संघ के बारे में बनाए गए नैरेटिव को तोड़ने का प्रयास


संघ के बारे में बनाए गए नैरेटिव को तोड़ने का प्रयास

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने शताब्दी वर्ष में प्रवेश कर चुका है। इस अवसर पर संघ ने एक संगठित प्रयास शुरू किया है, ताकि उसके बारे में दशकों से गढ़े गए झूठे नैरेटिव और भ्रांतियों को दूर किया जा सके। लंबे समय से संघ पर दो प्रमुख आरोप लगाए जाते रहे हैं—पहला, कि संघ मुस्लिम विरोधी संगठन है; और दूसरा, कि स्वतंत्रता संग्राम के समय संघ ने कोई भूमिका नहीं निभाई और ब्रिटिश सरकार के साथ खड़ा रहा। संघ ने इन दोनों आरोपों को दस्तावेज़ी तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर चुनौती देने का संकल्प लिया है।

वास्तव में यह पहल पहली बार नहीं हुई है। सात वर्ष पूर्व 2018 में भी संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत ने दिल्ली में तीन दिवसीय व्याख्यानों की शृंखला में इसी उद्देश्य से संघ की विचारधारा और कार्यप्रणाली पर प्रकाश डाला था। उस समय भी मकसद यही था कि समाज को भ्रमित करने वाले झूठे प्रचार का जवाब दिया जाए। अब शताब्दी वर्ष में इस प्रयास को और व्यापक स्वरूप दिया गया है। देश के चार प्रमुख महानगरों में तीन-तीन दिवसीय व्याख्यानों का आयोजन किया जा रहा है, जिनकी शुरुआत 26 अगस्त 2025 को दिल्ली से हुई।

भारत की परंपरा: संघर्ष नहीं, समन्वय

अपने प्रारंभिक उद्बोधन में डॉ. भागवत ने साफ कहा कि संघ के बारे में समाज को जो जानकारी है, वह अधूरी और अक्सर अप्रमाणिक होती है। संघ चाहता है कि चर्चा तथ्यों के आधार पर हो, न कि अफवाहों और विरोधी प्रचार पर। संघ का उद्देश्य किसी को सहमत कराना नहीं, बल्कि सच्चाई बताना है।

उन्होंने इस धारणा को तोड़ने की कोशिश की कि संघ मुस्लिम विरोधी है। भारत की सनातन परंपरा का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि इस देश में बौद्ध, जैन, पारसी, इस्लाम और ईसाई जैसे अनेक धर्म पनपे और परस्पर समन्वय के साथ सह-अस्तित्व में रहे। भारत की आत्मा विविधता में एकता है। जिस प्रकार सभी नदियाँ अंततः समुद्र में मिल जाती हैं, उसी प्रकार ईश्वर की प्राप्ति के मार्ग भिन्न हो सकते हैं, लेकिन लक्ष्य एक ही है। यही भारत की परंपरा है और संघ उसी को आगे बढ़ाता है।


डॉ. भागवत ने स्पष्ट किया कि जब संघ "हिन्दू राष्ट्र" की बात करता है, तो उसका आशय किसी संप्रदाय विशेष से नहीं होता, बल्कि सम्पूर्ण भारत की सांस्कृतिक एकता से होता है। "हिन्दू" शब्द बाहर से आया, लेकिन इस भूमि पर रहने वालों की पहचान "हिन्दवी" या "सनातन" रही है। संघ के लिए यह सब समानार्थक हैं, क्योंकि इसका मूल भाव है—भारत भूमि पर जन्मे सभी को एक मानना।

स्वतंत्रता संग्राम और संघ की भूमिका

संघ के विरोधियों ने यह भी आरोप लगाया है कि स्वतंत्रता आंदोलन में संघ का कोई योगदान नहीं था। इस भ्रांति को भी सरसंघचालक ने ऐतिहासिक तथ्यों से खंडित किया। उन्होंने बताया कि संघ व्यक्ति निर्माण का कार्य करता है और उसके स्वयंसेवक विभिन्न क्षेत्रों में राष्ट्रहित में सक्रिय रहे हैं।

संघ संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि वे बाल्यकाल से ही राष्ट्रीय चेतना से प्रेरित थे। वंदेमातरम गाने के कारण उन्हें विद्यालय से निष्कासित किया गया था। 1921 में असहयोग आंदोलन में भाग लेने पर उन्हें एक वर्ष की सज़ा हुई। इसी प्रकार 1930 में जंगल सत्याग्रह के दौरान भी उन्होंने सत्याग्रह करके गिरफ्तारी दी और पुनः एक वर्ष का कारावास भुगता। यह आंदोलन कांग्रेस के सविनय अवज्ञा अभियान का हिस्सा था।

डॉ. हेडगेवार का संपर्क कांग्रेस से ही नहीं, बल्कि क्रांतिकारी संगठनों से भी था। वे कलकत्ता में पढ़ाई के दौरान अनुशीलन समिति से जुड़े और "कोकेन" गुप्त नाम से कार्य करते रहे। उनका परिचय सुभाषचंद्र बोस, चंद्रशेखर आज़ाद और भगतसिंह जैसे क्रांतिकारियों से था। क्रांतिकारी राजगुरु को उन्होंने नागपुर और अकोला में शरण भी दिलवाई।

इन अनुभवों के आधार पर डॉ. हेडगेवार ने निष्कर्ष निकाला कि केवल राजनीतिक आंदोलन से स्वतंत्रता संभव नहीं होगी; समाज का संगठन आवश्यक है। इसी सोच से 1925 में उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने भी अपने लेख ‘स्वदेशी समाज’ में इसी प्रकार के संगठन की आवश्यकता व्यक्त की थी।

निष्कर्ष

आज जब संघ अपने शताब्दी वर्ष में खड़ा है, तब वह पुनः समाज के सामने तथ्यों को रख रहा है। उद्देश्य केवल यह बताना है कि संघ न तो किसी धर्म के विरुद्ध है, न ही उसने स्वतंत्रता संग्राम से अपने को अलग रखा। संघ का ध्येय व्यक्ति निर्माण और समाज संगठन के माध्यम से भारत को विश्वगुरु बनाना है। पिछले सौ वर्षों में यह स्पष्ट हुआ है कि संघ ने हिन्दू समाज को अपनी पहचान और आत्मगौरव से जोड़ा है।


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