इंदिरा गांधी का सबसे बड़ा निशाना क्यों बना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ?
इंदिरा गांधी का सबसे बड़ा निशाना क्यों बना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ?
लोकतंत्र पर ग्रहण — आपातकाल की अनकही गाथा (भाग–2)
पहले भाग में हमने उस रात्रि की चर्चा की थी जब 25 जून 1975 को भारत में आपातकाल की घोषणा हुई और लोकतांत्रिक अधिकारों पर अभूतपूर्व प्रतिबंध लगा दिए गए।
किन्तु आपातकाल घोषित होने के कुछ ही दिनों बाद एक प्रश्न सत्ता के गलियारों में बार-बार उठ रहा था—
यदि विरोध के स्वर दबा दिए गए हैं, बड़े नेता जेलों में बंद हैं, समाचारपत्रों पर नियंत्रण स्थापित हो चुका है, तो फिर भय किससे है?
किस संगठन से ऐसा संकट अनुभव हो रहा था कि उसे केवल नियंत्रित करना पर्याप्त नहीं समझा गया, बल्कि उसके संपूर्ण अस्तित्व को समाप्त करने की चर्चा होने लगी?
यह प्रश्न हमें आपातकाल के सबसे महत्वपूर्ण अध्यायों में से एक की ओर ले जाता है।
भाग 1 पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
सत्ता की दृष्टि में सबसे बड़ी चुनौती कौन थी?
25 जून की रात के बाद पूरे देश में गिरफ्तारियों का सिलसिला प्रारम्भ हो चुका था।
लोकनायक जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी तथा अनेक प्रमुख नेता कारागारों में भेजे जा चुके थे।
राजनीतिक प्रतिरोध का शीर्ष नेतृत्व लगभग निष्क्रिय कर दिया गया था।
किन्तु शासनतंत्र को भलीभाँति ज्ञात था कि केवल नेताओं को बंदी बना देने से जनचेतना समाप्त नहीं होती।
किसी भी व्यापक आंदोलन की वास्तविक शक्ति उसके संगठित कार्यकर्ता होते हैं।
और उस समय भारत में ग्राम स्तर तक संगठित, अनुशासित तथा वैचारिक रूप से प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं का सबसे बड़ा तंत्र राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पास था।
यहीं से सत्ता और संघ के बीच संघर्ष का वास्तविक अध्याय प्रारम्भ होता है।
“इन सब मामलों की जड़ संघ है” — सत्ता का दृष्टिकोण
आपातकाल लागू होने के मात्र दो दिन बाद, 27 जून 1975 को एक महत्वपूर्ण संकेत मिला।
दस्तावेज़ों के अनुसार, श्रीमती इंदिरा गांधी ने केंद्रीय सचिवालय के अधिकारियों की बैठक में कहा—
“इन सब मामलों की जड़ संघ है।”
यह केवल एक टिप्पणी नहीं थी।
यह उस मानसिकता का संकेत था जिसके आधार पर आगे की कार्यवाही आकार लेने वाली थी।
इसी कालखंड में कांग्रेस अध्यक्ष देवकांत बरुआ ने भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को पूर्णतः समाप्त करने की इच्छा व्यक्त की थी।
अब स्पष्ट हो चुका था कि संघर्ष केवल राजनीतिक दलों के विरुद्ध नहीं है।
एक वैचारिक और संगठनात्मक शक्ति भी सत्ता के निशाने पर आ चुकी थी।
4 जुलाई 1975 : प्रतिबंध की घोषणा
25 जून को आपातकाल लागू हुआ।
30 जून को सरसंघचालक Balasaheb Deoras को बंदी बना लिया गया।
और फिर 4 जुलाई 1975 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर औपचारिक प्रतिबंध लगा दिया गया।
देश में कुल 26 संगठनों पर प्रतिबंध लगाया गया था।
किन्तु उनमें एकमात्र ऐसा संगठन था जिसकी शाखाएँ देशव्यापी स्तर पर सक्रिय थीं और जिसका प्रभाव गाँव-गाँव तक विस्तृत था।
यह तथ्य अपने आप में बहुत कुछ कहता है।
यदि उद्देश्य केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखना होता, तो क्या इतनी व्यापक कार्यवाही आवश्यक थी?
यह प्रश्न आज भी इतिहासकारों के विमर्श का विषय है।
आखिर संघ से इतना भय क्यों था?
