सोमनाथ का पुनरुद्धार: सरदार पटेल का 'सम्मान और अस्मिता' का संकल्प इतिहास गवाह है कि सोमनाथ मंदिर केवल पत्थरों का ढांचा नहीं, बल्कि भारतीय आत्मा का प्रतीक रहा है। महमूद गजनी से लेकर औरंगजेब तक, कई आक्रांताओं ने इसे मटियामेट करने की कोशिश की, लेकिन 1947 में भारत की स्वतंत्रता के साथ ही इस 'अमर तीर्थ' के पुनरुत्थान की पटकथा लिखी गई। इस पटकथा के महानायक थे—सरदार वल्लभभाई पटेल। 1. आँखों में आँसू और समुद्र के किनारे ली गई शपथ 1 नवंबर 1947 को जब जूनागढ़ रियासत भारत का हिस्सा बनी, तब सरदार पटेल एन.वी. गाडगिल के साथ सोमनाथ पहुँचे। मंदिर की जर्जर और अपमानजनक स्थिति को देखकर सरदार का हृदय द्रवित हो उठा। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, उनकी आँखों में आँसू थे। उसी क्षण वे समुद्र तट पर गए, अपने हाथ में सागर का जल लिया और संकल्प किया: "यह मंदिर फिर से बनेगा और अपनी खोई हुई भव्यता को प्राप्त करेगा।" 2. "यह हिंदू जनता के सम्मान का प्रश्न है" सरदार पटेल का दृष्टिकोण स्पष्ट था। वे इसे केवल एक धार्मिक कार्य नहीं, बल्कि एक राष्ट्र के आत्म-सम्मान क...
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सोमनाथ का रक्तचरित्र: जब गजनी के जिहाद ने भारतीय अस्मिता को छलनी किया
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सोमनाथ का रक्तचरित्र: जब गजनी के जिहाद ने भारतीय अस्मिता को छलनी किया इतिहास केवल तारीखों का पुलिंदा नहीं होता, वह हमारे पूर्वजों के बलिदान और आततायियों की क्रूरता का गवाह भी होता है। भारत के इतिहास में 'महमूद गजनी' एक ऐसा नाम है, जो वीरता का नहीं, बल्कि विश्वासघात, नरसंहार और मजहबी उन्माद का प्रतीक है। एक प्रतिज्ञा: भारत के 'काफिरों' का विनाश वर्ष 997 में गजनी की गद्दी पर बैठते ही 27 वर्षीय महमूद ने एक भयानक प्रतिज्ञा की—"मैं हर साल भारत के काफिरों पर आक्रमण करूँगा।" यह केवल सत्ता की भूख नहीं थी, यह एक 'जिहाद' था जिसका उद्देश्य भारत की मूर्तिभंजक संस्कृति को मिटाना और यहाँ के वैभव को लूटकर इस्लाम का परचम लहराना था। जयपाल का बलिदान और म्लेच्छ का स्पर्श महमूद के शुरुआती हमलों का सामना पंजाब के राजा जयपाल ने किया। इतिहासकार अल-उत्बी लिखता है कि युद्ध के बाद 15,000 हिंदुओं को गाजर-मूली की तरह काटकर जमीन पर कालीन की तरह बिछा दिया गया। बंदी बनाए गए राजा जयपाल इतने आत्मग्लानि में थे कि एक 'म्लेच्छ' (अपवित्र) के स्पर्श के बाद उन्होंने खुद ...
