अफगानिस्तान: डूरंड रेखा, तालिबान, पश्तून और चाबहार पोर्ट से जुड़ी भारत की पूरी रणनीति
अफगानिस्तान: डूरंड रेखा से चाबहार पोर्ट तक, भारत की रणनीति और एशिया का नया भू-राजनीतिक संघर्ष
अफगानिस्तान: डूरंड रेखा, तालिबान, पश्तून और चाबहार पोर्ट से जुड़ी भारत की पूरी रणनीति- लेखन मनमोहन पुरोहित मनु महाराज
डूरंड रेखा क्या है? पश्तून कौन हैं? तालिबान कैसे उभरा? उत्तरी गठबंधन की भूमिका क्या रही? चाबहार पोर्ट भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है? जानिए अफगानिस्तान के इतिहास, भू-राजनीति और भारत की रणनीति का विस्तृत विश्लेषण।
अफगानिस्तान: डूरंड रेखा से चाबहार पोर्ट तक, भारत की रणनीति और एशिया का नया भू-राजनीतिक संघर्ष
प्रस्तावना: क्यों फिर दुनिया की नजर अफगानिस्तान पर है?
अफगानिस्तान को यूँ ही "साम्राज्यों का कब्रिस्तान" नहीं कहा जाता। सिकंदर महान से लेकर ब्रिटिश साम्राज्य, सोवियत संघ और अमेरिका तक, हर महाशक्ति ने यहाँ अपने प्रभाव का विस्तार करने का प्रयास किया, लेकिन अंततः उसे भारी कीमत चुकानी पड़ी।
आज भी अफगानिस्तान केवल एक देश नहीं, बल्कि एशिया की भू-राजनीतिक शतरंज का सबसे महत्वपूर्ण मोहरा है। इसकी अस्थिरता भारत, पाकिस्तान, चीन, रूस, ईरान और अमेरिका जैसे देशों की रणनीतियों को सीधे प्रभावित करती है।
लेकिन इस पूरे संकट की जड़ लगभग 133 वर्ष पुरानी एक सीमा रेखा में छिपी है— डूरंड रेखा।
डूरंड रेखा: एक सीमा जिसने लाखों पश्तूनों को बाँट दिया
1893 में ब्रिटिश भारत के विदेश सचिव सर मॉर्टिमर डूरंड और अफगान अमीर अब्दुर रहमान खान के बीच हुए समझौते के बाद लगभग 2,640 किलोमीटर लंबी सीमा निर्धारित की गई।
1947 में पाकिस्तान के गठन के बाद यह सीमा उसके हिस्से में आ गई, लेकिन अफगानिस्तान ने इसे कभी औपचारिक रूप से स्वीकार नहीं किया।
इस रेखा ने पश्तून जनजातियों को दो देशों में विभाजित कर दिया। परिवार बँट गए, सांस्कृतिक संबंध टूटे और एक ऐसा विवाद पैदा हुआ जो आज भी पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच तनाव का प्रमुख कारण है।
आखिर कौन हैं पश्तून?
पश्तून, जिन्हें भारतीय उपमहाद्वीप में पठान भी कहा जाता है, अफगानिस्तान की सबसे प्रभावशाली जातीय शक्ति हैं।
अनुमानित जनसंख्या : 5 से 7 करोड़
भाषा : पश्तो
धर्म : सुन्नी इस्लाम
निवास : दक्षिण और पूर्वी अफगानिस्तान तथा पाकिस्तान का खैबर पख्तूनख्वा क्षेत्र
पश्तून समाज "पश्तूनवाली" नामक पारंपरिक आचार संहिता पर आधारित है, जिसमें सम्मान, प्रतिशोध, मेहमाननवाजी और स्वतंत्रता सर्वोच्च मूल्य माने जाते हैं।
अफगानिस्तान: अनेक जातियों का देश
अफगानिस्तान वास्तव में बहु-जातीय राष्ट्र है।
| जातीय समूह | अनुमानित आबादी |
|---|---|
| पश्तून | 38-42% |
| ताजिक | 25-27% |
| हजारा | 9-10% |
| उज़्बेक | 8-9% |
| अन्य | 8-10% |
यही विविधता देश की शक्ति भी है और लंबे समय से संघर्ष का कारण भी।
तालिबान कैसे पैदा हुआ?
