बौद्धिक वितंडावादियों से सावधान रहने की जरूरत है

ट्रंप का बयान, भारत का सत्य और फैलाया जा रहा नकारात्मक नैरेटिव

आज का समय केवल कूटनीति और अर्थव्यवस्था का नहीं, बल्कि नैरेटिव के युद्ध का भी समय है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कई बार वास्तविक घटनाओं से अधिक महत्व उस कहानी को मिल जाता है, जो उन घटनाओं के इर्द-गिर्द गढ़ी जाती है। हाल ही में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति Donald Trump द्वारा दिया गया एक बयान और उसके बाद भारत में फैलाया गया विमर्श इसी प्रकार की एक घटना है, जिसने यह दिखा दिया कि किस प्रकार एक आधा-सच पूरे देश में भ्रम का वातावरण बना सकता है।

ट्रंप ने यह दावा किया कि अमेरिका ने भारत को रूस से तेल खरीदने के लिए 30 दिन की अनुमति (waiver) दी है। यह बयान सुनते ही भारत के कुछ तथाकथित विशेषज्ञों, विश्लेषकों और सोशल मीडिया के स्वयंभू ‘जियो-स्ट्रैटेजिक एक्सपर्ट्स’ ने इसे इस प्रकार प्रस्तुत करना शुरू कर दिया मानो भारत अपनी ऊर्जा नीति तय करने के लिए अमेरिका से अनुमति लेता हो। कुछ लोगों ने तो यह तक कहना शुरू कर दिया कि भारत वैश्विक दबाव में झुक गया है।

लेकिन यदि तथ्यों की कसौटी पर इस पूरे प्रकरण को परखा जाए, तो यह कथन वास्तविकता से बहुत दूर दिखाई देता है।

सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी ऊर्जा खपत वाली अर्थव्यवस्था है। देश अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का लगभग 85 से 90 प्रतिशत तेल आयात करता है। इसलिए भारत की ऊर्जा नीति का मूल सिद्धांत अत्यंत स्पष्ट है—जहाँ से तेल सस्ता, सुरक्षित और स्थिर रूप से उपलब्ध हो, भारत वहीं से खरीद करेगा।


रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद जब रूस ने अपने तेल पर भारी छूट देनी शुरू की, तो भारत सहित कई देशों ने उस अवसर का उपयोग किया। इससे पहले भारत रूस से बहुत कम मात्रा में तेल खरीदता था, लेकिन 2022 के बाद रूस भारत के प्रमुख आपूर्तिकर्ताओं में शामिल हो गया। यह निर्णय किसी राजनीतिक दबाव के कारण नहीं, बल्कि पूरी तरह आर्थिक यथार्थ और राष्ट्रीय हित के आधार पर लिया गया था।

अब प्रश्न उठता है कि फिर “30 दिन की अनुमति” वाला बयान कहाँ से आया?

दरअसल यह अमेरिका के अपने प्रतिबंध कानूनों की तकनीकी प्रक्रिया से जुड़ा मामला था। रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों के कारण कई बार अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग, बीमा और शिपिंग कंपनियों को लेन-देन पूरा करने के लिए अस्थायी छूट देनी पड़ती है। यह छूट मूलतः अमेरिकी कंपनियों और वित्तीय संस्थानों के लिए होती है, ताकि पहले से चल रहे व्यापारिक अनुबंध पूरे किए जा सकें।

इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि भारत ने अमेरिका से अनुमति मांगी या अमेरिका भारत को निर्देश दे रहा है कि वह कब और कितना तेल खरीदे।

लेकिन राजनीति और प्रचार के इस युग में अक्सर तकनीकी प्रक्रिया को राजनीतिक कथा में बदल दिया जाता है। यही यहाँ भी हुआ।

विडंबना यह है कि जिस देश ने यह बयान दिया, उसी अमेरिका ने पिछले कुछ वर्षों में बार-बार यह स्वीकार किया है कि भारत अपनी ऊर्जा नीति स्वतंत्र रूप से तय करता है। स्वयं अमेरिका के कई रणनीतिक विशेषज्ञों ने कहा है कि भारत जैसे विशाल ऊर्जा उपभोक्ता देश को अपनी आर्थिक जरूरतों के अनुसार निर्णय लेने का अधिकार है।