किसी भी शासन के लिए सबसे कठिन चुनौती वह संगठन होता है जो तीन विशेषताएँ रखता हो—
राष्ट्रव्यापी संरचना
प्रशिक्षित कार्यकर्ता
वैचारिक प्रतिबद्धता
संघ के पास ये तीनों तत्व उपस्थित थे।
उस समय अनेक राजनीतिक दल जनसमर्थन तो रखते थे, परंतु उनके पास ग्राम स्तर तक सक्रिय कार्यकर्ताओं का वह जाल नहीं था जो निरंतर संपर्क बनाए रख सके।
इसी कारण बाद में लोक संघर्ष समिति के संचालन में भी संघ के कार्यकर्ताओं की भूमिका निर्णायक दिखाई देती है।
लोकनायक जयप्रकाश नारायण द्वारा आंदोलन की निरंतरता का दायित्व नानाजी देशमुख जैसे संघ-पृष्ठभूमि वाले कार्यकर्ताओं को सौंपना भी इसी विश्वास का प्रमाण माना जाता है।
क्या प्रतिबंध से संगठन रुक गया?
सत्ता को संभवतः विश्वास था कि शीर्ष नेतृत्व की गिरफ्तारी और संगठन पर प्रतिबंध के बाद गतिविधियाँ स्वतः समाप्त हो जाएँगी।
परंतु घटनाक्रम भिन्न दिशा में आगे बढ़ा।
संघ की संगठनात्मक संरचना किसी एक व्यक्ति पर आधारित नहीं थी।
एक कार्यकर्ता की गिरफ्तारी के बाद दूसरा आगे आता था।
एक संपर्क सूत्र टूटता था तो दूसरा सक्रिय हो जाता था।
यही कारण था कि प्रतिबंध के बाद भी संपर्क, साहित्य वितरण, जनजागरण तथा भूमिगत गतिविधियाँ निरंतर चलती रहीं।
किन्तु यह सब कैसे संभव हुआ?
देशभर में संदेश कैसे पहुँचते थे?
जब समाचारपत्र नियंत्रित थे तब सत्य जनता तक कैसे पहुँचता था?
इन प्रश्नों के उत्तर अगले अध्याय में छिपे हैं।
लोकतंत्र का संघर्ष या केवल संगठन का प्रश्न?
यहाँ एक महत्वपूर्ण तथ्य समझना आवश्यक है।
दस्तावेज़ों के अनुसार संघ नेतृत्व का लक्ष्य केवल अपने ऊपर लगे प्रतिबंध को हटवाना नहीं था। उसके वक्तव्यों में बार-बार लोकतंत्र की पुनर्स्थापना को प्रमुख उद्देश्य बताया गया।
यही कारण था कि संघर्ष का स्वरूप संगठनात्मक हित से आगे बढ़कर व्यापक लोकतांत्रिक प्रश्न का रूप ग्रहण करता गया।
किन्तु लोकतंत्र की रक्षा का यह अभियान खुली सभाओं में नहीं चल सकता था।
अब संघर्ष भूमिगत होने वाला था।
और यहीं से प्रारम्भ होती है आपातकाल की सबसे रोमांचकारी कथा।
उपसंहार : जब शाखाएँ भूमिगत हुईं, पर संकल्प नहीं
4 जुलाई 1975 को प्रतिबंध लग गया।
हजारों कार्यकर्ता बंदी बना लिए गए।
कार्यालयों पर ताले लगा दिए गए।
नेतृत्व कारागारों में था।
सत्ता को प्रतीत हुआ कि अब प्रतिरोध का अध्याय समाप्त हो चुका है।
किन्तु वास्तविक कथा तो अब प्रारम्भ होने वाली थी।
क्योंकि आने वाले दिनों में भारत ने देखा कि बिना समाचारपत्रों, बिना मंचों, बिना सार्वजनिक सभाओं और बिना किसी आधुनिक संचार माध्यम के भी एक विशाल राष्ट्रव्यापी नेटवर्क कैसे सक्रिय रह सकता है।
कल पढ़िए —
“जब हजारों स्वयंसेवक भूमिगत हुए : लोकतंत्र बचाने की गुप्त लड़ाई”
उस अध्याय में हम जानेंगे—
भूमिगत संपर्क तंत्र कैसे बना?
संदेश देशभर में कैसे पहुँचते थे?
साहित्य कौन छापता था?
और क्यों विदेशी पत्रकार भी इस नेटवर्क से प्रभावित हुए?
(क्रमशः...)
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