जब जेल जाना देशभक्ति बन गया : सत्याग्रह, बलिदान और एक लाख बंदियों की गाथा
जब जेल जाना देशभक्ति बन गया : सत्याग्रह, बलिदान और एक लाख बंदियों की गाथा
लोकतंत्र पर ग्रहण — आपातकाल की अनकही गाथा (भाग–5)
चार भागों की इस श्रृंखला में हमने देखा—
पहले लोकतंत्र पर ग्रहण लगा।
फिर सत्ता ने अपने सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी की पहचान की।
इसके बाद भूमिगत संघर्ष प्रारंभ हुआ।
और अंततः नानाजी देशमुख की गिरफ्तारी के बाद भी आंदोलन रुकने के बजाय और अधिक संगठित होता चला गया।
अब प्रश्न यह था—
क्या यह संघर्ष केवल गुप्त बैठकों और पर्चों तक सीमित रहने वाला था?
या फिर कोई ऐसा क्षण आने वाला था, जब हजारों लोग स्वयं कारागार जाने के लिए आगे आएँगे?
सत्ता का विश्वास था कि भय सबसे बड़ा हथियार है।
परंतु इतिहास बार-बार सिद्ध करता है—
जब राष्ट्रचेतना जागती है, तब कारागार भी तीर्थ बन जाते हैं।
वह निर्णय जिसने पूरे देश में नई चेतना जगा दी
भूमिगत संगठनात्मक तैयारी लगभग पूर्ण हो चुकी थी।
संपर्क-सूत्र सक्रिय थे।
साहित्य देशभर में पहुँच रहा था।
जनता को यह विश्वास दिलाया जा चुका था कि लोकतंत्र अभी जीवित है।
अब लोक संघर्ष समिति ने एक ऐतिहासिक निर्णय लिया—
देशव्यापी सत्याग्रह।
इस सत्याग्रह के तीन उद्देश्य स्पष्ट थे—
शासन को यह संदेश देना कि जनप्रतिरोध समाप्त नहीं हुआ है।
भयभीत समाज में आत्मविश्वास और साहस का संचार करना।
जेलों में बंद लोकतंत्र सेनानियों तक यह संदेश पहुँचाना कि वे अकेले नहीं हैं।
यह केवल विरोध नहीं था।
यह मनोबल की पुनर्स्थापना का अभियान था।
"वंदे मातरम्" बोलना भी अपराध माना जाने लगा था
आज यह सुनकर आश्चर्य हो सकता है, पर उस समय ऐसी परिस्थितियाँ निर्मित हो गई थीं कि "वंदे मातरम्" और "भारत माता की जय" जैसे उद्घोष भी शासन की दृष्टि में संदेह का विषय बन जाते थे।
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ता महाविद्यालयों में मध्याह्न अवकाश के समय अचानक सत्याग्रह प्रारंभ करते।
पटाखे की आवाज़ संकेत बनती।
नारे गूँजते।
पर्चे बाँटे जाते।
भाषण होते।
और पुलिस के पहुँचने पर सत्याग्रही शांतिपूर्वक "वंदे मातरम्" गाते हुए गिरफ्तारी देते।
यह संघर्ष हिंसा का नहीं था।
यह साहस का प्रदर्शन था।
एक लाख तीस हजार सत्याग्रही... क्या यह केवल एक आँकड़ा है?
