जब हजारों स्वयंसेवक भूमिगत हुए : लोकतंत्र बचाने की गुप्त लड़ाई

जब हजारों स्वयंसेवक भूमिगत हुए : लोकतंत्र बचाने की गुप्त लड़ाई

लोकतंत्र पर ग्रहण — आपातकाल की अनकही गाथा (भाग-3)

4 जुलाई 1975।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लग चुका था।

सरसंघचालक बंदी बनाए जा चुके थे।

हजारों कार्यकर्ता जेलों में थे।

कार्यालयों पर ताले लटक चुके थे।

समाचार-पत्रों पर सेंसरशिप का पहरा था।

रेडियो शासन के नियंत्रण में था।

और सत्ता प्रतिष्ठान को विश्वास था कि अब प्रतिरोध की अंतिम चिंगारी भी बुझ चुकी है।

किन्तु इतिहास का एक नियम है—

विचारों को कारागार में बंद किया जा सकता है, परंतु संकल्प को नहीं।

इसी अंधकार के बीच एक ऐसी अदृश्य लड़ाई प्रारंभ हुई, जिसे न दूरदर्शन दिखा रहा था, न समाचार-पत्र लिख सकते थे।

फिर भी वह चल रही थी।

और इतनी व्यापक थी कि कुछ वर्षों बाद विदेशी पत्रकार भी उसके संगठन कौशल का उल्लेख करने लगे।

लेकिन प्रश्न यह है कि जब सारे मार्ग बंद थे, तब यह संघर्ष चल कैसे रहा था?


प्रतिबंध के बाद भी क्यों नहीं टूटा संगठन?

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शासन की सबसे बड़ी अपेक्षा यही थी कि शीर्ष नेतृत्व की गिरफ्तारी के बाद संगठन स्वतः निष्क्रिय हो जाएगा।

क्योंकि अधिकांश राजनीतिक दलों का ढाँचा व्यक्तियों पर आधारित था।

नेता जेल में गया तो आंदोलन भी शिथिल पड़ गया।

किन्तु संघ का ढाँचा भिन्न था।

वहाँ किसी एक व्यक्ति के बंदी होने का अर्थ संगठन का अंत नहीं था।

एक कार्यकर्ता गिरता तो दूसरा आगे आ जाता।

एक संपर्क सूत्र टूटता तो दूसरा तैयार मिलता।

इसीलिए नानाजी देशमुख की गिरफ्तारी के बाद भी लोक संघर्ष समिति का कार्य अवरुद्ध नहीं हुआ।

सत्ता को यह समझ आने लगा था कि उसने जिस संगठन को प्रतिबंधित किया है, उसका वास्तविक बल भवनों और पदाधिकारियों में नहीं, बल्कि कार्यकर्ताओं के भीतर है।

और यहीं से प्रारंभ हुआ भूमिगत संघर्ष का नया अध्याय।


भूमिगत भारत : जहाँ संदेश हवा की तरह यात्रा करते थे

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आज मोबाइल हैं।

इंटरनेट है।

सोशल मीडिया है।

किन्तु 1975 का भारत इन सब साधनों से रहित था।

फिर भी देश के एक छोर से दूसरे छोर तक संदेश पहुँच रहे थे।

बैठकें हो रही थीं।

निर्देश पहुँच रहे थे।

साहित्य छप रहा था।

और हजारों कार्यकर्ता निरंतर सक्रिय थे।

माधवराव मुले, मोरोपंत पिंगले, रज्जू भैया, भाऊराव देवरस, बापूराव मोघे तथा अनेक वरिष्ठ कार्यकर्ताओं ने देशभर में भ्रमण कर नई संगठनात्मक रचना खड़ी की।

सरकारी अभिलेखों में भले ही मौन था, किन्तु भूमिगत भारत में संवाद जीवित था।


वह साहित्य जिसे पढ़ना भी अपराध बन गया था

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आपातकाल के समय सत्य बोलना जोखिमपूर्ण था।

और उसे छापना उससे भी अधिक।

किन्तु साहित्य निर्माण और वितरण का कार्य निरंतर चलता रहा।

दिल्ली में भानुप्रताप शुक्ल और वेदप्रकाश भाटिया, नागपुर में अनंतराव गोखले तथा अन्य कार्यकर्ताओं ने इस दिशा में महत्त्वपूर्ण दायित्व निभाया।

पर्चे छपते थे।

रात्रि के अंधकार में वितरित किए जाते थे।

कभी मंदिरों के बाहर।

कभी छात्रावासों में।

कभी बाजारों में।

और कभी रेलयात्रियों के हाथों।

सत्य का यह प्रवाह धीमा अवश्य था, किन्तु रुका नहीं।

क्योंकि यह केवल सूचना नहीं थी।

यह आशा का संदेश था—

"संघर्ष समाप्त नहीं हुआ है।"


जेलों में बंद परिवारों की चिंता कौन कर रहा था?

