संदेश

अप्रैल 26, 2026 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

उद्यमशीलता का मूल्य: श्रम, पूंजी और वामपंथी भ्रम से परे मई दिवस पर विशेष

चित्र
 उद्यमशीलता का मूल्य: श्रम, पूंजी और वामपंथी भ्रम से परे प्रत्येक वर्ष एक मई को दुनिया भर में 'मजदूर दिवस' मनाया जाता है। यह दिन श्रमिकों के पसीने, उनके संघर्ष और अधिकारों को सम्मान देने का प्रतीक है। लेकिन हाल के दशकों में, इस दिन का उपयोग वास्तविक सम्मान से कहीं अधिक एक विशेष विचारधारा को थोपने के लिए किया जाने लगा है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम 'लाभ', 'हानि' और 'उद्यम' के वास्तविक अर्थ को समझें और उस वामपंथी नैरेटिव का विश्लेषण करें जो श्रम और पूंजी के बीच एक कृत्रिम दीवार खड़ी करता है। क्या केवल श्रम ही लाभ का स्रोत है? वामपंथी विचारधारा का एक बुनियादी तर्क यह है कि सारा लाभ केवल श्रमिक की मेहनत से पैदा होता है, और उद्यमी उस लाभ का शोषण करता है। सुनने में यह बात आकर्षक लग सकती है, लेकिन आर्थिक धरातल पर यह तर्क पूरी तरह खरा नहीं उतरता। यदि मशीनों और श्रमिकों की मौजूदगी ही लाभ की गारंटी होती, तो दुनिया का कोई भी कारखाना कभी बंद नहीं होता। हम आए दिन देखते हैं कि बेहतरीन मशीनरी और कुशल श्रमिकों के बावजूद कई कंपनियां घाटे में जाकर बंद हो जा...

21वीं सदी में विश्व का वर्तमान और भविष्य : युद्ध नहीं, बुद्ध चाहिए

चित्र
21वीं सदी में विश्व का वर्तमान और भविष्य : युद्ध नहीं, बुद्ध चाहिए 21वीं सदी का विश्व विज्ञान, तकनीक, वैश्वीकरण और आर्थिक समृद्धि के नए शिखरों को छू रहा है, किन्तु इसी समय मानवता अनेक संकटों से भी जूझ रही है। युद्ध, आतंकवाद, धार्मिक उन्माद, नस्लीय संघर्ष, आर्थिक असमानता, पर्यावरण विनाश, मानसिक तनाव और सामाजिक विघटन जैसे प्रश्न आज सभ्यता के सामने खड़े हैं। भौतिक प्रगति के बावजूद मनुष्य का मन अशांत है। ऐसे समय में विश्व को केवल शक्ति, पूंजी और तकनीक नहीं, बल्कि दिशा देने वाले दर्शन की आवश्यकता है। यही कारण है कि आज दुनिया को “युद्ध” नहीं, “बुद्ध” चाहिए। भारत की प्राचीन सांस्कृतिक चेतना सदैव विश्वकल्याण की रही है। “वसुधैव कुटुम्बकम्” केवल एक श्लोक नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के लिए भारत का शाश्वत संदेश है। इसका अर्थ है—यह सम्पूर्ण पृथ्वी एक परिवार है। आधुनिक समय में यही भाव “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास” के रूप में अभिव्यक्त होता है। भारत विश्व को प्रतियोगिता का रणक्षेत्र नहीं, सहयोग का परिवार मानता है। इसी दृष्टि की जड़ें भगवान बुद्ध की शिक्षाओं में भी दिखाई देती हैं। बुद्ध...

विकास का 'ग्रीन' कवच या सामरिक घेराबंदी? ग्रेट निकोबार का सच

चित्र
  विकास का 'ग्रीन' कवच या सामरिक घेराबंदी? ग्रेट निकोबार का सच भूमिका अक्सर कहा जाता है कि राजनीति में जो दिखता है, वह होता नहीं और जो होता है, वह आसानी से दिखता नहीं। बंगाल के चुनावों की गहमागहमी के बीच राहुल गांधी का अचानक अंडमान की यात्रा पर निकलना और उससे पहले सोनिया गांधी का निकोबार के पर्यावरण पर भावुक लेख लिखना, केवल 'प्रकृति प्रेम' का मामला नहीं है। यह भारत की उभरती समुद्री शक्ति और वैश्विक भू-राजनीति (Geopolitics) के उस शतरंज का हिस्सा है, जिसकी बिसात हिंद महासागर में बिछी है। 1. ग्रेट निकोबार: सिर्फ एक द्वीप नहीं, भारत का 'अनसिंकेबल एयरक्राफ्ट कैरियर' भारत सरकार का ₹75,000 करोड़ का 'ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट' कोई साधारण कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट नहीं है। गालथेया बे में बनने वाला कंटेनर पोर्ट और INS Baaz जैसे एयरबेस का विस्तार भारत को मलक्का जलडमरूमध्य (Strait of Malacca) का द्वारपाल बना देगा। दुनिया का 25% व्यापार और चीन का 80% तेल आयात इसी संकरे रास्ते से गुजरता है। अगर भारत यहां अपनी सैन्य मौजूदगी मजबूत करता है, तो युद्ध या तनाव की स्थि...