सोमनाथ: नेहरू के विरोध का काला अध्याय


नेहरू के पत्राचार का गहरा विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट होता है कि उनका विरोध केवल व्यक्तिगत पसंद तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने सरकारी मशीनरी का उपयोग करके सोमनाथ मंदिर के पुनरुत्थान के प्रभाव को कम करने की पूरी कोशिश की थी।
यहाँ उन बाधाओं और तर्कों का विस्तृत विवरण है जो इन ऐतिहासिक दस्तावेजों से उभर कर आते हैं:
1. वैचारिक बाधा: 'पुनरुत्थानवाद' (Revivalism) का डर
नेहरू ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण को "हिंदू पुनरुत्थानवाद" के रूप में देखा, जिसे वे आधुनिक भारत के लिए खतरा मानते थे। उन्होंने के.एम. मुंशी और जाम साहेब को लिखे पत्रों में बार-बार 'Revivalism' शब्द का प्रयोग किया। उनका तर्क था कि स्वतंत्र भारत को अपनी प्राचीन पहचान की ओर नहीं लौटना चाहिए, बल्कि एक पश्चिमी धर्मनिरपेक्ष ढांचे को अपनाना चाहिए।
2. प्रशासनिक बाधा: दूतावासों को सख्त आदेश
जब सोमनाथ मंदिर के ट्रस्टियों ने विदेशों से जल और मिट्टी लाने का आह्वान किया, तो नेहरू ने इसे एक 'अंतर्राष्ट्रीय संकट' की तरह लिया।
 * दस्तावेजों के अनुसार: उन्होंने विदेश सचिव को नोट लिखा कि भारतीय दूतावासों को निर्देश दिया जाए कि वे इस कार्य में शून्य सहयोग दें।
 * के.एम. मुंशी को फटकार: उन्होंने मुंशी को लिखा कि पेकिंग (बीजिंग) में भारतीय राजदूत के.एम. पणिक्कर इस अनुरोध से 'शर्मिंदा' हैं। नेहरू के लिए यह सांस्कृतिक गौरव नहीं, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक "सरकारी शर्मिंदगी" का विषय था।
3. राष्ट्रपति पर दबाव और 'व्यक्तिगत क्षमता' की शर्त
नेहरू ने डॉ. राजेंद्र प्रसाद को समारोह में जाने से रोकने के लिए कई पत्र लिखे। जब राजेंद्र बाबू नहीं माने, तो नेहरू ने यह सुनिश्चित करने की कोशिश की कि उनकी यात्रा पूरी तरह से 'निजी' रहे।
 * उन्होंने संसद और प्रेस को यह स्पष्ट संदेश दिया कि भारत सरकार का इस मंदिर से कोई लेना-देना नहीं है।
 * उन्होंने राजेंद्र प्रसाद को यहाँ तक लिखा कि वे समारोह में दिए जाने वाले अपने भाषण को पहले सरकार (नेहरू) से स्वीकृत करवा लें, ताकि उसमें 'धर्मनिरपेक्षता' का उल्लंघन न हो।
4. वित्तीय और प्रचार संबंधी अड़चनें
 * फंडिंग पर रोक: नेहरू इस बात से अत्यधिक क्रोधित थे कि सौराष्ट्र सरकार (जो उस समय एक राज्य था) ने मंदिर के लिए 5 लाख रुपये स्वीकृत किए थे। उन्होंने इसे 'अनुचित व्यय' बताते हुए मुख्यमंत्री यू.एन. ढेबर को पत्र लिखकर अपनी नाराजगी जताई।
 * मीडिया सेंसरशिप: नेहरू ने आर.आर. दिवाकर (सूचना मंत्री) को आदेश दिया कि रेडियो पर सोमनाथ के बारे में खबरें न के बराबर हों। वे चाहते थे कि जनता के बीच इस मंदिर के प्रति उत्साह को सरकारी स्तर पर बिल्कुल भी बढ़ावा न मिले।
5. पाकिस्तान का डर और तुष्टिकरण का तर्क
नेहरू के पत्रों में एक विशेष डर दिखता था—पाकिस्तान क्या सोचेगा? उन्होंने जाम साहेब को लिखा (22 अप्रैल 1951):
 "पाकिस्तान इसका फायदा उठाकर यह साबित करने की कोशिश कर रहा है कि हम एक धर्मनिरपेक्ष राज्य नहीं हैं।"

नेहरू का मानना था कि मंदिर का निर्माण करने से भारत की छवि एक हिंदू राष्ट्र जैसी बनेगी, जिससे मुस्लिम अल्पसंख्यकों और पड़ोसी देशों में गलत संदेश जाएगा।
ऐतिहासिक निष्कर्ष
इन दस्तावेजों से यह सिद्ध होता है कि यदि सरदार पटेल (जिनका निधन 1950 में हो गया था) ने इस प्रोजेक्ट की नींव न रखी होती और के.एम. मुंशी ने नेहरू के कड़े विरोध के सामने घुटने टेक दिए होते, तो सोमनाथ मंदिर आज अपने वर्तमान भव्य रूप में नहीं होता। नेहरू ने अपनी शक्ति का पूरा उपयोग इसे एक 'निजी' और 'छोटा' आयोजन बनाए रखने में किया था।

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