क्या स्त्री को 'देवी' मान लेना ही उसकी प्रगति में सबसे बड़ी बाधा है?
क्या स्त्री को 'देवी' मान लेना ही उसकी प्रगति में सबसे बड़ी बाधा है?
अक्सर हम भारतीय संस्कृति में नारी को 'पूजनीय' और 'देवी' कहकर ऊंचे आसन पर बैठा देते हैं, लेकिन क्या यही सम्मान धरातल पर उसकी बेड़ियों का कारण तो नहीं बन गया? हाल ही में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के दृष्टिकोण पर आधारित एक लेख ने इस विषय पर एक गंभीर विमर्श छेड़ा है— "विकसित भारत" का रास्ता महलों या सड़कों से नहीं, बल्कि घर के उस आँगन से होकर गुजरता है जहाँ स्त्री को बराबरी का हक मिलता है।
पूजनीयता बनाम भागीदारी: एक कड़वा सच
हम अक्सर कहते हैं कि जहाँ नारी की पूजा होती है, वहाँ देवता निवास करते हैं। लेकिन लेख एक कड़वी सच्चाई की ओर इशारा करता है: नारी को केवल मंदिर की मूर्ति बनाकर पूजना या उसे घर की दासी समझकर सीमित कर देना, दोनों ही उसके अस्तित्व के साथ अन्याय हैं।
सच्चा सशक्तिकरण तब है जब उसे निर्णय लेने की स्वतंत्रता और अपनी प्रतिभा को बाहर लाने का समान अवसर मिले। यदि वह सुविज्ञ और सजग नहीं है, तो समाज की प्रगति की बातें केवल कागजी हैं।
सिर्फ 'हिस्सा' नहीं, 'आधार' है नारी
समाज अक्सर स्त्री को एक 'सेकेंडरी रोल' में देखता है। लेकिन विचार यह है कि नारी समाज का कोई कटा हुआ हिस्सा नहीं, बल्कि उसका 'आधार' (Foundation) है।
* क्या कोई भी परिवार बिना स्त्री की वैचारिक शक्ति के फल-फूल सकता है?
* क्या 'विश्वगुरु' बनने का सपना तब तक संभव है जब तक देश की आधी आबादी केवल घर की चारदीवारी तक सीमित है?
बराबरी का मतलब सिर्फ नौकरी नहीं
अक्सर सशक्तिकरण को सिर्फ 'वर्किंग वुमन' से जोड़ दिया जाता है।
नया नजरिया —'सहभागिता' है इसमें तर्क है कि यदि हम चाहते हैं कि महिलाएँ राष्ट्र निर्माण में योगदान दें, तो पुरुषों को भी अपनी मानसिकता बदलनी होगी। घर-परिवार की जिम्मेदारी केवल स्त्री की नहीं है। जब पुरुष घर के कामों में हाथ बंटाएगा, तभी स्त्री के लिए बाहर की दुनिया के दरवाजे खुलेंगे। यह 'रोल रिवर्सल' नहीं, बल्कि 'पार्टनरशिप' है।
मानसिक परिवर्तन: कानून से बड़ा हथियार
हम रेप, मर्डर और शोषण के खिलाफ सख्त कानूनों की मांग करते हैं, जो जरूरी भी हैं। लेकिन लेख एक बहुत गहरी बात कहता है— "केवल सरकारी कानूनों के भरोसे बैठना आत्मवंचना (खुद को धोखा देना) होगी।" असली सुरक्षा और सम्मान कानून की किताबों से नहीं, बल्कि समाज के 'संस्कारों' और 'मानसिकता' से आता है। जब तक परिवार, शिक्षा और मीडिया का नजरिया नहीं बदलेगा, तब तक सुरक्षा एक सपना ही बनी रहेगी।
निष्कर्ष: मातृशक्ति का नया सूर्योदय
विकसित भारत का निर्माण किसी आर्थिक पैकेज से नहीं, बल्कि उस दिन होगा जिस दिन भारत की मातृशक्ति अपनी वास्तविक भूमिका में खड़ी होगी। उसे 'शक्ति' तो वह खुद है ही, हमें बस उसे 'स्वतंत्रता' और 'अवसर' का वातावरण देना है।
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