आपातकाल के इतिहास का यह सबसे महत्त्वपूर्ण अध्याय है।
दस्तावेज़ के अनुसार—
लगभग 1,30,000 सत्याग्रहियों ने गिरफ्तारी दी।
इनमें 1,00,000 से अधिक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक बताए गए हैं।
मीसा के अंतर्गत बंद किए गए लगभग 30,000 लोगों में 25,000 से अधिक संघ-संबद्ध थे।
एक अन्य विवरण के अनुसार, मीसा के अंतर्गत 23,015 संघ स्वयंसेवक बंदी बनाए गए, जिनमें 77 महिला कार्यकर्ता भी थीं, जबकि सत्याग्रह के कारण गिरफ्तार संघ कार्यकर्ताओं की संख्या 44,965 बताई गई है।
संख्याओं में विभिन्न स्रोतों के अनुसार कुछ अंतर अवश्य मिलता है, किंतु यह तथ्य निर्विवाद रूप से उभरता है कि आपातकाल विरोधी आंदोलन में बड़ी संख्या में स्वयंसेवकों ने सक्रिय भागीदारी की।
सत्याग्रह केवल पुरुषों ने नहीं किया था
इतिहास प्रायः पुरुष नेतृत्व का उल्लेख करता है।
किन्तु आपातकाल की यह कथा अधूरी रहेगी यदि महिलाओं के योगदान को भुला दिया जाए।
राष्ट्र सेविका समिति की सेविकाएँ संपर्क, संदेश-वहन, परिवारों की सहायता और सत्याग्रह जैसे अनेक कार्यों में सक्रिय रहीं।
मीसा के अंतर्गत बंदी बनाई गई महिला कार्यकर्ताओं का उल्लेख भी उपलब्ध अभिलेखों में मिलता है।
लोकतंत्र की रक्षा का यह संघर्ष केवल पुरुषों का नहीं था।
यह परिवारों, माताओं, बहनों और छात्राओं का भी संघर्ष था।
कारागार अब भय का प्रतीक नहीं, संकल्प का केंद्र बन चुके थे
सत्याग्रह का सबसे बड़ा प्रभाव यह हुआ कि शासन का सबसे शक्तिशाली हथियार—भय—धीरे-धीरे निष्प्रभावी होने लगा।
जब हजारों लोग स्वयं गिरफ्तारी देने लगे, तब जेल की दीवारें आतंक का नहीं, त्याग का प्रतीक बनने लगीं।
जेलों में बंद नेताओं तक यह संदेश पहुँच गया—
बाहर संघर्ष जीवित है।
और बाहर खड़े लोगों तक यह संदेश पहुँचा—
भीतर बैठे लोग अकेले नहीं हैं।
यही सत्याग्रह की सबसे बड़ी सफलता थी।
लेकिन सत्ता ने हार नहीं मानी...
जब भय से भी प्रतिरोध नहीं रुका...
जब गिरफ्तारी भी आंदोलन को रोक नहीं सकी...
जब जेल जाना सम्मान का प्रतीक बनने लगा...
तब शासन ने एक और मार्ग अपनाया।
पूछताछ।
यातना।
शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना।
भारत के अनेक भागों से ऐसी घटनाएँ सामने आईं, जिनमें लोकतंत्र सेनानियों के साथ अमानवीय व्यवहार किए जाने के आरोप दर्ज हुए।
यहीं से आपातकाल का सबसे पीड़ादायक अध्याय आरंभ होता है।
उपसंहार : जब शरीर टूटे, पर संकल्प नहीं
सत्याग्रह सफल हो चुका था।
देशभर में हजारों लोग जेलों में थे।
किन्तु शासन अब केवल बंदी बनाकर संतुष्ट नहीं था।
कारागारों के भीतर क्या हुआ?
किन यातनाओं से लोकतंत्र सेनानियों को गुजरना पड़ा?
कौन थे वे छात्र, स्वयंसेवक और कार्यकर्ता जिन्होंने असहनीय पीड़ा सहकर भी अपने साथियों का नाम तक नहीं बताया?
अगले भाग में पढ़िए—
"कारागारों के भीतर का नरक : आपातकाल की यातनाएँ और लोकतंत्र सेनानियों का अदम्य साहस"
उस लेख में हम दस्तावेज़ों में वर्णित इंदौर, उज्जैन, भोपाल, असम और अन्य स्थानों के उन मार्मिक प्रसंगों को तथ्यात्मक रूप से जानेंगे, जो आपातकाल के सबसे दर्दनाक अध्यायों में गिने जाते हैं।
(क्रमशः...)
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें