विश्व पटल पर भारत का उदय: क्यों दुनिया को भारत की आवश्यकता है?
बदलती वैश्विक व्यवस्था और भारत का समय: एक नई राह की तलाश
विश्व पटल पर भारत का उदय और वसुधैव कुटुम्बकम्
✍️ मनमोहन पुरोहित 'मनु महाराज'
इतिहास में कुछ कालखंड ऐसे आते हैं जब विश्व स्वयं अपने लिए नई दिशा खोजने लगता है। पुरानी व्यवस्थाएँ थक जाती हैं, स्थापित विचारधाराएँ प्रश्नों के घेरे में आ जाती हैं और मानवता किसी नए मार्गदर्शक विचार की तलाश करने लगती है। आज 21वीं सदी का तीसरा दशक कुछ ऐसी ही परिस्थितियों का साक्षी बन रहा है।
एक ओर विज्ञान और तकनीक ने अभूतपूर्व प्रगति की है, तो दूसरी ओर मानव सभ्यता असुरक्षा, युद्ध, पर्यावरण संकट, सांस्कृतिक विघटन और आर्थिक असमानताओं के जाल में उलझती जा रही है। शक्तिशाली राष्ट्र अपने सामरिक और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए प्रतिबंध लगाते हैं, संसाधनों पर नियंत्रण स्थापित करते हैं और आवश्यकता पड़ने पर युद्ध का सहारा लेने में भी संकोच नहीं करते। विश्व के सामने प्रश्न यह है कि क्या मानवता का भविष्य केवल शक्ति-संघर्ष और स्वार्थ की राजनीति पर आधारित होगा या कोई ऐसी राह भी है जो शक्ति और संवेदना, विकास और प्रकृति, राष्ट्रहित और विश्वहित के बीच संतुलन स्थापित कर सके?
यहीं से भारत की भूमिका प्रारम्भ होती है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कार्यकर्ता विकास वर्ग के समापन अवसर पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण बात कही—"भारत का समय आ गया है।" यह केवल एक भावनात्मक उद्घोष नहीं, बल्कि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों का गहन विश्लेषण है।
उन्होंने कहा कि दुनिया व्यक्ति की स्वतंत्रता, समाज की स्वतंत्रता और प्रकृति के संरक्षण की बातें तो अलग-अलग करती है, परंतु इन तीनों का एक साथ पोषण कैसे हो, यह नहीं जानती। यही वह बिंदु है जहाँ भारत की सभ्यतागत दृष्टि विश्व के लिए प्रासंगिक बन जाती है।
भारतीय दर्शन में जीवन को कभी खंडित रूप में नहीं देखा गया। हमारे यहाँ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थों की अवधारणा है। भौतिक समृद्धि भी आवश्यक है और आध्यात्मिक उत्कर्ष भी। व्यक्ति का विकास भी महत्वपूर्ण है और समाज का कल्याण भी। प्रकृति का संरक्षण भी आवश्यक है और प्रगति भी। इस समन्वित दृष्टि को भारत ने हजारों वर्षों तक अपने जीवन में उतारने का प्रयास किया है।
महाउपनिषद् का प्रसिद्ध वचन—
"अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥"
भारतीय सभ्यता का मूल मंत्र है। यह केवल एक आदर्श वाक्य नहीं, बल्कि भारत की राष्ट्रीय चेतना का आधार है। विश्व को परिवार मानने की यह दृष्टि भारत को अन्य शक्तियों से अलग पहचान देती है।
आज विश्व देख रहा है कि शक्ति सम्पन्न राष्ट्र अनेक बार अपनी सामर्थ्य का उपयोग प्रभुत्व स्थापित करने के लिए करते हैं। कभी आर्थिक प्रतिबंध लगाए जाते हैं, कभी सामरिक दबाव बनाया जाता है और कभी संसाधनों के नियंत्रण के लिए संघर्ष खड़े किए जाते हैं। डॉ. भागवत ने इसी संदर्भ में कहा कि भारत के बारे में विश्व में यह विश्वास बने कि वह शक्ति सम्पन्न होकर भी दूसरों पर मनमानी नहीं करेगा, बल्कि सबको साथ लेकर चलेगा।
यही भारत की विशिष्टता है।
भारत ने इतिहास में कभी उपनिवेशवाद का मार्ग नहीं अपनाया। उसने अपनी संस्कृति का विस्तार तलवार के बल पर नहीं, बल्कि संवाद, ज्ञान और व्यापार के माध्यम से किया। नालंदा और तक्षशिला के द्वार विश्व के लिए खुले थे। भारत ने शरणागतों को स्थान दिया, विविधताओं को स्वीकार किया और सह-अस्तित्व को जीवन का आधार बनाया।
स्वामी विवेकानन्द ने 1893 में शिकागो धर्म संसद में जिस भारत का परिचय विश्व को दिया था, वह इसी चेतना का प्रतिनिधि था। उनका विश्वास था कि भारत एक दिन पुनः उठेगा और विश्व को आध्यात्मिक तथा नैतिक नेतृत्व प्रदान करेगा। कार्यकर्ता विकास वर्ग में डॉ. भागवत ने भी उसी स्वप्न का स्मरण करते हुए कहा कि हम शीघ्र ही उस भारत को देखेंगे जो पहले से भी अधिक गौरव के साथ विश्व मंच पर स्थापित होगा।
यहाँ एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है कि यदि भारत के पास इतना महान ज्ञान था तो उसने हजार वर्षों की पराधीनता क्यों झेली?