सोमनाथ: नेहरू के विरोध का काला अध्याय
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नेहरू के पत्राचार का गहरा विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट होता है कि उनका विरोध केवल व्यक्तिगत पसंद तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने सरकारी मशीनरी का उपयोग करके सोमनाथ मंदिर के पुनरुत्थान के प्रभाव को कम करने की पूरी कोशिश की थी। यहाँ उन बाधाओं और तर्कों का विस्तृत विवरण है जो इन ऐतिहासिक दस्तावेजों से उभर कर आते हैं: 1. वैचारिक बाधा: 'पुनरुत्थानवाद' (Revivalism) का डर नेहरू ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण को "हिंदू पुनरुत्थानवाद" के रूप में देखा, जिसे वे आधुनिक भारत के लिए खतरा मानते थे। उन्होंने के.एम. मुंशी और जाम साहेब को लिखे पत्रों में बार-बार 'Revivalism' शब्द का प्रयोग किया। उनका तर्क था कि स्वतंत्र भारत को अपनी प्राचीन पहचान की ओर नहीं लौटना चाहिए, बल्कि एक पश्चिमी धर्मनिरपेक्ष ढांचे को अपनाना चाहिए। 2. प्रशासनिक बाधा: दूतावासों को सख्त आदेश जब सोमनाथ मंदिर के ट्रस्टियों ने विदेशों से जल और मिट्टी लाने का आह्वान किया, तो नेहरू ने इसे एक 'अंतर्राष्ट्रीय संकट' की तरह लिया। * दस्तावेजों के अनुसार: उन्होंने विदेश सचिव को नोट लि...
क्या स्त्री को 'देवी' मान लेना ही उसकी प्रगति में सबसे बड़ी बाधा है?
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क्या स्त्री को 'देवी' मान लेना ही उसकी प्रगति में सबसे बड़ी बाधा है? अक्सर हम भारतीय संस्कृति में नारी को 'पूजनीय' और 'देवी' कहकर ऊंचे आसन पर बैठा देते हैं, लेकिन क्या यही सम्मान धरातल पर उसकी बेड़ियों का कारण तो नहीं बन गया? हाल ही में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के दृष्टिकोण पर आधारित एक लेख ने इस विषय पर एक गंभीर विमर्श छेड़ा है— "विकसित भारत" का रास्ता महलों या सड़कों से नहीं, बल्कि घर के उस आँगन से होकर गुजरता है जहाँ स्त्री को बराबरी का हक मिलता है। पूजनीयता बनाम भागीदारी: एक कड़वा सच हम अक्सर कहते हैं कि जहाँ नारी की पूजा होती है, वहाँ देवता निवास करते हैं। लेकिन लेख एक कड़वी सच्चाई की ओर इशारा करता है: नारी को केवल मंदिर की मूर्ति बनाकर पूजना या उसे घर की दासी समझकर सीमित कर देना, दोनों ही उसके अस्तित्व के साथ अन्याय हैं। सच्चा सशक्तिकरण तब है जब उसे निर्णय लेने की स्वतंत्रता और अपनी प्रतिभा को बाहर लाने का समान अवसर मिले। यदि वह सुविज्ञ और सजग नहीं है, तो समाज की प्रगति की बातें केवल कागजी हैं। सिर्फ '...
सावित्रीबाई फुले : नारी शिक्षा की क्रांतिज्योति
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सावित्रीबाई फुले : नारी शिक्षा की क्रांतिज्योति जन्म : माघ कृष्ण पक्ष, पंचमी, विक्रम संवत 1887 (3 जनवरी 1831) भारतीय समाज में जब स्त्री शिक्षा की कल्पना भी पाप मानी जाती थी, तब सावित्रीबाई फुले ने ज्ञान का दीप जलाया। वे न केवल आधुनिक भारत में महिला शिक्षा की प्रथम अग्रदूत थीं, बल्कि सामाजिक अन्याय, जातिगत भेदभाव और रूढ़ियों के विरुद्ध संघर्ष की प्रतीक भी थीं। उनका संपूर्ण जीवन साहस, त्याग और समाज परिवर्तन की प्रेरक गाथा है। बाल्यकाल सावित्रीबाई का जन्म महाराष्ट्र के सतारा जिले के नायगांव ग्राम में हुआ। उनके पिता खंडोजी न्यूस-पाटील ग्राम के मुखिया थे और माता लक्ष्मीबाई एक सरल गृहिणी थीं। ग्रामीण परिवेश में पली-बढ़ी सावित्रीबाई के लिए शिक्षा का कोई अवसर नहीं था, क्योंकि उस समय स्त्रियों का पढ़ना समाज को स्वीकार्य नहीं था। विवाह और जीवन की दिशा 1840 में मात्र 9 वर्ष की आयु में उनका विवाह 13 वर्षीय ज्योतिराव फुले से हुआ। ज्योतिराव सामाजिक कुरीतियों, जातिगत भेदभाव और शोषण से बाल्यकाल से ही पीड़ित रहे थे। उन्होंने समाज सुधार का संकल्प लिया और सावित्रीबाई ने हर परिस्थिति में उनके...
