बालासाहब देवरस के पत्र : आत्मसमर्पण, रणनीति या लोकतांत्रिक संवाद? पूरा सच
बालासाहब देवरस के पत्र : आत्मसमर्पण, रणनीति या लोकतांत्रिक संवाद? पूरा सच
लोकतंत्र पर ग्रहण — आपातकाल की अनकही गाथा (भाग–7)
श्रृंखला के पिछले छह भागों में हमने देखा कि कैसे आपातकाल के दौरान लोकतंत्र पर पहरा बैठा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगा, हजारों कार्यकर्ता भूमिगत हुए, सत्याग्रह हुए और कारागारों में यातनाएँ दी गईं।
किन्तु इन सबके बीच एक ऐसा विषय है जिसे पिछले पाँच दशकों से बार-बार उछाला जाता रहा है।
जब भी आपातकाल में संघ की भूमिका की चर्चा होती है, एक प्रश्न अवश्य पूछा जाता है—
"यदि संघ इतना बड़ा संघर्ष कर रहा था, तो फिर सरसंघचालक बालासाहब देवरस ने इंदिरा गांधी को पत्र क्यों लिखा?"
यही प्रश्न अनेक मंचों पर संघ के पूरे संघर्ष को संदेह के घेरे में खड़ा करने के लिए भी प्रयुक्त किया जाता है।
किन्तु क्या इतिहास केवल एक पत्र पढ़कर समझा जा सकता है?
या फिर उस पत्र को उसके समय, परिस्थिति और उद्देश्य के साथ पढ़ना चाहिए?
आइए, परत-दर-परत इस पूरे प्रसंग को समझते हैं।
क्या वास्तव में पत्र लिखे गए थे?
4 जुलाई 1975 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगाया गया।
30 जून को ही सरसंघचालक बालासाहब देवरस गिरफ्तार होकर कारागार पहुँच चुके थे।
इसी बंदी अवस्था में उन्होंने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को दो पत्र लिखे।
यह ऐतिहासिक तथ्य है।
इस पर कोई विवाद नहीं है।
विवाद इस बात पर है कि उन पत्रों का उद्देश्य क्या था?
विरोधियों ने केवल कुछ पंक्तियाँ पढ़ीं, पूरा पत्र नहीं
वर्षों से सार्वजनिक विमर्श में इन पत्रों के कुछ अंश उद्धृत किए जाते रहे हैं।
उन्हें इस प्रकार प्रस्तुत किया जाता है मानो संघ ने संघर्ष छोड़कर समझौते का मार्ग स्वीकार कर लिया था।
किन्तु दस्तावेज़ों का अध्ययन एक अलग चित्र प्रस्तुत करता है।
पत्रों में संघ पर लगाए गए आरोपों का प्रतिवाद किया गया, प्रतिबंध हटाने का आग्रह किया गया तथा यह कहा गया कि संघ एक सांस्कृतिक संगठन है, जिसने राष्ट्रहित में कार्य किया है।
यदि कोई केवल दो पंक्तियाँ पढ़ेगा, तो एक निष्कर्ष निकलेगा।
यदि पूरा पत्र पढ़ेगा, तो संभव है उसका निष्कर्ष भिन्न हो।
इतिहास का न्याय हमेशा संपूर्ण दस्तावेज़ से होता है, चयनित उद्धरणों से नहीं।
यदि समझौता था, तो संघर्ष क्यों चलता रहा?
यहीं सबसे बड़ा प्रश्न उठता है।
यदि पत्र वास्तव में आत्मसमर्पण का माध्यम थे, तो—
भूमिगत आंदोलन क्यों चलता रहा?
लोक संघर्ष समिति का संचालन क्यों जारी रहा?
देशव्यापी सत्याग्रह क्यों हुए?
हजारों स्वयंसेवक जेल क्यों गए?
प्रतिबंध हटने तक संघर्ष क्यों नहीं रुका?
दस्तावेज़ों के अनुसार, पत्र लिखे जाने के बाद भी आंदोलन की गति मंद नहीं पड़ी, बल्कि सत्याग्रह, भूमिगत संगठन और जनसंपर्क निरंतर चलते रहे।
यह तथ्य उन पत्रों की व्याख्या करते समय अवश्य ध्यान में रखा जाना चाहिए।
भारतीय परंपरा में संवाद और संघर्ष साथ-साथ चलते हैं
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में भी अनेक अवसर ऐसे आए जब संघर्षरत नेताओं ने तत्कालीन शासन को पत्र लिखे।
महात्मा गांधी ने भी ब्रिटिश वायसरायों को अनेक पत्र लिखे।
क्या उन पत्रों का अर्थ आत्मसमर्पण था?
नहीं।
वे संवाद के माध्यम थे।
दस्तावेज़ में भी इसी संदर्भ का उल्लेख करते हुए यह तर्क रखा गया है कि किसी सरकार को पत्र लिखना अपने आप में संघर्ष का परित्याग नहीं माना जा सकता।
पत्र लिखना और संघर्ष करना—दोनों एक साथ संभव हैं।
इतिहास का निर्णय भावनाओं से नहीं, घटनाक्रम से होता है
यदि घटनाओं का क्रम देखा जाए, तो एक रोचक तथ्य सामने आता है।
पत्र लिखे गए।
किन्तु प्रतिबंध नहीं हटा।
संघर्ष जारी रहा।
गिरफ्तारियाँ जारी रहीं।
सत्याग्रह जारी रहे।
भूमिगत अभियान चलता रहा।
अर्थात् घटनाक्रम स्वयं यह संकेत देता है कि पत्रों से न तो संघर्ष समाप्त हुआ और न ही शासन ने अपनी नीति बदली।
यही कारण है कि इतिहासकार इस प्रसंग की व्याख्या करते समय केवल पत्र नहीं, बल्कि पूरे घटनाक्रम को साथ रखकर देखते हैं।
इतिहास को उद्धरणों से नहीं, संदर्भों से पढ़िए
किसी भी ऐतिहासिक दस्तावेज़ का मूल्यांकन तीन आधारों पर किया जाता है—
पहला—उसका मूल पाठ।
दूसरा—उस समय की परिस्थितियाँ।
तीसरा—उसके बाद की घटनाएँ।
यदि इन तीनों को साथ रखा जाए, तभी निष्पक्ष निष्कर्ष निकलता है।
आपातकाल का यह प्रसंग भी इसी कसौटी पर समझा जाना चाहिए।
उपसंहार : अब निर्णय जनता ने देना था
1976 बीत रहा था।
सत्ता को विश्वास था कि प्रतिरोध समाप्त हो जाएगा।
किन्तु देश के भीतर कुछ और ही पक रहा था।
कारागारों में बैठे नेता।
भूमिगत कार्यकर्ता।
सत्याग्रही।
छात्र।
महिलाएँ।
और करोड़ों सामान्य नागरिक—
सभी एक प्रश्न का उत्तर खोज रहे थे—
क्या भारत फिर लोकतंत्र की ओर लौटेगा?
और तभी इतिहास ने करवट ली।
एक ऐसा निर्णय हुआ जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी।
आपातकाल हटाने की घोषणा हुई।
चुनाव घोषित हुए।
किन्तु क्या यह सत्ता का आत्मविश्वास था...
या इतिहास का सबसे बड़ा राजनीतिक दाँव?
अगले भाग में पढ़िए—
"जब जनता बनी निर्णायक : चुनाव, आपातकाल का अंत और लोकतंत्र की पुनर्स्थापना"
(क्रमशः...)
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