भारत की कूटनीति अब भावनाओं से नहीं, बल्कि ठोस रणनीति से चलती है?

 भारत की कूटनीति अब भावनाओं से नहीं, बल्कि ठोस रणनीति से चलती है?

 शोक या सरोकार? चयन अपना-अपना
अक्सर सवाल उठता है कि किसी खास राष्ट्रप्रमुख की मृत्यु या संकट पर भारत की प्रतिक्रिया वैसी क्यों नहीं होती जैसी दूसरों पर होती है? इसका सीधा सा उत्तर है—व्यापारिक और रणनीतिक हित। ईरान के संदर्भ में भारत का लक्ष्य स्पष्ट है:
  चीनी कंपनियों के वर्चस्व को चुनौती देना।
  चाबहार बंदरगाह के जरिए अपना नेटवर्क मजबूत करना।
  बलूचिस्तान और मध्य एशिया तक अपनी पहुंच बनाना।
  सस्ते तेल का प्रसंस्करण कर वैश्विक बाजार में अपनी धाक जमाना।
   यहाँ 'दुःख' से ज्यादा 'अवसर' और 'रणनीति' का महत्व है।
 जहाँ 'अपने' हैं, वहाँ 'अपनापन' है
वहीं दूसरी ओर, जब यूएई (UAE) के किंग से बात होती है या वहां की जनहानि पर ट्वीट आता है, तो उसके पीछे एक गहरा कारण है। वहां लाखों भारतीय और हिंदू रहते हैं। जब एक भी भारतीय या हिंदू (चाहे वह नेपाली ही क्यों न हो) को आंच आती है, तो भारत का विलाप और प्रतिक्रिया दोनों मुखर होते हैं। यह संदेश साफ है—भारत अपने लोगों के साथ खड़ा है।
 'बुद्ध' का नाम और 'ग्लोब' की हलचल
प्रधानमंत्री जब भी मंच से कहते हैं कि "हम बुद्ध की धरती से हैं", तो इसे केवल अहिंसा का संदेश मत समझिए। यह एक कूटनीतिक संकेत (Signal) होता है।
  जब यूक्रेन की बात हुई, तो बुद्ध याद आए।
  जब हमास और इजरायल का संकट बढ़ा, तो फिर बुद्ध का नाम गूँजा।
  अब ईरान और पाकिस्तान के संदर्भ में भी यही उपमा दी जा रही है।
विडंबना देखिए: वाणी में बुद्ध की शांति है, लेकिन हाथ में 'भगवद्गीता' का वह ज्ञान है जो कहता है कि धर्म की रक्षा के लिए युद्ध और रणनीति अनिवार्य है। दुनिया सोच में डूबी रहती है कि यह शांति का संदेश है या आने वाले किसी 'ऑपरेशन' की पदचाप?

सूत्र वाक्य: अब जब भी मंच से "बुद्ध का देश" सुनाई दे, तो समझ जाइए कि विश्व मानचित्र (Global Map) पर कोई नया अध्याय खुलने वाला है।

 दद्दू की बाजीगरी और सोशल मीडिया के ट्रेंड
यह कूटनीति की वह बाजीगरी है जो सुनने में मधुर लगती है, लेकिन समझने में उतनी ही गहरी और मारक है। सोशल मीडिया अब केवल हैशटैग नहीं देखता, वह दिशा देखता है कि भारत का अगला कदम किस ओर होगा।
निष्कर्ष:
आज का भारत 'नारायण-नारायण' कहते हुए पूरी दुनिया पर नजर भी रख रहा है और अपने हितों की रक्षा के लिए 'चक्र' उठाने से परहेज भी नहीं कर रहा। बुद्ध और युद्ध के बीच का यह संतुलन ही आधुनिक भारत की असली शक्ति है।
तो अगली बार जब "बुद्ध" गूँजे... तो बस मुस्कुराइए और ग्लोब घुमाइए! 🌍🚩
!! नारायण !! !! नारायण !!

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