संघ और शक्ति: महिला विमर्श की भारतीय दृष्टि और राष्ट्र निर्माण में भूमिका
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संघ और शक्ति: महिला विमर्श की भारतीय दृष्टि और राष्ट्र निर्माण में भूमिका अक्सर सार्वजनिक विमर्श में यह सवाल उछाला जाता है कि क्या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) में महिलाओं के लिए स्थान है? आलोचक अक्सर इसे 'विदेशी चश्मे' से देखते हैं और पश्चिमी नारीवाद के मापदंडों पर भारतीय संगठनों को तौलने की कोशिश करते हैं। लेकिन हाल ही में भोपाल में आयोजित 'शक्ति संवाद' और सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत के वक्तव्यों ने इस भ्रम के कुहासे को साफ कर दिया है। विदेशी दृष्टि बनाम भारतीय यथार्थ भारत में महिला सशक्तिकरण का अर्थ केवल 'पुरुषों जैसा बनना' नहीं, बल्कि 'मातृशक्ति' के रूप में समाज का नेतृत्व करना है। संघ का मानना है कि यदि समाज में व्यापक परिवर्तन लाना है, तो आधी आबादी को अलग रखकर यह संभव नहीं है। पश्चिमी विमर्श जहाँ अक्सर संघर्ष (Conflict) पर आधारित होता है, वहीं भारतीय दृष्टि पूरकता (Complementarity) पर टिकी है। राष्ट्र सेविका समिति: समानांतर और सशक्त ढांचा कई लोग यह नहीं जानते कि 1931 में ही संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार ने यह स्पष्ट कर दिया था ...
राजस्थान में भारतीय ज्ञान परंपरा: आत्मनिर्भर छात्र, विद्यालय और व्यवस्था का शंखनाद
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राजस्थान में भारतीय ज्ञान परंपरा: आत्मनिर्भर छात्र, विद्यालय और व्यवस्था का शंखनाद 1. प्रस्तावना: जड़ों की ओर वापसी, भविष्य की ओर दृष्टि राजस्थान की मरुधरा केवल अरावली की पर्वतमालाओं और रेतीले धोरों की भूमि नहीं है, बल्कि यह वह पुण्य धरा है जहाँ 'विद्या' को जीवन का आधार माना गया। प्राचीन काल में यहाँ के गुरुकुलों ने ऐसे व्यक्तित्व गढ़े जिन्होंने दुनिया को शून्य से लेकर खगोल विज्ञान तक का ज्ञान दिया। आज जब हम 'विकसित भारत @2047' की बात करते हैं, तो उसकी पहली सीढ़ी राजस्थान की स्कूली शिक्षा में भारतीय ज्ञान परंपरा (IKP) की पुनर्स्थापना है। भारतीय ज्ञान परंपरा कोई संकुचित विचारधारा नहीं, बल्कि सत्य, तर्क और अनुभव की वह संचित निधि है जो छात्र को 'आत्मनिर्भर' बनाती है। 2. भारतीय ज्ञान परंपरा (IKS) का मर्म और राजस्थान IKP का मूल सिद्धांत है—"समग्रता"। यहाँ ज्ञान खंडों में नहीं है। राजस्थान के संदर्भ में देखें तो यहाँ की स्थापत्य कला में गणित है, लोक गीतों में इतिहास है और सामाजिक रीति-रिवाजों में पर्यावरण विज्ञान है। जब एक छात्र अपनी संस्कृति को विज...
