संघ और शक्ति: महिला विमर्श की भारतीय दृष्टि और राष्ट्र निर्माण में भूमिका
संघ और शक्ति: महिला विमर्श की भारतीय दृष्टि और राष्ट्र निर्माण में भूमिका अक्सर सार्वजनिक विमर्श में यह सवाल उछाला जाता है कि क्या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) में महिलाओं के लिए स्थान है? आलोचक अक्सर इसे 'विदेशी चश्मे' से देखते हैं और पश्चिमी नारीवाद के मापदंडों पर भारतीय संगठनों को तौलने की कोशिश करते हैं। लेकिन हाल ही में भोपाल में आयोजित 'शक्ति संवाद' और सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत के वक्तव्यों ने इस भ्रम के कुहासे को साफ कर दिया है। विदेशी दृष्टि बनाम भारतीय यथार्थ भारत में महिला सशक्तिकरण का अर्थ केवल 'पुरुषों जैसा बनना' नहीं, बल्कि 'मातृशक्ति' के रूप में समाज का नेतृत्व करना है। संघ का मानना है कि यदि समाज में व्यापक परिवर्तन लाना है, तो आधी आबादी को अलग रखकर यह संभव नहीं है। पश्चिमी विमर्श जहाँ अक्सर संघर्ष (Conflict) पर आधारित होता है, वहीं भारतीय दृष्टि पूरकता (Complementarity) पर टिकी है। राष्ट्र सेविका समिति: समानांतर और सशक्त ढांचा कई लोग यह नहीं जानते कि 1931 में ही संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार ने यह स्पष्ट कर दिया था ...