फिर भी ट्रंप का यह बयान केवल अमेरिका की घरेलू राजनीति के संदर्भ में समझा जाना चाहिए। अमेरिकी राजनीति में अक्सर ऐसे बयान दिए जाते हैं जिनका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय वास्तविकता को बताना नहीं, बल्कि अपने मतदाताओं को यह संदेश देना होता है कि अमेरिका अब भी वैश्विक घटनाओं को नियंत्रित करने की क्षमता रखता है।

इसे सरल भाषा में कहें तो यह एक प्रकार का राजनीतिक “फेस-सेविंग” नैरेटिव होता है।

दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि भारत में कुछ लोग ऐसे बयानों को बिना किसी तथ्यात्मक जांच के तुरंत प्रचारित करने लगते हैं। वे इसे इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं मानो भारत की विदेश नीति किसी दूसरे देश के निर्देशों पर चल रही हो।

ऐसा करते समय वे शायद यह भूल जाते हैं कि पिछले एक दशक में भारत ने वैश्विक मंच पर जिस प्रकार की स्वतंत्र और संतुलित विदेश नीति अपनाई है, वह विश्व राजनीति में एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन चुकी है।

आज भारत एक साथ कई शक्तियों के साथ मजबूत संबंध बनाए हुए है—
अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी,
रूस के साथ रक्षा और ऊर्जा सहयोग,
मध्य-पूर्व के देशों के साथ ऊर्जा सुरक्षा,
और यूरोप तथा एशिया के साथ आर्थिक सहयोग।


इस बहु-आयामी कूटनीति को अक्सर “मल्टी-अलाइनमेंट” कहा जाता है, और यही आधुनिक भारत की विदेश नीति की सबसे बड़ी विशेषता है।

भारत ने रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भी यही संतुलन बनाए रखा। उसने किसी गुट का अंधानुकरण नहीं किया, बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखा। यही कारण है कि भारत ने रूस से तेल खरीदना जारी रखा, जबकि पश्चिमी देशों के साथ अपने संबंध भी मजबूत बनाए रखे।

आज भारत लगभग 3.7 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बन चुका है और आने वाले वर्षों में विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर बढ़ रहा है। ऐसे में स्वाभाविक है कि वैश्विक राजनीति में भारत की भूमिका और महत्व तेजी से बढ़ रहा है।

जब कोई देश इस प्रकार उभरता है, तो उसके बारे में कई प्रकार के नैरेटिव भी गढ़े जाते हैं—कुछ सकारात्मक और कुछ नकारात्मक।

इस पूरे प्रकरण से हमें एक महत्वपूर्ण शिक्षा मिलती है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में केवल घटनाओं को देखना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि यह समझना भी आवश्यक होता है कि उन घटनाओं की व्याख्या कौन कर रहा है और किस उद्देश्य से कर रहा है।

आज सूचना के इस युग में सबसे बड़ा खतरा झूठ से नहीं, बल्कि आधे-सच से है। आधा-सच अक्सर पूरे झूठ से अधिक खतरनाक होता है, क्योंकि वह सत्य का आवरण पहनकर भ्रम पैदा करता है।

इसलिए जब भी कोई अंतरराष्ट्रीय बयान या समाचार सामने आए, तो उसे तुरंत भावनात्मक प्रतिक्रिया के बजाय तथ्यों, संदर्भों और व्यापक परिप्रेक्ष्य में समझना आवश्यक है।

भारत आज 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने के संकल्प के साथ आगे बढ़ रहा है। इस यात्रा में बाहरी चुनौतियों से अधिक महत्वपूर्ण है कि हम अपने भीतर फैलाए जा रहे भ्रम और नकारात्मक नैरेटिव को पहचानें और तथ्यों की कसौटी पर परखें।

क्योंकि अंततः किसी भी राष्ट्र की शक्ति केवल उसकी सेना या अर्थव्यवस्था से नहीं मापी जाती—
बल्कि उससे भी अधिक उसकी बौद्धिक ईमानदारी और राष्ट्रीय आत्मविश्वास से मापी जाती है।

और भारत की वास्तविक शक्ति आज उसी आत्मविश्वास में निहित है।

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