भारत का भविष्य: जनसांख्यिकीय असंतुलन, वैचारिक विध्वंस और राष्ट्रीय अखंडता की चुनौती
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भारत का भविष्य: जनसांख्यिकीय असंतुलन, वैचारिक विध्वंस और राष्ट्रीय अखंडता की चुनौती इतिहास स्वयं को तब तक दोहराता है जब तक उससे शिक्षा न ली जाए। 1947 का विभाजन केवल मानचित्र पर खींची गई रेखा नहीं थी, बल्कि वह दशकों तक चले वैचारिक विध्वंस (सबवर्शन), जनसांख्यिकीय परिवर्तन और राजनीतिक तुष्टीकरण का अंतिम परिणाम था। आज, 21वीं सदी के तीसरे दशक में, भारत एक बार फिर उन पदचापों को सुन रहा है जो अतीत में विभाजन की आधारशिला बनी थीं। क्या भारत में "एक और विभाजन" की पृष्ठभूमि तैयार हो रही है? यह प्रश्न आज केवल राजनीतिक गलियारों का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और अस्तित्व का मूल प्रश्न बन चुका है। 1. ऐतिहासिक दर्पण: 1947 और 1971 की सीख 1947 में पाकिस्तान का निर्माण और 1971 में बांग्लादेश का उदय—ये दोनों घटनाएँ सिद्ध करती हैं कि भूगोल कभी भी विभाजन का मुख्य कारण नहीं होता। कारण होता है 'विचार' और 'संख्यात्मक शक्ति'। * पाकिस्तान: मुस्लिम लीग के 'द्वि-राष्ट्र सिद्धांत' ने यह स्थापित किया कि मत-पंथ के आधार पर राष्ट्र अलग हो सकते हैं। * बांग्लादेश: यहाँ भा...
जल-थल के महानायक लाचित बरफुकन: वह सेनापति जिसने ब्रह्मपुत्र को अपनी ढाल बनाया
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⚓️ जल-थल के महानायक लाचित बरफुकन: वह सेनापति जिसने ब्रह्मपुत्र को अपनी ढाल बनाया जब हम भारतीय इतिहास के महानतम वीरों की बात करते हैं, तो लाचित बरफुकन (जन्म: 24 नवंबर 1622) का नाम स्वर्णिम अक्षरों में लिखा जाता है। वह सिर्फ एक साहसी योद्धा नहीं थे, बल्कि एक ऐसे विलक्षण रणनीतिकार थे, जिन्होंने असम की जान—ब्रह्मपुत्र नदी—को ही अपनी सबसे बड़ी ढाल और सबसे घातक हथियार बना दिया। उनका जीवन बताता है कि देशभक्ति और बुद्धिमत्ता का मेल हो जाए, तो कोई भी शक्तिशाली दुश्मन आपके सामने टिक नहीं सकता। ✨ पृष्ठभूमि: संघर्षों के बीच उभरा नेतृत्व लाचित का पालन-पोषण अहोम साम्राज्य के शीर्ष सैन्य परिवार में हुआ। उनके पिता, मोमाई तमुली, बरबरुआ (सेनापति) थे। लाचित ने सैन्य प्रशिक्षण में न केवल तलवार चलाना सीखा, बल्कि असम की भूगोल को भी समझा। उन्हें पता था कि मुगलों के पास विशाल घुड़सवार सेना और तोपखाने हैं, लेकिन असम की ताकत उसके बीहड़ जंगल और उसकी जीवन रेखा—असीम ब्रह्मपुत्र (लुइत) नदी—है। 1667 में, जब मुगलों से अपनी खोई हुई धरती वापस लेने का समय आया, तो लाचित को सेना की कमान सौंपी गई। उन्होंने यह स...
