राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की 100 वर्षों की यात्रा – नए क्षितिज की ओर
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की 100 वर्षों की यात्रा – नए क्षितिज की ओर
पूजनीय सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत जी का प्रथम दिवस का व्याख्यान (26 अगस्त 2025)
“संघ के बारे में बहुत कुछ कहा जाता है। लेकिन जो कमी है, वह है प्रामाणिक जानकारी। चर्चा अनुमान पर नहीं, तथ्यों पर आधारित होनी चाहिए।” – डॉ. मोहन भागवत
संघ का उद्देश्य: भारत से विश्व तक
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की स्थापना का मूल उद्देश्य था – भारत की सेवा करना और उसे विश्व के लिए मार्गदर्शक बनाना। डॉ. भागवत ने कहा कि संघ की प्रासंगिकता और सफलता इसी में है कि वह भारत को विश्वगुरु के रूप में स्थापित करे।
डॉ. हेडगेवार का दृष्टिकोण और त्याग
संघ के संस्थापक डॉ. के.बी. हेडगेवार जन्मजात देशभक्त थे। बाल्यकाल से ही उनमें राष्ट्रभाव की ज्वाला थी। कोलकाता में मेडिकल शिक्षा के दौरान वे अनुशीलन समिति जैसे क्रांतिकारी संगठनों से जुड़े और उनका कोड नाम “कोकेन” था।
उनका मानना था कि भारत को ऐसे नेतृत्व की आवश्यकता है जो चरित्रवान हो, समाज से गहराई से जुड़ा हो, जनता में विश्वास रखता हो और राष्ट्र के लिए सर्वस्व अर्पित कर सके।
संघ और अखंडता की भावना
महात्मा गांधी के हिन्द स्वराज का उल्लेख करते हुए डॉ. भागवत ने कहा कि भारत सदैव से एक राष्ट्र रहा है, यह एकता शाश्वत है।
उन्होंने गुरु नानक देव जी के शब्दों का स्मरण किया, जब बाबर के आक्रमणों के समय उन्होंने हिंदुओं और मुसलमानों दोनों पर हुए अत्याचारों को रेखांकित किया। यह दर्शाता है कि हमारी साझा संस्कृति विभाजन से कहीं पुरानी और गहरी है।
100 वर्षों का संघर्ष और उपलब्धियाँ
पिछले एक शतक में संघ ने इतना विरोध और आलोचना झेला है जितना किसी स्वैच्छिक संगठन ने नहीं झेला। फिर भी यह निरंतर बढ़ता रहा क्योंकि इसका उद्देश्य कभी विभाजनकारी नहीं था।
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संघ किसी भी समुदाय के विरोध में नहीं है।
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“हिंदू” का अर्थ हिंदू बनाम अन्य नहीं, बल्कि भारत की समग्र पहचान है।
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संघ का ध्येय है समाज का संगठन – संपूर्ण समाज का, किसी संप्रदाय का नहीं।
गुरुजी गोलवलकर के शब्दों में:
“यदि संसार में न ईसाई होते, न मुसलमान होते, तब भी वर्तमान विखंडित हिंदू समाज को एक करने के लिए संघ की आवश्यकता रहती।”
संघ के मूल संस्कार
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भारत का डीएनए पिछले 40,000 वर्षों से एक ही है।
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हमारी संस्कृति हमेशा से सहअस्तित्व और समावेशिता की रही है।
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स्वयंसेवक और संघ का नाता जीवन-मरण से परे शाश्वत है।
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संघ प्रार्थना की अंतिम पंक्ति है: “विजेत्री च नः संहता कार्यशक्तिः” – हमारी संगठित शक्ति ही विजय का आधार है।
क्यों है संघ आज भी प्रासंगिक?
संघ इसलिए है क्योंकि भारत को सशक्त, संगठित और विश्व में अग्रणी बनना है। डॉ. भागवत ने अपने व्याख्यान का समापन इन शब्दों से किया:
“प्रतिदिन प्रार्थना के अंत में हम कहते हैं – भारत माता की जय। यही हमारा ध्येय है। भारत उठे, उसकी कीर्ति फैले और वह फिर से विश्व का नेतृत्व करे।”
🌍 आगे का पथ
संघ का शताब्दी वर्ष केवल अतीत का उत्सव नहीं, बल्कि भविष्य की पुकार है। कठिनाइयों और आलोचनाओं के बावजूद संघ ने समाज को संगठित करने का कार्य किया है। अगले शतक में भी इसका दृष्टिकोण वही रहेगा – समाज का संगठन, भारत की शक्ति और समावेशिता के माध्यम से मानवता का मार्गदर्शन।
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