जब तानाशाही की दीवारों में दरारें पड़ने लगीं : विदेशी मीडिया, जनाक्रोश और सत्ता की बेचैनी

जब तानाशाही की दीवारों में दरारें पड़ने लगीं : विदेशी मीडिया, जनाक्रोश और सत्ता की बेचैनी

लोकतंत्र पर ग्रहण — आपातकाल की अनकही गाथा (भाग–8)

पिछले अंक में हमने बालासाहब देवरस के पत्रों का संदर्भ सहित विश्लेषण किया। अब कहानी उस मोड़ पर पहुँच चुकी है जहाँ सत्ता को पहली बार यह आभास होने लगा कि दमन से प्रतिरोध समाप्त नहीं हुआ है...


बाहर सब शांत था... भीतर लावा धधक रहा था

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सत्ता को प्रतीत हो रहा था कि सब कुछ नियंत्रण में है...

(यहीं आपका पूरा उपशीर्षक का कंटेंट रहेगा)


विदेशी पत्रकारों ने वह देख लिया, जिसे दिल्ली छिपाना चाहती थी

भारत में प्रेस पर सेंसरशिप थी...

(पूरा कंटेंट)


जेलों में बंद लोग हार नहीं रहे थे... वे प्रतीक्षा कर रहे थे

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कारागार केवल दीवारें नहीं थे...

(पूरा कंटेंट)


भय की राजनीति की सबसे बड़ी सीमा

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भय शासन का साधन हो सकता है...

(पूरा कंटेंट)


और फिर सत्ता ने वह निर्णय लिया जिसने सबको चौंका दिया

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जनवरी 1977...

(पूरा कंटेंट)


उपसंहार

अब निर्णय कारागारों में नहीं होना था।

अब निर्णय जनता के हाथ में था।

मतपेटी मौन थी, लेकिन उसका निर्णय इतिहास का सबसे प्रबल उत्तर बनने वाला था।


अगले अंक में

1977 : जब मतपेटी ने तानाशाही को पराजित किया और लोकतंत्र ने नई साँस ली


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