1979 में सोवियत आक्रमण के बाद अफगानिस्तान दशकों तक युद्ध का मैदान बना रहा। सोवियत सेना की वापसी के बाद गृहयुद्ध शुरू हो गया।
इसी अराजकता के बीच 1994 में पाकिस्तान के मदरसों में शिक्षित पश्तून छात्रों के एक समूह ने मुल्ला मोहम्मद उमर के नेतृत्व में तालिबान की स्थापना की।
1996 में तालिबान ने काबुल पर कब्जा कर लिया और 1998 तक लगभग 90 प्रतिशत अफगानिस्तान उसके नियंत्रण में आ गया।
11 सितंबर 2001 के आतंकवादी हमलों के बाद अमेरिका ने तालिबान शासन को उखाड़ फेंका, लेकिन 2021 में अमेरिकी वापसी के साथ तालिबान फिर सत्ता में लौट आया।
अहमद शाह मसूद और उत्तरी गठबंधन
जब तालिबान पूरे देश पर नियंत्रण स्थापित कर रहा था, तब ताजिक, उज़्बेक और हजारा समुदायों ने मिलकर उत्तरी गठबंधन का निर्माण किया।
इसके सबसे प्रसिद्ध नेता थे—
अहमद शाह मसूद (पंजशीर का शेर)
अब्दुल रशीद दोस्तम
करीम खलीली
भारत, रूस और ईरान इस गठबंधन के प्रमुख समर्थक रहे।
2001 में अमेरिका के हस्तक्षेप के दौरान यही गठबंधन तालिबान को सत्ता से हटाने में निर्णायक साबित हुआ।
भारत के लिए अफगानिस्तान क्यों महत्वपूर्ण है?
भारत के लिए अफगानिस्तान केवल एक पड़ोसी क्षेत्र नहीं, बल्कि मध्य एशिया का प्रवेश द्वार है।
1. सुरक्षा
ISIS-K, जैश-ए-मोहम्मद और अन्य आतंकवादी संगठनों की गतिविधियाँ भारत की सुरक्षा के लिए चिंता का विषय हैं।
2. पाकिस्तान पर सामरिक दबाव
अफगानिस्तान में भारत की उपस्थिति पाकिस्तान को पश्चिमी सीमा पर भी सतर्क रहने के लिए बाध्य करती है।
3. मध्य एशिया तक पहुँच
अफगानिस्तान भारत को ऊर्जा सम्पन्न मध्य एशियाई देशों तक पहुँचने का अवसर प्रदान करता है।
भारत की सॉफ्ट पावर: बिना सेना के विश्वास निर्माण
2001 के बाद भारत ने अफगानिस्तान में 3 अरब डॉलर से अधिक की सहायता प्रदान की।
भारत द्वारा निर्मित प्रमुख परियोजनाएँ—
✔ अफगान संसद भवन
✔ सलमा बांध (भारत-अफगान मैत्री बांध)
✔ जरंज-देलाराम राजमार्ग
✔ अस्पताल, विद्यालय और छात्रवृत्ति कार्यक्रम
यही कारण है कि अफगान जनता के बीच भारत की छवि अत्यंत सकारात्मक रही है।
चाबहार पोर्ट: भारत की पश्चिमी रणनीति का सबसे बड़ा हथियार
ईरान का चाबहार बंदरगाह भारत की पश्चिम एशिया नीति का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है।
इसके माध्यम से भारत पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए सीधे अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुँच सकता है।
चाबहार पोर्ट क्यों महत्वपूर्ण है?
पाकिस्तान पर निर्भरता समाप्त करता है।
चीन समर्थित ग्वादर पोर्ट का विकल्प है।
INSTC का प्रमुख हिस्सा है।
रूस और मध्य एशिया तक व्यापारिक संपर्क स्थापित करता है।
तालिबान शासन के दौरान भी अफगानिस्तान की जीवनरेखा बना हुआ है।
भारत की वर्तमान रणनीति: मान्यता नहीं, लेकिन संवाद जारी
भारत ने अभी तक तालिबान सरकार को औपचारिक मान्यता नहीं दी है, लेकिन व्यावहारिक कूटनीति अपनाई है।
भारत का लक्ष्य है—
आतंकवाद पर नियंत्रण।
बहु-जातीय समावेशी शासन का समर्थन।
मध्य एशिया तक संपर्क बनाए रखना।
चीन और पाकिस्तान के प्रभाव को संतुलित करना।
निष्कर्ष: एशिया की शतरंज का सबसे महत्वपूर्ण मोहरा
अफगानिस्तान केवल तालिबान और युद्ध की कहानी नहीं है। यह डूरंड रेखा, पश्तून राष्ट्रवाद, जातीय संघर्ष, वैश्विक शक्तियों की प्रतिस्पर्धा और भारत की रणनीतिक महत्वाकांक्षाओं का संगम है।
आज जब चीन बेल्ट एंड रोड परियोजना के माध्यम से अपना प्रभाव बढ़ा रहा है, पाकिस्तान CPEC के सहारे अपनी स्थिति मजबूत करना चाहता है और अमेरिका इंडो-पैसिफिक रणनीति पर ध्यान केंद्रित कर रहा है, तब भारत के लिए अफगानिस्तान और चाबहार पोर्ट केवल विदेश नीति का विषय नहीं, बल्कि 21वीं सदी के एशियाई शक्ति-संतुलन की कुंजी बन चुके हैं।
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