई थी।
जितनी अधिक गिरफ्तारियाँ होतीं, उतना ही प्रतिरोध बढ़ता जाता।
तब सत्ता ने एक नया मार्ग चुना।
यदि विचारों को बंद नहीं किया जा सकता, तो विचार रखने वालों को तोड़ा जाए।
यहीं से आरम्भ होता है आपातकाल का वह अध्याय, जिसे पढ़ते समय इतिहास भी मौन हो जाता है।
कारागार अब केवल बंदीगृह नहीं, यातना-गृह बनते जा रहे थे
गिरफ्तारी देना एक बात थी।
किन्तु गिरफ्तारी के बाद जो कुछ हुआ, उसने अनेक परिवारों को जीवनभर के लिए बदल दिया।
दस्तावेज़ों के अनुसार अनेक लोकतंत्र सेनानियों को लगातार पूछताछ, मानसिक दबाव, शारीरिक प्रताड़ना और अमानवीय व्यवहार का सामना करना पड़ा।
उद्देश्य केवल सूचना प्राप्त करना नहीं था।
उद्देश्य था—
संगठन की रीढ़ तोड़ देना।
सत्ता जानना चाहती थी—
भूमिगत नेतृत्व कहाँ है?
साहित्य कौन छाप रहा है?
संपर्क-सूत्र कौन हैं?
किन्तु अधिकांश कार्यकर्ताओं के पास एक ही उत्तर था—
"जो जानता हूँ, वह राष्ट्रहित में नहीं बताऊँगा।"
इंदौर से असम तक... पीड़ा की अनेक कथाएँ
आपातकाल संबंधी अभिलेखों में इंदौर, उज्जैन, भोपाल, असम तथा देश के अनेक अन्य स्थानों की घटनाओं का उल्लेख मिलता है।
कहीं घंटों खड़ा रखा गया।
कहीं भोजन से वंचित किया गया।
कहीं लगातार पूछताछ हुई।
कहीं परिवार से मिलने तक की अनुमति नहीं दी गई।
इन विवरणों का उद्देश्य किसी प्रकार की सनसनी उत्पन्न करना नहीं, बल्कि यह समझना है कि लोकतंत्र की रक्षा केवल भाषणों से नहीं हुई।
उसके पीछे हजारों अनाम लोगों की व्यक्तिगत पीड़ा भी जुड़ी थी।
जब मौन भी प्रतिरोध बन गया
पूछताछ करने वालों को विश्वास था कि कुछ दिनों के दबाव के बाद सब कुछ ज्ञात हो जाएगा।
किन्तु कई कार्यकर्ताओं ने अपने साथियों, संपर्क सूत्रों और भूमिगत गतिविधियों की जानकारी प्रकट नहीं की।
यह मौन साधारण मौन नहीं था।
यह अनुशासन का मौन था।
यह विश्वास का मौन था।
और शायद यही कारण था कि भूमिगत आंदोलन चलता रहा।
इतिहास में अनेक बार शब्दों ने क्रांति की है।
परंतु कुछ अवसर ऐसे भी आते हैं जब मौन स्वयं क्रांति बन जाता है।
जेल की दीवारों के बाहर भी एक संघर्ष चल रहा था
कारागारों में बंद व्यक्ति अकेला नहीं होता।
उसके साथ पूरा परिवार परीक्षा से गुजरता है।
दस्तावेज़ बताते हैं कि अनेक स्वयंसेवक और सामाजिक कार्यकर्ता बंदियों के परिवारों तक सहायता पहुँचाने में लगे रहे।
किसी के घर राशन पहुँचा।
किसी बच्चे की पढ़ाई का प्रबंध हुआ।
किसी परिवार को आर्थिक सहायता मिली।
यही वह पक्ष है, जिसकी चर्चा इतिहास की पुस्तकों में कम मिलती है।
परंतु किसी भी जनांदोलन की वास्तविक शक्ति इसी सामाजिक संवेदना में निहित होती है।
क्या दमन से विचार समाप्त हो जाते हैं?
आपातकाल का अनुभव एक गहरा प्रश्न छोड़ जाता है।
क्या किसी विचारधारा को प्रतिबंधित करके समाप्त किया जा सकता है?
क्या जेलों में बंद कर देने से विश्वास समाप्त हो जाता है?
क्या भय स्थायी शासन का आधार बन सकता है?
इतिहास का उत्तर प्रायः "नहीं" में मिलता है।
क्योंकि विचारों की विजय शस्त्रों से नहीं, बल्कि समाज के विश्वास से होती है।
यही कारण था कि कारागारों के भीतर की पीड़ा भी लोकतंत्र की लौ को बुझा नहीं सकी।
लेकिन एक आरोप आज भी बार-बार दोहराया जाता है...
आपातकाल की चर्चा होते ही एक प्रश्न बार-बार उठाया जाता है—
क्या बालासाहब देवरस ने इंदिरा गांधी को पत्र लिखकर समझौते का प्रयास किया था?
यह प्रश्न दशकों से राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बना हुआ है।
किन्तु—
क्या वे पत्र वास्तव में आत्मसमर्पण थे?
या उनका संदर्भ कुछ और था?
क्या उनके केवल कुछ अंश उद्धृत किए गए?
या पूरा दस्तावेज़ पढ़ने पर चित्र बदल जाता है?
इसी प्रश्न का तथ्याधारित विश्लेषण हमारी इस श्रृंखला के अगले भाग का विषय होगा।
उपसंहार : इतिहास का सबसे विवादित पत्र
आपातकाल के इतिहास में यदि किसी एक दस्तावेज़ पर सबसे अधिक विवाद हुआ है, तो वह है सरसंघचालक बालासाहब देवरस द्वारा लिखे गए पत्र।
कुछ लोग उन्हें समझौते का प्रमाण बताते हैं।
कुछ उन्हें लोकतांत्रिक संवाद का प्रयास मानते हैं।
सत्य क्या है?
इतिहास को उद्धरणों से नहीं, संदर्भों से पढ़ा जाता है।
अगले भाग में पढ़िए—
"बालासाहब देवरस के पत्र : आत्मसमर्पण, रणनीति या लोकतांत्रिक संवाद? पूरा सच"
इस भाग में हम दस्तावेज़ों, संदर्भों और घटनाक्रम के आधार पर उन पत्रों की क्रमवार समीक्षा करेंगे, ताकि पाठक स्वयं निर्णय कर सके।
(क्रमशः...)
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