सोमनाथ का पुनरुद्धार: सरदार पटेल का 'सम्मान और अस्मिता' का संकल्प
सोमनाथ का पुनरुद्धार: सरदार पटेल का 'सम्मान और अस्मिता' का संकल्प इतिहास गवाह है कि सोमनाथ मंदिर केवल पत्थरों का ढांचा नहीं, बल्कि भारतीय आत्मा का प्रतीक रहा है। महमूद गजनी से लेकर औरंगजेब तक, कई आक्रांताओं ने इसे मटियामेट करने की कोशिश की, लेकिन 1947 में भारत की स्वतंत्रता के साथ ही इस 'अमर तीर्थ' के पुनरुत्थान की पटकथा लिखी गई। इस पटकथा के महानायक थे—सरदार वल्लभभाई पटेल। 1. आँखों में आँसू और समुद्र के किनारे ली गई शपथ 1 नवंबर 1947 को जब जूनागढ़ रियासत भारत का हिस्सा बनी, तब सरदार पटेल एन.वी. गाडगिल के साथ सोमनाथ पहुँचे। मंदिर की जर्जर और अपमानजनक स्थिति को देखकर सरदार का हृदय द्रवित हो उठा। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, उनकी आँखों में आँसू थे। उसी क्षण वे समुद्र तट पर गए, अपने हाथ में सागर का जल लिया और संकल्प किया: "यह मंदिर फिर से बनेगा और अपनी खोई हुई भव्यता को प्राप्त करेगा।" 2. "यह हिंदू जनता के सम्मान का प्रश्न है" सरदार पटेल का दृष्टिकोण स्पष्ट था। वे इसे केवल एक धार्मिक कार्य नहीं, बल्कि एक राष्ट्र के आत्म-सम्मान क...