संगठित समाज ही राष्ट्र की वास्तविक शक्ति: विकसित भारत के निर्माण का मूल मंत्र

संगठित समाज ही राष्ट्र की वास्तविक शक्ति संघ की कार्यपद्धति और राष्ट्रीय पुनर्निर्माण का आधार ✍️ मनमोहन पुरोहित 'मनु महाराज'
"संघ ने एक कार्यपद्धति ऐसी विकसित की ताकि सारी तरह की विभिन्नताओं के साथ हिन्दू समाज एकजुट आए।" — डॉ. मोहन भागवत

इतिहास का निष्पक्ष अध्ययन हमें बताता है कि किसी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसके शस्त्रागार, अर्थव्यवस्था या राजनीतिक सत्ता में नहीं, बल्कि उसके समाज की संगठन क्षमता में निहित होती है। सेनाएँ पराजित हो सकती हैं, साम्राज्य ढह सकते हैं, शासन बदल सकते हैं, लेकिन यदि समाज संगठित और जागृत है तो राष्ट्र पुनः खड़ा हो जाता है। इसके विपरीत यदि समाज बिखरा हुआ हो, तो अपार संसाधन और महान परंपराएँ भी उसे पतन से नहीं बचा सकतीं। आज जब भारत विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब यह प्रश्न पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है कि राष्ट्र निर्माण की वास्तविक शक्ति क्या है? क्या केवल आर्थिक विकास पर्याप्त है? क्या केवल राजनीतिक परिवर्तन से समाज बदल सकता है? या फिर इसके लिए संगठित, संस्कारित और दायित्वबोध से युक्त समाज की आवश्यकता होती है? राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता विकास वर्ग के समापन समारोह में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने इसी मूल प्रश्न पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारत की शक्ति उसके संगठित समाज में निहित है। संघ का सम्पूर्ण कार्य इसी विचार पर आधारित है कि व्यक्ति निर्माण से समाज निर्माण और समाज निर्माण से राष्ट्र निर्माण का मार्ग प्रशस्त होता है। भारत की पराधीनता का सबसे बड़ा कारण भारत ने लगभग एक हजार वर्षों तक विदेशी आक्रमणों और पराधीनता का सामना किया। सामान्यतः यह माना जाता है कि विदेशी आक्रमणकारी अधिक शक्तिशाली थे, इसलिए वे सफल हुए। किंतु इतिहास की गहराई में उतरने पर यह धारणा अधूरी प्रतीत होती है। डॉ. मोहन भागवत ने अपने उद्बोधन में स्पष्ट कहा— 