कारागारों में बंद व्यक्ति तो दिखाई देते थे।

किन्तु उनके परिवार?

उनकी आजीविका?

उनके बच्चों की शिक्षा?

लोक संघर्ष समिति की तैयारियों में बंदी परिवारों की देखभाल को विशेष महत्व दिया गया था।

यह केवल राजनीतिक संघर्ष नहीं था।

यह सामाजिक उत्तरदायित्व का भी अभियान था।

हजारों स्वयंसेवक ऐसे परिवारों तक सहायता पहुँचाने में लगे रहे।

क्योंकि किसी भी आंदोलन की वास्तविक शक्ति उसके पीछे खड़ी समाज शक्ति होती है।

और यह शक्ति मौन रहती है, परंतु निर्णायक होती है।


विदेशों तक कैसे पहुँची भारत की पीड़ा?

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भारत में समाचारों पर नियंत्रण था।

किन्तु विश्व मौन नहीं था।

विदेशों में संपर्क का दायित्व बाला साहब भिड़े, चमनलाल, जगदीश मित्र सूद तथा केदारनाथ साहनी जैसे कार्यकर्ताओं ने संभाला।

धीरे-धीरे अंतरराष्ट्रीय मीडिया तक समाचार पहुँचने लगे।

12 दिसंबर 1976 को The Economist ने लिखा कि भूमिगत आंदोलन की वास्तविक शक्ति संघ और जनसंघ के संगठित कार्यकर्ता हैं तथा अन्य दल धीरे-धीरे मैदान छोड़ चुके हैं।

यह टिप्पणी केवल प्रशंसा नहीं थी।

यह इस तथ्य की स्वीकृति थी कि भारत में प्रतिरोध अभी जीवित था।

और उसका सबसे सक्रिय स्वरूप भूमिगत था।


परंतु क्या केवल छिपकर रहने से तानाशाही पराजित हो सकती थी?

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भूमिगत नेटवर्क तैयार हो चुका था।

संपर्क-सूत्र सक्रिय थे।

साहित्य पहुँच रहा था।

समाज में आशा का संचार हो रहा था।

किन्तु क्या इतना पर्याप्त था?

क्या केवल गुप्त बैठकों से लोकतंत्र पुनः स्थापित हो सकता था?

या फिर समय आ गया था खुलकर संघर्ष करने का?

धीरे-धीरे देशव्यापी सत्याग्रह की योजनाएँ आकार लेने लगी थीं।

और कुछ ही महीनों बाद भारत एक ऐसे आंदोलन का साक्षी बनने वाला था जिसमें हजारों लोग स्वेच्छा से जेल जाने के लिए तैयार खड़े थे।


उपसंहार : अंधकार में दीप जल चुके थे...

सत्ता को प्रतीत हो रहा था कि विरोध समाप्त हो चुका है।

किन्तु भूमिगत भारत में प्रतिरोध का जाल बिछ चुका था।

संदेश पहुँच रहे थे।

साहित्य छप रहा था।

परिवारों की सहायता हो रही थी।

और एक विराट सत्याग्रह की तैयारी चल रही थी।

इसी बीच लोकनायक जयप्रकाश नारायण द्वारा सौंपे गए दायित्व का निर्वाह कर रहे एक व्यक्ति पर शासन की दृष्टि और अधिक केंद्रित होने लगी।

वह व्यक्ति चुनाव नहीं लड़ रहा था।

उसके पास कोई पद नहीं था।

किन्तु संपूर्ण संघर्ष की धुरी उसी के चारों ओर घूम रही थी।

आखिर कौन थे नानाजी देशमुख?

और क्यों उनकी गिरफ्तारी के बाद भी आंदोलन रुका नहीं?

कल पढ़िए —

"लोकतंत्र का अदृश्य सेनापति : नानाजी देशमुख और लोक संघर्ष समिति का कमांड सेंटर"

(क्रमशः...)

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