सावित्रीबाई फुले : नारी शिक्षा की क्रांतिज्योति

सावित्रीबाई फुले : नारी शिक्षा की क्रांतिज्योति

जन्म : माघ कृष्ण पक्ष, पंचमी, विक्रम संवत 1887
(3 जनवरी 1831)


भारतीय समाज में जब स्त्री शिक्षा की कल्पना भी पाप मानी जाती थी, तब सावित्रीबाई फुले ने ज्ञान का दीप जलाया। वे न केवल आधुनिक भारत में महिला शिक्षा की प्रथम अग्रदूत थीं, बल्कि सामाजिक अन्याय, जातिगत भेदभाव और रूढ़ियों के विरुद्ध संघर्ष की प्रतीक भी थीं। उनका संपूर्ण जीवन साहस, त्याग और समाज परिवर्तन की प्रेरक गाथा है।

बाल्यकाल

सावित्रीबाई का जन्म महाराष्ट्र के सतारा जिले के नायगांव ग्राम में हुआ। उनके पिता खंडोजी न्यूस-पाटील ग्राम के मुखिया थे और माता लक्ष्मीबाई एक सरल गृहिणी थीं। ग्रामीण परिवेश में पली-बढ़ी सावित्रीबाई के लिए शिक्षा का कोई अवसर नहीं था, क्योंकि उस समय स्त्रियों का पढ़ना समाज को स्वीकार्य नहीं था।

विवाह और जीवन की दिशा

1840 में मात्र 9 वर्ष की आयु में उनका विवाह 13 वर्षीय ज्योतिराव फुले से हुआ। ज्योतिराव सामाजिक कुरीतियों, जातिगत भेदभाव और शोषण से बाल्यकाल से ही पीड़ित रहे थे। उन्होंने समाज सुधार का संकल्प लिया और सावित्रीबाई ने हर परिस्थिति में उनके साथ चलने का निश्चय किया। इसी कारण वे ‘क्रांतिज्योति’ कहलायीं।

स्त्री शिक्षा का आंदोलन

सावित्रीबाई ने अनुभव किया कि समाज परिवर्तन की कुंजी स्त्री शिक्षा में निहित है। उस समय महिलाएँ दोहरे शोषण की शिकार थीं—लिंग और जाति के आधार पर। उन्होंने निश्चय किया कि जब तक स्त्री शिक्षित नहीं होगी, समाज आगे नहीं बढ़ सकता।

जनवरी 1848 में पुणे के भिड़े वाड़ा में उन्होंने बालिकाओं के लिए पहला विद्यालय प्रारंभ किया। यह क्षेत्र रूढ़िवादी विचारों से भरा था। विद्यालय जाते समय उन पर कीचड़, गोबर फेंका जाता था, अपशब्द कहे जाते थे, परंतु वे अतिरिक्त साड़ी लेकर निकलतीं और दृढ़ निश्चय से विद्यालय पहुँचतीं। चार वर्षों में उन्होंने 18 विद्यालय स्थापित कर समाज की सोच बदल दी।

अन्य सामाजिक कार्य

सावित्रीबाई का योगदान केवल शिक्षा तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने विधवाओं के लिए आश्रय गृह खोला, बाल-विवाह और सती प्रथा का विरोध किया, विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया तथा अनाथ बच्चों के संरक्षण की व्यवस्था की।

1876–77 के भयंकर अकाल में उन्होंने किसानों और पीड़ितों के लिए राहत कार्य शुरू किए। विशेष रूप से अकाल से पीड़ित वेश्याओं के लिए आश्रय और सहायता की व्यवस्था उनका मानवीय दृष्टिकोण दर्शाती है। 1893 में वे सासवड में आयोजित सत्यशोधक परिषद की अध्यक्ष भी रहीं।

साहित्यिक योगदान

1854 में उनका काव्य संग्रह ‘काव्यफुले’ प्रकाशित हुआ। इसके बाद सावित्रीबाईंची गाणी, सुबोध रत्नाकर और बावनकशी जैसी कृतियाँ लिखीं। उनकी रचनाओं में सामाजिक चेतना, स्त्री स्वाभिमान और समानता का संदेश स्पष्ट रूप से झलकता है।

समर्पित जीवनसंगिनी

1887 में ज्योतिराव फुले को लकवा हो गया। तीन वर्षों तक सावित्रीबाई ने उनकी सेवा की। 28 नवंबर 1890 को ज्योतिराव के निधन के पश्चात सामाजिक विरोध के बावजूद सावित्रीबाई ने अंतिम संस्कार की अगुवाई स्वयं की—जो उस समय अकल्पनीय था।

अंतिम बलिदान

1897 में पुणे में प्लेग महामारी फैली। सावित्रीबाई ने रोगियों की सेवा और उपचार का बीड़ा उठाया। सेवा करते हुए वे स्वयं प्लेग की चपेट में आ गईं और 10 मार्च 1897 को उनका निधन हो गया।


सावित्रीबाई फुले का जीवन संघर्षों से भरा था, परंतु वे कभी अपने पथ से विचलित नहीं हुईं। उन्होंने शिक्षा को सामाजिक क्रांति का माध्यम बनाया और भारतीय नारी को आत्मसम्मान की राह दिखाई। आज भी वे समानता, शिक्षा और मानवता की अमर प्रेरणा हैं।

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