 "जिन्होंने हमें गुलाम बनाया, वे हमसे श्रेष्ठ नहीं थे। संख्या में भी वे हमसे अधिक नहीं थे।" यह कथन हमें आत्ममंथन के लिए प्रेरित करता है। यदि आक्रमणकारी श्रेष्ठ नहीं थे, तो वे सफल कैसे हुए? 
 उत्तर स्पष्ट है—हमारी आंतरिक दुर्बलताओं के कारण। समाज जातियों, क्षेत्रों, छोटे-छोटे स्वार्थों और आपसी संघर्षों में विभाजित होता गया। राष्ट्रीय चेतना का स्थान स्थानीय हितों ने ले लिया। सामूहिक उत्तरदायित्व की भावना कमजोर होती गई। परिणामस्वरूप विदेशी शक्तियों के लिए भारत पर अधिकार करना अपेक्षाकृत आसान हो गया। महाभारत में कहा गया है— "संघे शक्ति: कलौ युगे।" कलियुग में संगठन ही सबसे बड़ी शक्ति है। जहाँ संगठन होता है, वहाँ सीमित साधन भी चमत्कार कर सकते हैं। जहाँ विखंडन होता है, वहाँ समृद्धि भी सुरक्षा नहीं दे पाती। ## समाज की शक्ति बनाम सत्ता की शक्ति भारत का इतिहास इस सत्य का साक्षी है कि राष्ट्र केवल सत्ता से नहीं चलते। सत्ता बदलती रहती है, लेकिन समाज स्थायी होता है। जब विदेशी आक्रमणों ने भारत की राजनीतिक संरचनाओं को तोड़ा, तब भी भारतीय समाज जीवित रहा। गाँवों की व्यवस्था जीवित रही। परिवार व्यवस्था जीवित रही। मंदिर, तीर्थ, आश्रम और सांस्कृतिक परंपराएँ जीवित रहीं। यही कारण है कि राजनीतिक पराधीनता के बावजूद भारत की आत्मा नष्ट नहीं हुई। भारतीय चिंतन सदैव समाज को राष्ट्र का मूल आधार मानता रहा है। राज्य आवश्यक है, किंतु समाज उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। राज्य कानून बना सकता है, लेकिन चरित्र निर्माण नहीं कर सकता। राज्य व्यवस्था दे सकता है, लेकिन संस्कार नहीं दे सकता। संस्कारों का निर्माण समाज करता है और संगठित समाज ही राष्ट्र की स्थायी शक्ति बनता है। 
 संघ की कार्यपद्धति का मूल दर्शन
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 1925 में हुई। उस समय भारत राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रहा था। अनेक संगठनों का ध्यान अंग्रेजों के विरुद्ध आंदोलन पर केंद्रित था। किंतु संघ के संस्थापक Keshav Baliram Hedgewar ने समस्या की जड़ को पहचाना। उन्होंने देखा कि भारत की वास्तविक समस्या केवल विदेशी शासन नहीं है, बल्कि समाज का विखंडन है। इसलिए उन्होंने व्यक्ति निर्माण और समाज संगठन का मार्ग चुना। संघ का मूल विश्वास है कि यदि व्यक्ति में राष्ट्रभाव, अनुशासन, सेवा और समर्पण का संस्कार विकसित हो जाए, तो वही व्यक्ति समाज परिवर्तन का माध्यम बनता है। ऐसे व्यक्तियों के समूह से संगठित समाज का निर्माण होता है और संगठित समाज राष्ट्र को नई दिशा देता है। शाखा: एक मौन क्रांति संघ की शाखा को अक्सर केवल व्यायाम या खेल का कार्यक्रम समझ लिया जाता है, जबकि वास्तविकता इससे कहीं अधिक व्यापक है। शाखा एक ऐसी सामाजिक प्रयोगशाला है जहाँ विभिन्न जातियों, वर्गों, भाषाओं, आर्थिक परिस्थितियों और व्यवसायों से आए लोग बिना किसी भेदभाव के एक साथ खड़े होते हैं। वहाँ व्यक्ति की पहचान उसके पद, संपत्ति या सामाजिक स्थिति से नहीं, बल्कि उसके आचरण और राष्ट्रभाव से होती है। शाखा में अनुशासन है, लेकिन कठोरता नहीं। संगठन है, लेकिन अहंकार नहीं। नेतृत्व है, लेकिन व्यक्तिपूजा नहीं। यही कारण है कि शाखा केवल कार्यक्रम नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण की प्रक्रिया बन जाती है। 

सेवा: संगठन का प्राण कुमार मंगलम
बिड़ला ने अपने उद्बोधन में संघ की सेवा गतिविधियों का उल्लेख करते हुए कहा कि हजारों सेवा कार्य समाज जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में संचालित हो रहे हैं। सेवा संघ की कार्यपद्धति का अभिन्न अंग है। सेवा केवल दान नहीं है। सेवा समाज के साथ आत्मीय संबंध स्थापित करने का माध्यम है। जब बाढ़ आती है, भूकंप आता है, महामारी आती है या किसी क्षेत्र में संकट उत्पन्न होता है, तब स्वयंसेवक बिना प्रचार और प्रसिद्धि की अपेक्षा के कार्य में जुट जाते हैं। सेवा का यही भाव संगठन को समाज से जोड़ता है। समाज जब किसी संगठन को अपने सुख-दुख का सहभागी अनुभव करता है, तब उसके प्रति विश्वास स्वतः निर्मित होता है। समरसता: संगठन की आत्मा भारत की विविधता उसकी शक्ति भी है और चुनौती भी। यदि विविधता को विभाजन में बदल दिया जाए तो समाज कमजोर होता है। यदि विविधता को समरसता में रूपांतरित कर दिया जाए तो वही शक्ति बन जाती है। संघ की कार्यपद्धति का एक महत्वपूर्ण पक्ष सामाजिक समरसता है। शाखा, सेवा कार्य, परिवार प्रबोधन, ग्राम विकास और सामाजिक संपर्क के माध्यम से समाज के विभिन्न वर्गों को जोड़ने का प्रयास किया जाता है। उपनिषद का मंत्र है— "संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।" अर्थात साथ चलो, साथ बोलो और अपने मनों को एक करो। यही भारतीय संगठन दर्शन का आधार है। 