इसका उत्तर भी सरसंघचालक ने अपने उद्बोधन में दिया। उन्होंने कहा कि जिन्होंने हमें गुलाम बनाया वे हमसे श्रेष्ठ नहीं थे। समस्या यह थी कि हमने अपनी तैयारी खो दी थी। हमने अपनी सामूहिक शक्ति, संगठन और आत्मविश्वास को पर्याप्त महत्व नहीं दिया। परिणामस्वरूप हमारी सांस्कृतिक और बौद्धिक श्रेष्ठता राजनीतिक शक्ति में परिवर्तित नहीं हो सकी।
यहीं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कार्यपद्धति का महत्व सामने आता है। संघ का मूल उद्देश्य केवल संगठन खड़ा करना नहीं, बल्कि ऐसे व्यक्तित्वों का निर्माण करना है जो स्वार्थ और भेदभाव से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानें। डॉ. भागवत ने इसे "स्वबोध के आधार पर स्वार्थ और भेद को तिलांजलि देने वाले कार्यकर्ताओं का निर्माण" कहा।
वास्तव में किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसकी जनसंख्या से नहीं, बल्कि उसके चरित्रवान नागरिकों से निर्धारित होता है। संगठन, अनुशासन और राष्ट्रीय चेतना ही वह आधार हैं जिन पर महान राष्ट्र खड़े होते हैं।
इसी संदर्भ में प्रमुख उद्योगपति पद्मभूषण कुमार मंगलम बिड़ला का वक्तव्य भी महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि आत्मनिर्भरता केवल आर्थिक नीति नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का माध्यम है। यह कथन भारत की वर्तमान यात्रा को समझने की कुंजी है।
आत्मनिर्भरता का अर्थ केवल विदेशी वस्तुओं का विकल्प तैयार करना नहीं है। इसका अर्थ है—आत्मविश्वास, नवाचार, उत्पादन क्षमता और राष्ट्रीय सामर्थ्य का विकास। जब भारत का युवा भारत में रहकर विश्व के लिए निर्माण करेगा, तब भारत केवल बाजार नहीं रहेगा, बल्कि विश्व विकास का साझेदार बनेगा।
आज भारत विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में स्थान बना चुका है। डिजिटल क्रांति, अंतरिक्ष अनुसंधान, स्वास्थ्य सेवाएँ, रक्षा उत्पादन और नवाचार के क्षेत्र में उसकी उपलब्धियाँ वैश्विक चर्चा का विषय हैं। परंतु भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि उसकी सभ्यतागत दृष्टि है।
दुनिया आज विकास चाहती है, लेकिन विनाश नहीं। समृद्धि चाहती है, लेकिन पर्यावरण संकट नहीं। स्वतंत्रता चाहती है, लेकिन अराजकता नहीं। शक्ति चाहती है, लेकिन युद्ध नहीं। भारत के पास इन सभी प्रश्नों का उत्तर उसकी सांस्कृतिक परंपरा में उपलब्ध है।
इसीलिए यह केवल भारत के उदय का समय नहीं है, बल्कि भारत के विचार के उदय का समय है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि भारत अपनी शक्ति को बढ़ाते हुए अपने मूल स्वभाव को बनाए रखे। यदि शक्ति और संस्कृति, प्रगति और मूल्य, विज्ञान और अध्यात्म का यह संतुलन बना रहा, तो भारत केवल एक महाशक्ति नहीं बनेगा, बल्कि विश्व को नई दिशा देने वाली सभ्यता के रूप में पुनः प्रतिष्ठित होगा।
संभवतः यही वह क्षण है जिसकी प्रतीक्षा स्वामी विवेकानन्द ने की थी और जिसकी आहट आज विश्व व्यवस्था के बदलते स्वरूप में सुनाई देने लगी है।
भारत का समय वास्तव में आ गया है। अब प्रश्न केवल इतना है कि क्या हम स्वयं उसके लिए तैयार हैं?
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