सोमनाथ का रक्तचरित्र: जब गजनी के जिहाद ने भारतीय अस्मिता को छलनी किया
सोमनाथ का रक्तचरित्र: जब गजनी के जिहाद ने भारतीय अस्मिता को छलनी किया इतिहास केवल तारीखों का पुलिंदा नहीं होता, वह हमारे पूर्वजों के बलिदान और आततायियों की क्रूरता का गवाह भी होता है। भारत के इतिहास में 'महमूद गजनी' एक ऐसा नाम है, जो वीरता का नहीं, बल्कि विश्वासघात, नरसंहार और मजहबी उन्माद का प्रतीक है। एक प्रतिज्ञा: भारत के 'काफिरों' का विनाश वर्ष 997 में गजनी की गद्दी पर बैठते ही 27 वर्षीय महमूद ने एक भयानक प्रतिज्ञा की—"मैं हर साल भारत के काफिरों पर आक्रमण करूँगा।" यह केवल सत्ता की भूख नहीं थी, यह एक 'जिहाद' था जिसका उद्देश्य भारत की मूर्तिभंजक संस्कृति को मिटाना और यहाँ के वैभव को लूटकर इस्लाम का परचम लहराना था। जयपाल का बलिदान और म्लेच्छ का स्पर्श महमूद के शुरुआती हमलों का सामना पंजाब के राजा जयपाल ने किया। इतिहासकार अल-उत्बी लिखता है कि युद्ध के बाद 15,000 हिंदुओं को गाजर-मूली की तरह काटकर जमीन पर कालीन की तरह बिछा दिया गया। बंदी बनाए गए राजा जयपाल इतने आत्मग्लानि में थे कि एक 'म्लेच्छ' (अपवित्र) के स्पर्श के बाद उन्होंने खुद ...