 विकसित भारत और सामाजिक पूंजी

आज विकसित भारत 2047 की चर्चा व्यापक रूप से हो रही है। सामान्यतः विकास को आर्थिक आँकड़ों में मापा जाता है। लेकिन किसी भी राष्ट्र की वास्तविक प्रगति केवल GDP से निर्धारित नहीं होती। विश्व के अनेक देशों के पास अपार धन है, फिर भी वे सामाजिक तनाव, सांस्कृतिक संकट और पारिवारिक विघटन जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। भारत की सबसे बड़ी पूंजी उसकी सामाजिक पूंजी है—उसका परिवार तंत्र, उसकी सांस्कृतिक चेतना, उसकी सामुदायिक भावना और उसका संगठनात्मक आधार। यदि यह सामाजिक पूंजी मजबूत रहती है तो आर्थिक विकास भी स्थायी होगा। यदि सामाजिक आधार कमजोर पड़ गया, तो आर्थिक प्रगति भी टिकाऊ नहीं रह सकेगी। ## हिन्दू समाज का संगठन और विश्वबंधुत्व संघ के कार्य को लेकर अनेक बार प्रश्न उठाया जाता है कि हिन्दू समाज के संगठन और विश्वबंधुत्व में क्या संबंध है? वास्तव में दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। जो समाज स्वयं संगठित नहीं है, वह विश्व के लिए कोई सकारात्मक योगदान नहीं दे सकता। जो समाज अपनी पहचान को लेकर भ्रमित है, वह मानवता को दिशा नहीं दे सकता। भारतीय परंपरा का "वसुधैव कुटुम्बकम्" कोई खोखला नारा नहीं है। यह आत्मविश्वासी और संगठित समाज की जीवन दृष्टि है। जब भारत संगठित होगा, तभी वह विश्व को सहयोग, समरसता और सहअस्तित्व का संदेश प्रभावी रूप से दे सकेगा। भविष्य का भारत: संगठित, सक्षम और आत्मविश्वासी सरसंघचालक ने अपने उद्बोधन में कहा कि भारत का समय आ गया है। यह केवल अवसर नहीं, उत्तरदायित्व भी है। भारत विश्व मंच पर उभर रहा है। उसकी अर्थव्यवस्था बढ़ रही है। उसकी तकनीकी क्षमता विकसित हो रही है। उसकी वैश्विक प्रतिष्ठा मजबूत हो रही है। किंतु इन सबकी स्थायी आधारशिला एक संगठित समाज ही होगा। हमें ऐसे नागरिक चाहिए जो अधिकारों के साथ दायित्व भी समझें। ऐसे युवा चाहिए जो केवल करियर नहीं, राष्ट्र निर्माण का भी स्वप्न देखें। ऐसे परिवार चाहिए जो संस्कारों के केंद्र बने रहें। ऐसे संगठन चाहिए जो समाज को जोड़ें, तोड़ें नहीं। निष्कर्ष: राष्ट्र निर्माण का शाश्वत सूत्र राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया चुनावों, योजनाओं और घोषणाओं से कहीं बड़ी होती है। यह व्यक्ति के भीतर से प्रारंभ होती है। जब व्यक्ति अपने से ऊपर समाज को और समाज से ऊपर राष्ट्र को स्थान देता है, तब एक नई शक्ति जन्म लेती है। भारत की हजार वर्षों की यात्रा हमें बताती है कि विखंडन पतन का कारण बनता है और संगठन उत्थान का आधार। यही इतिहास का निष्कर्ष है, यही वर्तमान की आवश्यकता है और यही भविष्य का मार्ग भी। यदि विकसित भारत का स्वप्न साकार करना है, तो हमें केवल शक्तिशाली राष्ट्र नहीं, बल्कि संगठित राष्ट्र बनना होगा। क्योंकि अंततः राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसकी सेना, उसकी संपत्ति या उसकी सत्ता में नहीं, बल्कि उसके जागृत, संस्कारित और संगठित समाज में निहित होती है। --- 

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