"दबाव की राजनीति ध्वस्त: भारत ने राहुल से ट्रंप तक सबको दिया करारा जवाब"
भारत की दृढ़ता: दबाव की राजनीति के सामने अडिग संकल्प
मनमोहन पुरोहित की कलम से
भारतीय राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला पुराना है, लेकिन हाल के दिनों में यह एक नए रंग में सामने आया है—दबाव की राजनीति। कर्नाटक में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने जो “एटम बम” कहकर वोटर लिस्ट में गड़बड़ी के आरोप लगाए, वह चुनाव आयोग की चिट्ठी के बाद कुछ ही मिनटों में “फुस्स” हो गया। वहीं, वैश्विक मंच पर अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी भारत पर शुल्क बढ़ाकर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं। इन दोनों घटनाओं में एक समानता साफ दिखती है—दबाव की रणनीति, परंतु भारत की प्रतिक्रिया में भी एक समानता है—दृढ़ता और आत्मविश्वास।
कर्नाटक का ‘एटम बम’ और चुनाव आयोग की सख्ती
कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने घोषणा की थी कि राहुल गांधी 5 अगस्त को वोट चोरी का सबूत देंगे। यह बम 5 को नहीं, 7 अगस्त को फोड़ा गया, लेकिन चुनाव आयोग ने तत्काल प्रतिक्रिया देते हुए राहुल गांधी को नोटिस भेजा और उनसे शपथपत्र में सबूत मांगे।
चुनाव आयोग ने स्पष्ट कहा—यदि आपके आरोप सही हैं, तो उन्हें लिखित रूप में दें ताकि कानूनी कार्रवाई हो सके।
गौरतलब है कि कर्नाटक में कांग्रेस की ही सरकार है और मुख्य चुनाव अधिकारी राज्य सरकार का सचिव है, ऐसे में राहुल के आरोप राजनीतिक चाल से अधिक प्रतीत होते हैं। भाजपा नेता देवेंद्र फडणवीस ने चुटकी लेते हुए कहा—“वोट चोरी नहीं हुई, राहुल गांधी के दिमाग की चिप चोरी हो गई है।”
राजनीतिक दबाव और गठबंधन की सांसें
राहुल गांधी के इन आरोपों के पीछे एक और मकसद नजर आया—टूटते विपक्षी गठबंधन (INDI) को फिर से जीवित करना। पंजाब, हरियाणा और दिल्ली में गठबंधन टूटने से कांग्रेस को बड़ा नुकसान हुआ है। इसीलिए वोटर लिस्ट विवाद के बहाने 200 सांसदों को लेकर 11 अगस्त को चुनाव आयोग तक मार्च की योजना बनाई गई है, ताकि अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी भारतीय चुनाव प्रणाली पर सवाल उठाए जा सकें।
वैश्विक मंच पर भी वही रणनीति—ट्रंप बनाम भारत
यह दबाव की राजनीति केवल देश के भीतर ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी खेली जा रही है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारतीय आयात पर 50% टैरिफ लगाकर भारत को घेरने की कोशिश की। जब उनकी अपनी पार्टी की नेता निक्की हेली ने पूछा कि चीन को 90 दिन की राहत क्यों और भारत को सिर्फ 21 दिन, तो ट्रंप कटघरे में खड़े हो गए।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साफ कर दिया कि भारत किसी दबाव में कृषि उत्पादों के आयात को मंजूरी नहीं देगा, क्योंकि यह भारतीय किसानों के हित के खिलाफ होगा।
भारत की रणनीतिक मजबूती
मोदी सरकार की कूटनीतिक चालें यह दर्शाती हैं कि भारत अब केवल प्रतिक्रिया देने वाला देश नहीं, बल्कि रणनीति बनाने वाला देश बन चुका है।
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अजित डोभाल ने मास्को में राष्ट्रपति पुतिन से मुलाकात कर व्यापारिक और रणनीतिक संबंध मजबूत करने की बात की।
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विदेश मंत्री एस. जयशंकर जल्द ही चीन की यात्रा पर जा रहे हैं।
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अगस्त के अंत में मोदी और पुतिन दोनों शंघाई सहयोग संगठन (SCO) की बैठक में चीन में मिलेंगे।
भारत ने संकेत दे दिए हैं कि वह न तो अमेरिका से मजबूरी में F-35 खरीदेगा, न रूस से तेल खरीदना बंद करेगा।
दृढ़ भारत का संदेश
चाहे वह देश के भीतर राजनीतिक आरोप हों या बाहर से आर्थिक-कूटनीतिक दबाव, भारत का रुख स्पष्ट है—हम अपने हितों के साथ समझौता नहीं करेंगे।
आज का भारत न केवल अपने किसानों, व्यापारियों और लोकतांत्रिक संस्थाओं की रक्षा कर रहा है, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन में भी अपनी शर्तों पर खेल रहा है।
दबाव बनाने वालों को यह संदेश साफ है—भारत सुनता सबकी है, मानता अपनी है।
अति सुंदर जबाव दिया मोदीजी ने देश हित में सबका साथ देश का विकास
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