तमिलनाडु की लड़ाई : राजनीति नहीं, सभ्यता के अस्तित्व का प्रश्न
तमिलनाडु की लड़ाई : राजनीति नहीं, सभ्यता के अस्तित्व का प्रश्न भारत के दक्षिण में एक ऐसा संघर्ष चल रहा है, जिसे केवल चुनावी राजनीति या दलों की प्रतिस्पर्धा मानना घातक भूल होगी। यह संघर्ष सत्ता का नहीं, बल्कि संस्कृति, पहचान और सभ्यता के अस्तित्व का है। तमिलनाडु आज केवल एक राज्य नहीं, बल्कि उस वैचारिक प्रयोगशाला में बदल चुका है जहाँ सनातन परंपरा, मंदिर व्यवस्था, सामाजिक संरचना और हिंदू चेतना को व्यवस्थित ढंग से चुनौती दी जा रही है। कुछ वर्ष पहले तक जो बातें फुसफुसाहट में कही जाती थीं, वे अब खुले मंचों से बोली जा रही हैं। सनातन धर्म को “डेंगू”, “मलेरिया” और “कोरोना” कहने वाले बयान केवल राजनीतिक उत्तेजना नहीं हैं; वे उस मानसिकता की अभिव्यक्ति हैं जो भारत की प्राचीन सांस्कृतिक आत्मा को रोग मानती है। प्रश्न यह है कि आखिर तमिलनाडु की राजनीति इस मोड़ तक पहुँची कैसे? द्रविड़ राजनीति की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि 1916 में अंग्रेजों के शासनकाल में “जस्टिस पार्टी” का गठन हुआ। इतिहासकार मानते हैं कि यह केवल एक राजनीतिक दल नहीं था, बल्कि ब्रिटिश औपनिवेशिक नीति का उपकरण था, जिसका उद्देश्य हिंदू ...