माननीय सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले जी का वक्तव्य
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ॐ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल बैठक 30-31 अक्टूबर-1 नवम्बर 2025, जबलपुर माननीय सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले जी का वक्तव्य राष्ट्रगीत वंदेमातरम् के 150 वर्ष मातृभूमि की आराधना और संपूर्ण राष्ट्र जीवन में चेतना का संचार करने वाले अद्भुत मन्त्र "वंदेमातरम्" की रचना के 150 वर्ष पूर्ण होने के शुभ अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ राष्ट्रगीत के रचयिता श्रद्धेय बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय को कृतज्ञतापूर्वक स्मरण करते हुए उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित करता है। 1875 में रचित इस गीत को 1896 में कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन में राष्ट्रकवि श्रद्धेय रविंद्रनाथ ठाकुर ने सस्वर प्रस्तुत कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया था। तब से यह गीत देशभक्ति का मंत्र ही नहीं अपितु राष्ट्रीय उद्घोष, राष्ट्रीय चेतना तथा राष्ट्र की आत्मा की ध्वनि बन गया। तत्पश्चात बँग-भंग आंदोलन सहित भारत के स्वाधीनता संग्राम के सभी सैनानियों का घोष मंत्र "वंदेमातरम्" ही बन गया था। इस महामंत्र की व्यापकता को इस बात से समझा जा सकता है कि देश के अनेक विद्वानों और महापुरुषों जैसे महर्षि श्री...
🚀 आत्मसमर्पण से पुनर्निर्माण: नक्सल मुक्त होता छत्तीसगढ़
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SEO कीवर्ड्स: छत्तीसगढ़ नक्सल आत्मसमर्पण नीति, नक्सलवाद पुनर्वास योजना, पूना मारगेम, नियद नेल्लानार, छत्तीसगढ़ विकास मॉडल भारत आज एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है, जहाँ आतंकवाद और नक्सलवाद को अब केवल सुरक्षा बल की कार्रवाई से नहीं, बल्कि दृढ़ सरकारी नीतियों और समावेशी विकास योजनाओं के माध्यम से परास्त किया जा रहा है। छत्तीसगढ़, जो कभी 'लाल आतंक' का गढ़ था, आज इसी परिवर्तन की गाथा लिख रहा है। हाल ही में, 140 से अधिक नक्सलियों का आत्मसमर्पण, और उससे पहले कांकेर और बीजापुर में सामूहिक समर्पण, इस बात का प्रमाण है कि राज्य सरकार की मानवीय और व्यापक नीतियां रंग ला रही हैं। अब समय आ गया है कि उन योजनाओं पर गहराई से नज़र डाली जाए, जिन्होंने हिंसा का रास्ता चुनने वाले युवाओं में विश्वास और आशा का संचार किया है। 🌟 नई 'नक्सल आत्मसमर्पण/पीड़ित राहत और पुनर्वास नीति-2025': आशा की किरण छत्तीसगढ़ सरकार ने अपनी पुरानी नीति को व्यापक रूप से संशोधित करते हुए 'छत्तीसगढ़ नक्सल आत्मसमर्पण/पीड़ित राहत और पुनर्वास नीति-2025' लागू की है। यह नीति 'छोड़ो बंदूक, थामो विकास' के नारे को...
कर्नाटक हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: RSS शाखाओं पर बैन हटने से संवैधानिक अधिकारों की जीत!
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नमस्ते! मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का एक स्वयंसेवक हूँ, और आज मैं बेहद राहत और संतोष महसूस कर रहा हूँ। पिछले कुछ दिनों से हम सब एक अजीब से असमंजस और चिंता में थे। कर्नाटक सरकार ने एक ऐसा आदेश जारी किया, जिसने सीधे तौर पर हमारे संवैधानिक अधिकारों पर प्रहार करने की कोशिश की। हमारी हर दिन लगने वाली शाखा, जहाँ हम देश और समाज की भलाई के लिए एकजुट होते हैं, जहाँ हम शांतिपूर्ण तरीके से शारीरिक और बौद्धिक अभ्यास करते हैं, उस पर रोक लगाने का प्रयास किया गया। क्या देश में 10 से अधिक लोगों का शांतिपूर्ण तरीके से एक जगह इकट्ठा होना भी अब 'अपराध' हो गया है? क्या सार्वजनिक स्थानों, पार्कों और मैदानों पर देश-सेवा की बात करना, खेल खेलना और साथ मिलकर बैठना प्रतिबंधित हो सकता है? यह सुनकर गहरा दुख हुआ कि कुछ राजनीतिक हित साधने के लिए हमारी वर्षों पुरानी, नितांत शांतिपूर्ण गतिविधियों को निशाना बनाया गया। हमारी आरएसएस शाखाएँ कोई राजनीतिक अखाड़ा नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की पाठशालाएँ हैं। हम हमेशा से ही कानून का सम्मान करते आए हैं और अपनी गतिविधियाँ पूरी तरह से शांतिपूर्ण तरीके...
गोवर्धन पूजा: पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक समरसता और दायित्व बोध का अद्भुत संदेश
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गोवर्धन पूजा: पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक समरसता और दायित्व बोध का अद्भुत संदेश भारतीय वाड्मय में प्रत्येक तीज त्यौहार और परंपरा प्रकृति, समाज तथा मानवीय मनोविज्ञान के गहन अनुसंधान पर आधारित है। दीपोत्सव की पाँच दिवसीय त्यौहार श्रृंखला में चौथे दिन, दीपावली के ठीक अगले दिन कार्तिक शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को गोवर्धन पूजन एवं अन्नकूट का आयोजन होता है। यह पर्व भगवान श्रीकृष्ण से संबंधित है और इसमें सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण एवं मानवीय दायित्व बोध का अद्भुत संदेश निहित है। पूजा का विधान और गौ-संरक्षण का संदेश परंपरानुसार, इस दिन घर की महिलाएँ प्रातःकाल गाय के ताज़े गोबर से पर्वत के आकार का एक छोटा प्रतीक बनाती हैं और उसे सजाकर पूजन करती हैं। वहीं, परिवार के सभी पुरुष गाय सहित सभी पालतू पशुओं का श्रृंगार करते हैं। पशुओं को सम्मान देने के लिए उनके गले में घंटियों की माला तथा शरीर पर रंग-बिरंगी आकृतियाँ बनाई जाती हैं। गाय की विशेष पूजा और आरती उतारी जाती है। गोवर्धन के प्रतीक के लिए गाय के गोबर का चुनाव गौ-संरक्षण के साथ-साथ जैविक खाद और वैकल्पिक ऊर्जा (जैसे सोलर ऊर्जा) के महत्...
दीपोत्सव अर्थात आत्मदीपो भवः अंधकार के साथ अज्ञान से मुक्ति का पर्व भी है दीपावली
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दीपोत्सव अर्थात आत्मदीपो भवः अंधकार के साथ अज्ञान से मुक्ति का पर्व भी है दीपावली सनातन परंपरा में दीपावली सबसे बड़ा त्यौहार है। यह सुख समृद्धि, अंधकार और अज्ञान से मुक्ति के साथ आत्मा के आनंद का पर्व है। आत्मा के आनंद केलिये व्यक्ति को अविद्या के आवरण से मुक्त होकर अपने लिये स्वयं प्रकाशदीप बनना होता है। इसी का अभ्यास है दीपोत्सव और इसके आयोजन का विधान। भारतीय परंपरा में कोई भी तीज त्यौहार या उत्सव साधारण नहीं होते। वे पर्याप्त शोध और अनुसंधान के बाद निर्धारित किये गये हैं। इनमें व्यक्ति निर्माण, कुटुम्ब समन्वय, समाज उत्थान और राष्ट्र निर्माण का संकल्प होता है। यही भाव दीपोत्सव में है। दीपावली केलिये तिथि निर्धारण से लेकर इसके आयोजन विधान सबमें गहरे संदेश हैं। ये संदेश बहुआयामी हैं। पहला संदेश अपने व्यक्तित्व को अति उन्नत बनाने का है। व्यक्तित्व की यह उन्नति समग्र रूप से होनी चाहिए। शारीरिक, मानसिक आर्थिक और आत्मिक भी। दूसरा परिवार कुटुम्ब और समाज के बीच समन्वय हो। तीसरा प्रकृति का संरक्षण और संवर्धन और राष्ट्र की समृद्धि भी इस त्यौहार में निहित है। दीपावली पर प...
आत्मनिर्भर भारत: स्वदेशी संकल्प और वैश्विक चुनौतियों का जवाब
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आत्मनिर्भर भारत: स्वदेशी संकल्प और वैश्विक चुनौतियों का जवाब "देश उठेगा अपने पैरों निज गौरव के भान से। स्नेह भरा विश्वास जगाकर जीयें सुख सम्मान से।।" — नंदलाल 'बाबा जी' भारत आज जिस मोड़ पर खड़ा है, वहाँ चुनौतियाँ भी हैं और अवसर भी। ट्रंप प्रशासन के 60% आयात शुल्क और H1B1 वीज़ा प्रतिबंधों जैसी वैश्विक परिस्थितियों ने भारत को झकझोरा, लेकिन यह झटका भारत के लिए आत्मविश्वास की नई यात्रा की शुरुआत बना। ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान और इसके सहायक मिशन—मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया, स्किल इंडिया और उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना (PLI)—ने इन चुनौतियों को अवसर में बदल दिया। यह कहानी केवल योजनाओं और आंकड़ों की नहीं, बल्कि उस स्वदेशी गौरव की है, जो हमें अपने पैरों पर खड़ा होना और आत्मसम्मान के साथ आगे बढ़ना सिखाती है। स्वदेशी गौरव की नींव बाबा जी के इसी गीत की पंक्ति कितनी सत्य है। “परावलम्बी देश जगत में, कभी न यश पा सकता है” यह आत्मनिर्भर भारत का सार है। 2020 में कोविड संकट के बीच इस अभियान की शुरुआत हुई और इसका लक्ष्य आर्थिक, तकनीकी और स...
"शिक्षा नीति : वर्तमान और भविष्य की आधारशिला"
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✍️ "शिक्षा नीति : वर्तमान और भविष्य की आधारशिला" भारत आज ऐसे ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है जहाँ वह "विकसित भारत @2047" की संकल्पना को साकार करने की ओर तेजी से अग्रसर है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने "आत्मनिर्भर भारत" और "विकसित भारत" का जो स्वप्न देखा है, उसकी बुनियाद शिक्षा है। महात्मा गांधी ने कहा था, "शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य चरित्र निर्माण है।" यह विचार भारत के संपूर्ण विकास के मूल में है। भारतीय शिक्षा : एक गौरवशाली परंपरा भारत की प्राचीन शिक्षा परंपरा विश्व की सबसे पुरानी और समृद्ध परंपराओं में से एक रही है। तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला, वल्लभी और उज्जयिनी जैसे प्राचीन विश्वविद्यालयों ने भारत को ज्ञान का वैश्विक केंद्र बनाया। गुरुकुल परंपरा में विद्यार्थियों को न केवल शास्त्रों का ज्ञान दिया जाता था, बल्कि जीवन मूल्यों, प्रकृति के प्रति प्रेम, आत्मनिर्भरता और चरित्र निर्माण की शिक्षा भी दी जाती थी। आचार्य चाणक्य का कथन है— "शिक्षा सबसे बड़ा धन है, जिसे कोई चुरा नहीं सकता।" यही भारतीय दर्शन...